छात्रों को विरोध का पूरा अधिकार, गलती पर पूरे बैच को सजा नहीं दी जा सकती: CJI सूर्यकांत

NALSAR के 2026 बैच के एडवोकेट एनरोलमेंट विवाद के बीच CJI जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि शांतिपूर्ण और वैध विरोध प्रदर्शन छात्रों का संवैधानिक अधिकार है। BCI ने भी बाद में पूरे बैच पर कार्रवाई का फैसला वापस लेते हुए छात्रों को अपनी पसंद की बार काउंसिल में नामांकन की अनुमति दी।

By  Laxman August 14th 2026 11:18 AM

नई दिल्ली: छात्रों के विरोध प्रदर्शन के अधिकार को लेकर भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत का अहम बयान सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान उन्होंने स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण और वैध तरीके से विरोध प्रदर्शन करना संविधान के तहत मिलने वाला अधिकार है। उन्होंने यह भी कहा कि किसी छात्र की युवावस्था में कही गई कोई गलत बात अपने आप में उसके विरोध करने के अधिकार को खत्म नहीं करती।

यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक से जुड़े मुद्दे को लेकर हुए छात्र प्रदर्शन और NALSAR यूनिवर्सिटी के 2026 बैच के कानून स्नातकों के खिलाफ प्रस्तावित कार्रवाई का मामला चर्चा में है।

सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने छात्रों के अधिकारों पर जोर देते हुए कहा कि अगर विरोध शांतिपूर्ण और कानून के दायरे में है तो छात्रों को प्रदर्शन करने से नहीं रोका जाना चाहिए। उन्होंने छात्रों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए उनके खिलाफ अनावश्यक दंडात्मक कार्रवाई से बचने की जरूरत पर भी जोर दिया।

‘मैं भी स्टूडेंट रहा हूं’

सुनवाई के दौरान CJI ने छात्रों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि वह भी कभी छात्र रहे हैं और छात्रों को अपनी बात रखने तथा विरोध करने का अधिकार है।

उनकी टिप्पणी का व्यापक संदेश यह रहा कि किसी आंदोलन में शामिल होने या किसी मुद्दे पर अपनी असहमति जताने के कारण छात्रों के पूरे करियर पर असर डालना उचित नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब उनके खिलाफ व्यक्तिगत स्तर पर कोई स्पष्ट भूमिका सामने न आई हो।

CJI ने यह भी कहा कि छात्रों से कहा जाना चाहिए कि वे अपना नामांकन कराएं और सुप्रीम कोर्ट बार से जुड़ें। उन्होंने कानूनी सहायता से जुड़े काम में छात्रों को अवसर देने की बात भी कही।

NALSAR छात्रों के नामांकन पर क्यों उठे सवाल?

इस मामले की पृष्ठभूमि हैदराबाद स्थित NALSAR University of Law के 2026 बैच के कानून स्नातकों से जुड़ी है। 13 अगस्त को बार काउंसिल ऑफ इंडिया यानी BCI की ओर से विश्वविद्यालय के 2026 बैच के सभी कानून स्नातकों के एडवोकेट के रूप में नामांकन पर रोक लगाने का निर्देश दिया गया था।

यह कदम विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में CJI सूर्यकांत की भागीदारी के विरोध में कथित अभियान को लेकर उठाया गया था। BCI अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा की ओर से NALSAR के कुलपति से इस मामले में जानकारी मांगी गई थी।

BCI यह पता लगाना चाहता था कि कथित अभियान शुरू करने, उसे आयोजित करने या छात्रों को इसमें शामिल करने में किन लोगों की भूमिका रही। इसमें छात्रों के अलावा शिक्षकों, रिसर्च स्कॉलर्स, छात्र संगठनों, पूर्व छात्रों और बाहरी लोगों की संभावित भूमिका की जानकारी भी मांगी गई थी।

कुछ ही घंटों में बदला BCI का रुख

हालांकि, शुरुआती आदेश के कुछ ही घंटों बाद BCI ने पूरे बैच पर कार्रवाई के अपने फैसले पर पुनर्विचार किया। मामले पर चर्चा के बाद परिषद ने माना कि NALSAR के 2026 बैच के ज्यादातर छात्र कथित विरोध अभियान में शामिल नहीं थे।

ऐसे में पूरे बैच के छात्रों को सामूहिक रूप से सजा देना उचित नहीं होगा। संशोधित फैसले के तहत NALSAR के सभी 2026 स्नातकों को अपनी पसंद की राज्य बार काउंसिल में एडवोकेट के रूप में नामांकन कराने की अनुमति दे दी गई।

BCI ने अपने बदले हुए रुख में यह भी स्पष्ट किया कि किसी छात्र को ऐसी गलती की कीमत नहीं चुकानी चाहिए, जिसमें उसकी खुद की कोई भूमिका नहीं रही हो।

शिक्षकों और बाहरी लोगों की भूमिका की भी जांच

BCI ने हालांकि मामले को पूरी तरह खत्म नहीं किया है। परिषद के मुताबिक, कुछ शिक्षकों और बाहरी लोगों की ओर से छात्रों को कथित तौर पर प्रभावित या उकसाए जाने की जानकारी सामने आई है।

इसलिए मामले में आगे की जांच की संभावना बनी हुई है। BCI ने संकेत दिया है कि रिपोर्ट मिलने के बाद यदि किसी व्यक्ति की जिम्मेदारी सामने आती है तो उसके खिलाफ कार्रवाई पर विचार किया जा सकता है।

इससे यह स्पष्ट होता है कि कार्रवाई का फोकस पूरे छात्र बैच के बजाय उन विशिष्ट लोगों की भूमिका तय करने पर हो सकता है, जिनके खिलाफ कथित अभियान में सक्रिय भागीदारी के तथ्य सामने आएं।

छात्रों के अधिकार बनाम संस्थागत अनुशासन

इस पूरे मामले ने छात्रों के विरोध के अधिकार और संस्थागत अनुशासन के बीच संतुलन का सवाल भी सामने ला दिया है। एक तरफ शिक्षण संस्थानों और पेशेवर निकायों को अनुशासन बनाए रखने की जिम्मेदारी होती है, वहीं दूसरी तरफ छात्रों को अपनी असहमति शांतिपूर्ण तरीके से व्यक्त करने का संवैधानिक अधिकार भी प्राप्त है।

CJI सूर्यकांत की टिप्पणी और BCI का संशोधित फैसला इस बात की ओर इशारा करता है कि किसी समूह के कुछ सदस्यों पर लगे आरोपों के आधार पर पूरे बैच के करियर को प्रभावित करना उचित नहीं माना जाना चाहिए।

फिलहाल NALSAR के 2026 बैच के छात्रों के लिए नामांकन का रास्ता साफ हो गया है। वहीं कथित विरोध अभियान में वास्तव में किसकी भूमिका थी, इसे लेकर आगे की जांच और रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई की संभावना बनी हुई है।

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