E20 पेट्रोल: क्या गाड़ी का माइलेज सच में घट रहा है? सरकार ने खुद मानी 5% तक गिरावट

इस बहस ने नया मोड़ तब लिया जब आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल दिल्ली के एक पेट्रोल पंप और सर्विस सेंटर पहुंचे, जहां उन्होंने मैकेनिकों और वाहन मालिकों से बातचीत की।

By  Gurpreet Kaur July 15th 2026 07:16 PM

नई दिल्ली: एथेनॉल वाले पेट्रोल पर मचा घमासान अब सोशल मीडिया से निकलकर सीधे संसद के दरवाज़े तक पहुंच चुका है। एक तरफ अरविंद केजरीवाल ने पीएम मोदी को चिट्ठी लिखकर शुद्ध पेट्रोल का विकल्प मांगा है, तो दूसरी तरफ खुद केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और पेट्रोलियम मंत्रालय ने माना है कि कुछ गाड़ियों में माइलेज 3 से 5 फीसदी तक घट सकता है। 20 जुलाई से शुरू हो रहे मानसून सत्र में ये मुद्दा हंगामे की सबसे बड़ी वजह बन सकता है।


देश में इस वक्त तीन मुद्दे सबसे ज़्यादा चर्चा में हैं, नीट परीक्षा पर उठते सवाल, राम मंदिर से जुड़ी घटना, और तीसरा वो मुद्दा जो सीधे करोड़ों आम लोगों की जेब से जुड़ा है, E20 पेट्रोल का विवाद। ये बहस थमने का नाम नहीं ले रही, और अब ये राजनीति, अर्थव्यवस्था, किसान, पर्यावरण और आम आदमी के भरोसे, सबको एक साथ कठघरे में खड़ा कर चुकी है।


इस बहस ने नया मोड़ तब लिया जब आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल दिल्ली के एक पेट्रोल पंप और सर्विस सेंटर पहुंचे, जहां उन्होंने मैकेनिकों और वाहन मालिकों से बातचीत की।


केजरीवाल की पीएम को चिट्ठी: ‘लोगों को विकल्प दो’


मंगलवार, 14 जुलाई को केजरीवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर उनसे मुलाकात का समय मांगा और मांग की कि पेट्रोल पंपों पर लोगों को शुद्ध पेट्रोल और E20, दोनों में से चुनने का विकल्प मिले। केजरीवाल का तर्क है कि 2023 से पहले बनी करोड़ों गाड़ियां E20 के लिए डिज़ाइन नहीं की गई थीं, और इनमें माइलेज कम होने, इंजन जल्दी घिसने और रखरखाव का खर्च बढ़ने की शिकायतें आ रही हैं। 


उन्होंने ये भी मांग की कि चूंकि E20 से माइलेज कम मिलता है, इसलिए इसकी कीमत सामान्य पेट्रोल से कम होनी चाहिए। पार्टी ने एक ऑनलाइन याचिका (petition) भी शुरू की है, जिसमें लोगों से उनकी गाड़ी, पहले और अब के माइलेज और आई दिक्कतों का ब्यौरा साझा करने की अपील की गई है। केजरीवाल ने कहा कि E20 पर सवाल उठाने वाले लोग देशद्रोही नहीं, बल्कि परेशान नागरिक हैं, और लोकतंत्र में उनकी बात सुनना सरकार का फर्ज़ है। 





नागपुर में FIR: सोशल मीडिया पोस्ट पर पुलिस जांच शुरू


इस पूरे विवाद के बीच नागपुर से एक अहम खबर आई। नागपुर साइबर पुलिस ने गडकरी और E20 फ्यूल को लेकर कथित तौर पर भ्रामक और मानहानिकारक सोशल मीडिया पोस्ट डालने के आरोप में FIR दर्ज की है। यह शिकायत भाजपा नागपुर शहर सोशल मीडिया सेल के संयोजक शिशिर अरुण त्रिपाठी ने दर्ज कराई थी।


शिकायत के मुताबिक, कंटेंट क्रिएटर मनीष कश्यप द्वारा 3 जुलाई 2026 को अपलोड किए गए एक यूट्यूब वीडियो में गडकरी और E20 फ्यूल को लेकर कथित तौर पर गलत और भ्रामक दावे किए गए। इसके अलावा ‘Desi Boys’, ‘Harshit Rathi’ और ‘Anklesh Inwati’ जैसे कुछ अन्य अकाउंट्स के नाम भी शिकायत में शामिल हैं। पुलिस ने FIR नंबर 0092/2026, भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 356, 352 और 296 तथा IT एक्ट 2000 की धारा 67 के तहत दर्ज की है। 




विपक्ष का सवाल: सस्ते ईंधन का फायदा आम आदमी तक क्यों नहीं?


विपक्ष का तर्क है कि देश में करोड़ों ऐसी गाड़ियां हैं, जिन्हें उस समय खरीदा गया था जब E20 की कोई चर्चा तक नहीं थी। ऐसे में पर्याप्त विकल्प दिए बिना लोगों को नए ईंधन की तरफ धकेलना उचित नहीं। दूसरा बड़ा सवाल, अगर एथेनॉल अपेक्षाकृत सस्ता है, तो उसका लाभ आम लोगों तक क्यों नहीं पहुंच रहा?





सरकार का पलटवार: ‘माइलेज सिर्फ एक पैमाना है’


दूसरी तरफ सरकार इस पूरे मुद्दे को बिल्कुल अलग नज़रिए से देख रही है। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने माना कि एथेनॉल की कैलोरिफिक वैल्यू कम होने से माइलेज में मामूली गिरावट आ सकती है, लेकिन उन्होंने इंजन खराब होने के दावों को ‘झूठा नैरेटिव’ बताकर खारिज कर दिया। गडकरी के मुताबिक हाईवे पर तेज़ रफ्तार में माइलेज पर असर दिख सकता है, जबकि शहर के ट्रैफिक में यह फर्क बेहद कम होता है। 


सबसे अहम, खुद सरकार ने माइलेज में गिरावट स्वीकार की है। पेट्रोलियम मंत्रालय ने अपने एक दस्तावेज़ में कहा कि कुछ गाड़ियों में फ्यूल इकॉनमी में 3 से 5 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है, लेकिन माइलेज ही एकमात्र पैमाना नहीं है। मंत्रालय के मुताबिक इस नीति के पीछे बड़े आर्थिक और पर्यावरणीय लक्ष्य हैं। 


गडकरी ने यह भी कहा कि जो लोग एथेनॉल मिश्रित ईंधन नहीं चाहते, वे 100 प्रतिशत पेट्रोल खरीद सकते हैं, लेकिन उन्हें ज़्यादा कीमत चुकानी होगी। हालांकि यहां एक व्यावहारिक पेच है, 100-ऑक्टेन जैसे शुद्ध/लगभग-शून्य एथेनॉल वाले प्रीमियम फ्यूल मेट्रो शहरों में करीब 167 से 170 रुपये प्रति लीटर तक बिकते हैं, जो सामान्य पेट्रोल से काफी महंगा है। 




एथेनॉल है क्या? आसान भाषा में पूरी कहानी


एथेनॉल एक तरह का जैव ईंधन (बायो-फ्यूल) है, जिसे खेतों और कृषि उत्पादों से तैयार किया जा सकता है। भारत में मुख्य रूप से दो तरह का एथेनॉल बनता है,  फर्स्ट जनरेशन, जो गन्ने के रस, मोलासेस (शीरे), मक्का और खराब आलू जैसी फसलों से बनता है; और सेकंड जनरेशन, जो धान की पराली, गेहूं की भूसी, मक्के के भुट्टे और बांस जैसे कृषि अवशेषों से बनता है। इन्हें फर्मेंटेशन और डिस्टिलेशन की प्रक्रिया से गुज़ारकर पेट्रोल में तय अनुपात में मिलाया जाता है।


इसकी ज़रूरत क्यों? सरकार के मुताबिक भारत अपनी ज़रूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है, जिस पर हर साल लाखों करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा खर्च होती है। पेट्रोलियम मंत्रालय का दावा है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग से कच्चे तेल के आयात की जगह घरेलू बायोफ्यूल का इस्तेमाल कर करीब 1.97 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचाई गई है। इसके अलावा प्रदूषण में कमी और किसानों की आय के नए रास्ते, ये दो और बड़े तर्क हैं।  






E20 का सच: 20% एथेनॉल, 80% पेट्रोल


यहां एक बात समझना ज़रूरी है- E20 का मतलब गाड़ियां पूरी तरह एथेनॉल पर चलना नहीं है। इसका सीधा अर्थ है पेट्रोल में 20% एथेनॉल और 80% सामान्य पेट्रोल का मिश्रण। देश भर में E20 पेट्रोल की अनिवार्य बिक्री 1 अप्रैल से लागू हुई है, और यह भारत की ऊर्जा रणनीति का हिस्सा है।


दुनिया के कई देश इससे आगे हैं, ब्राज़ील और पैराग्वे में 30% तक एथेनॉल मिश्रण इस्तेमाल होता है, और ब्राज़ील में फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां दशकों से चल रही हैं। लेकिन आलोचकों का कहना है कि उन देशों में उपभोक्ताओं के पास कई विकल्प मौजूद हैं, जबकि भारत में E20 को मुख्य ईंधन के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है।




पर्यावरण की कीमत: बर्नीहाट का सच


E20 की बहस अब पानी, प्रदूषण और पर्यावरण तक पहुंच चुकी है। गन्ना दुनिया की सबसे ज़्यादा पानी खर्च करने वाली फसलों में से एक है, जिससे ‘फूड वर्सेज फ्यूल’ (भोजन बनाम ईंधन) की बहस तेज़ हो गई है। सरकार का कहना है कि आधुनिक डिस्टिलरी में पानी की खपत काफी कम हुई है और कई संयंत्र ‘जीरो लिक्विड डिस्चार्ज’ तकनीक पर काम कर रहे हैं।


इसी बीच मेघालय-असम सीमा पर स्थित बर्नीहाट की तस्वीरें वायरल हुईं, जिसे देश का सबसे प्रदूषित शहर बताया गया, जहां PM2.5 का सालाना औसत 128.2 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज हुआ, WHO की सीमा से करीब 25 गुना ज़्यादा। एक वायरल यूट्यूब डॉक्यूमेंट्री में पेड़ों की पत्तियों, छतों और सब्ज़ियों पर जमी काली कालिख दिखाई गई, और इसके लिए एक बड़ी एथेनॉल डिस्टिलरी को ज़िम्मेदार ठहराया गया। 


लेकिन निष्पक्षता के लिए पूरी तस्वीर ज़रूरी है। जांच में सामने आया कि विवाद के केंद्र में मौजूद उमियम डिस्टिलेशन प्राइवेट लिमिटेड नाम की एथेनॉल फैक्ट्री ने कमर्शियल उत्पादन सितंबर 2024 में शुरू किया, जबकि बर्नीहाट को प्रदूषण के लिहाज़ से 2022-23 में ही ‘क्रिटिकली पॉल्यूटेड’ घोषित किया जा चुका था, यानी फैक्ट्री खुलने से करीब दो साल पहले। इलाके में करीब 80 फैक्ट्रियां, सीमेंट, लाइमस्टोन, फेरो-एलॉय और स्टील प्लांट, मौजूद हैं, और कटोरेनुमा भौगोलिक बनावट प्रदूषण को वहीं फंसा देती है। यानी सिर्फ एक उद्योग को ज़िम्मेदार ठहराना पूरी सच्चाई नहीं दिखाता। 







अब आगे क्या? संसद में उठेगा मुद्दा


संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से 13 अगस्त तक चलेगा, और विपक्ष इस मुद्दे को सदन में उठाने की तैयारी में है। अरविंद केजरीवाल पहले ही शुद्ध पेट्रोल और E20 दोनों विकल्प देने की मांग कर चुके हैं। हालांकि अब तक न तो प्रधानमंत्री कार्यालय और न ही पेट्रोलियम मंत्रालय ने केजरीवाल की चिट्ठी या मुलाकात के अनुरोध पर सार्वजनिक रूप से कोई जवाब दिया है। 


पेट्रोल अब पहली बार ऐसा ईंधन बन गया है, जिस पर बहस सिर्फ कीमत की नहीं, बल्कि भरोसे की भी हो रही है। असली सवाल यही है: क्या भारत ऊर्जा आत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ते हुए आम आदमी की चिंताओं, पर्यावरण की चुनौतियों और भविष्य की ज़रूरतों के बीच सही संतुलन बना पाएगा?


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