SIR पर चुनाव आयोग का बड़ा फैसला, फॉर्म-6 से हटाई अनिवार्य घोषणा; अब अलग भरना होगा Declaration

निर्वाचन आयोग ने SIR से जुड़ी अनिवार्य घोषणा को ऑनलाइन फॉर्म-6 से अलग कर दिया है। अब नए मतदाताओं को फॉर्म-6 और SIR घोषणा-पत्र अलग-अलग भरना होगा। यह फैसला चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों और सुप्रीम कोर्ट में दाखिल आयोग के हलफनामे के बाद आया है।

By  Laxman November 4th 2026 11:58 AM

नई दिल्ली: विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर निर्वाचन आयोग ने एक अहम बदलाव किया है। आयोग ने नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले ऑनलाइन फॉर्म-6 से SIR से संबंधित अनिवार्य घोषणा को हटा दिया है। अब जिन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में SIR की प्रक्रिया जारी है, वहां भी नए मतदाताओं को फॉर्म-6 और SIR घोषणा-पत्र अलग-अलग भरना होगा। इससे पहले ऑनलाइन फॉर्म-6 में ही SIR से जुड़ा एक अतिरिक्त सेक्शन शामिल था, जिसमें आवेदकों के लिए निर्धारित विकल्पों में से किसी एक को चुनना जरूरी था।

यह बदलाव ऐसे समय में हुआ है, जब निर्वाचन आयोग के भीतर फॉर्म-6 में SIR से जुड़ी घोषणा को शामिल करने के फैसले पर सवाल उठाए गए थे। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इस व्यवस्था को लेकर अलग-अलग समय पर आपत्तियां दर्ज कराई थीं। दोनों आयुक्तों का तर्क था कि निर्धारित फॉर्म में बदलाव करने के लिए कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है। अब आयोग ने ऑनलाइन आवेदन की व्यवस्था में बदलाव करते हुए दोनों प्रक्रियाओं को अलग कर दिया है।

फॉर्म-6 में अब नहीं दिखेगी SIR की अनिवार्य घोषणा

फॉर्म-6 का इस्तेमाल मतदाता सूची में नया नाम दर्ज कराने के लिए किया जाता है। पहले ऑनलाइन आवेदन के दौरान फॉर्म के सेक्शन J और K के बीच SIR से संबंधित एक घोषणा जोड़ी गई थी। इसमें आवेदक को तीन विकल्पों में से किसी एक का चयन करना होता था।

पहले विकल्प में यह बताना था कि क्या आवेदक का अपना नाम 2000 के दशक की शुरुआत में हुए पिछले विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान तैयार मतदाता सूची में शामिल था। दूसरे विकल्प में पूछा गया था कि क्या उसके माता-पिता या दादा-दादी में से किसी का नाम उस समय की मतदाता सूची में दर्ज था। तीसरे विकल्प में यह बताना होता था कि न तो आवेदक का नाम और न ही उसके माता-पिता का नाम उस पुरानी मतदाता सूची में मौजूद था।

अब इस घोषणा को ऑनलाइन फॉर्म-6 से अलग कर दिया गया है। इसका मतलब है कि नए मतदाता पंजीकरण के लिए आवेदन करते समय आवेदकों को फॉर्म-6 के भीतर इन तीन विकल्पों में से किसी एक को चुनने की अनिवार्यता नहीं रहेगी। हालांकि, SIR घोषणा-पत्र को पूरी तरह समाप्त नहीं किया गया है। यह निर्वाचन आयोग के ECINet पोर्टल पर अलग दस्तावेज के रूप में उपलब्ध रहेगा।

चुनाव आयुक्तों ने क्यों जताई थी आपत्ति?

फॉर्म-6 में SIR घोषणा शामिल किए जाने को लेकर चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने कानूनी आधार पर सवाल उठाए थे। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, विवेक जोशी ने 16 मई को अपनी टिप्पणी में कहा था कि फॉर्म में इस तरह का बदलाव संबंधित कानूनी संशोधन के बिना नहीं किया जा सकता। उनका तर्क था कि फॉर्म-6 मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के तहत निर्धारित है और इसमें बदलाव करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है।

इसके बाद सुखबीर सिंह संधू ने 13 अगस्त को इस घोषणा को अनधिकृत और अवैध बताते हुए इसे तत्काल हटाने की बात कही थी। इससे पहले 19 मई को भी उन्होंने जोशी की आपत्ति का समर्थन किया था।

हालांकि, दोनों आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद जुलाई में ऑनलाइन फॉर्म-6 में यह घोषणा शामिल कर दी गई थी। इस मुद्दे पर सितंबर में सार्वजनिक रूप से चर्चा तेज हुई, जब दोनों आयुक्तों की टिप्पणियों से संबंधित रिपोर्ट सामने आई।

सुप्रीम कोर्ट में हलफनामे के बाद बदली ऑनलाइन व्यवस्था

निर्वाचन आयोग ने 26 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने जवाबी हलफनामे में फॉर्म-6 और SIR घोषणा को अलग-अलग करने के फैसले की जानकारी दी थी। आयोग के अनुसार, मतदाता सूची से संबंधित उसके ER डिवीजन ने 21 अक्टूबर को ही दोनों प्रक्रियाओं को अलग करने का निर्णय लिया था।

हलफनामे में आयोग ने बताया कि शुरुआत में SIR घोषणा को फॉर्म-6 के साथ जोड़ने के पीछे एक व्यावहारिक उद्देश्य था। यदि दोनों दस्तावेज अलग-अलग भरे जाते, तो आवेदक को दो अलग OTP और दो ई-सिग्नेचर की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता। दोनों को एक ही पेज पर रखने से एक OTP और एक ई-सिग्नेचर के जरिए आवेदन पूरा किया जा सकता था।

आयोग ने इसे नेकनीयती से लिया गया निर्णय बताया। हालांकि, बाद में इस व्यवस्था पर उठे सवालों और मिले सुझावों की समीक्षा की गई। इसके बाद दोनों प्रक्रियाओं को अलग-अलग करने का फैसला लिया गया।

आयोग के हलफनामे में यह भी कहा गया कि कागजी प्रारूप में फॉर्म-6 और SIR घोषणा पहले से अलग-अलग होते हैं। इसी व्यवस्था के अनुरूप अब ऑनलाइन आवेदन को भी दो हिस्सों में बांटा गया है। पहला हिस्सा नियमों के अनुसार निर्धारित फॉर्म-6 होगा और दूसरा SIR घोषणा-पत्र।

आयोग ने कहा- फॉर्म-6 में कानूनी संशोधन नहीं किया गया

इस पूरे विवाद में निर्वाचन आयोग का रुख यह रहा है कि उसने फॉर्म-6 में कोई औपचारिक कानूनी संशोधन नहीं किया था। आयोग ने अपने हलफनामे में कहा कि यह दावा सही नहीं है कि SIR से जुड़े आदेशों के माध्यम से फॉर्म-6 में बदलाव किया गया।

हालांकि, आयोग ने यह स्वीकार किया कि उसके आईटी प्लेटफॉर्म पर फॉर्म-6 और घोषणा-पत्र को जिस तरह प्रदर्शित किया जा रहा था, उससे यह धारणा बन सकती थी कि मूल फॉर्म में संशोधन कर दिया गया है। आयोग के मुताबिक, फॉर्म-6 में औपचारिक बदलाव करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है।

इसलिए अब ऑनलाइन पोर्टल पर दोनों दस्तावेजों को अलग-अलग प्रदर्शित किया जा रहा है। यह बदलाव केवल SIR वाले राज्यों तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि आयोग के फैसले के अनुसार ऑनलाइन व्यवस्था में इसे अलग दस्तावेज के रूप में रखा गया है

आयोग के कामकाज पर भी उठे थे सवाल

फॉर्म-6 से जुड़ा विवाद निर्वाचन आयोग के भीतर दर्ज की गई आपत्तियों की एक बड़ी श्रृंखला का हिस्सा है। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले करीब 10 महीनों में चुनाव आयुक्त संधू और जोशी ने कम से कम 14 बार आयोग के कुछ फैसलों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर अपनी असहमति दर्ज कराई थी।

इन टिप्पणियों में मतदाता सूची में नाम जोड़ने, नाम हटाने और दोबारा शामिल करने की प्रक्रिया से लेकर अपीलों और तकनीकी प्रणालियों के संचालन तक कई मुद्दे शामिल थे। दोनों आयुक्तों ने इस बात पर भी सवाल उठाए थे कि कुछ महत्वपूर्ण निर्णय उनके संज्ञान में लाए बिना निर्वाचन आयोग के नाम पर लिए जा रहे थे।

आयोग ने सितंबर में अपनी प्रतिक्रिया में कहा था कि ये टिप्पणियां सामान्य विचार-विमर्श के दौरान दिए गए सुझाव और संचालन से जुड़े इनपुट थे। उसका कहना था कि पिछले एक वर्ष के महत्वपूर्ण निर्णय पूर्ण निर्वाचन आयोग की सर्वसम्मत मंजूरी से लिए गए थे।

बैठकों और आईटी सिस्टम में किए गए बदलाव

पिछले कुछ हफ्तों में आयोग ने अपने कामकाज से जुड़े कई मामलों में बदलाव किए हैं। अब आयोग की बैठकों से पहले एजेंडा सभी सदस्यों को भेजने और बैठक के बाद कार्यवाही का विवरण जारी करने की व्यवस्था पर जोर दिया गया है।

नई आईटी प्रणालियों और पोर्टल के विकास से जुड़े प्रस्तावों को भी पहले अधिकारियों की समिति के सामने रखने और फिर पूर्ण आयोग की मंजूरी के लिए प्रस्तुत करने का निर्णय लिया गया है। इसके अलावा ECINet सिस्टम के कानूनी और तकनीकी अनुपालन की जांच के लिए एक समिति गठित की गई है। इसमें आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ IIT बॉम्बे और IISc बेंगलुरु के स्वतंत्र विशेषज्ञ भी शामिल हैं।

दोनों आयुक्तों ने पहले ECINet के संचालन, नियंत्रण और मतदाता सूची से जुड़े डेटा तक अधिकारियों की पहुंच को लेकर सवाल उठाए थे। अब सिस्टम के ऑडिट और उसकी कार्यप्रणाली की समीक्षा की जा रही है।

मतदाताओं को दस्तावेज देने और सुनवाई में मिली राहत

SIR प्रक्रिया के दौरान मतदाताओं को होने वाली परेशानियों को देखते हुए कुछ अन्य बदलाव भी किए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, मैपिंग में असफलता या तार्किक विसंगतियों के कारण नोटिस पाने वाले मतदाताओं की व्यक्तिगत सुनवाई को अपवादस्वरूप रखने की व्यवस्था की गई है। इसके बजाय बूथ लेवल अधिकारी (BLO) उनके घर जाकर दस्तावेज एकत्र कर सकते हैं।

इसके साथ ही मतदाताओं को पहले से निर्धारित 13 श्रेणियों के अलावा अन्य दस्तावेज जमा करने की भी छूट दी गई है। निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) को तार्किक विसंगतियों से जुड़े मामलों में स्वयं निर्णय लेने का अधिकार दिया गया है। ऐसे मामलों को हर बार जिला निर्वाचन अधिकारी के पास भेजना अनिवार्य नहीं होगा।

पुराने SIR की मतदाता सूची का अंश अपलोड करने की अनिवार्यता भी हटाई गई है। इन बदलावों का उद्देश्य स्थानीय स्तर पर काम करने वाले चुनाव अधिकारियों को अधिक अधिकार देना और मतदाताओं की प्रक्रिया को आसान बनाना बताया गया है।

गोवा के 97 मतदाताओं का मामला भी बना था चर्चा का विषय

ECINet सिस्टम से जुड़ी एक अन्य समस्या गोवा में सामने आई थी। रिपोर्ट के अनुसार, 97 मतदाताओं के नाम मसौदा मतदाता सूची से हटाए गए थे। बाद में इन लोगों ने जरूरी दस्तावेज जमा किए और संबंधित निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों ने उनके दस्तावेजों को सही मानते हुए नाम दोबारा शामिल करने की मंजूरी दे दी।

लेकिन तकनीकी प्रणाली में नाम हटाने की कार्रवाई को पलटने का विकल्प उपलब्ध नहीं था। इस वजह से अधिकारियों की मंजूरी के बावजूद इन 97 लोगों के नाम अंतिम सूची में शामिल नहीं हो पाए। गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने इस मामले में आयोग को कई पत्र भेजे थे। अब आयोग ने इन मतदाताओं के नाम सूची में शामिल कराने की सुविधा देने का निर्देश दिया है।

हलफनामे के अनुसार, इनमें से 88 मतदाताओं ने फॉर्म-6 भर दिया है और उनके आवेदन स्वीकार किए जा चुके हैं। छह मतदाता देश से बाहर हैं, जबकि तीन के पास पुर्तगाली पासपोर्ट हैं।

ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से नाम कटने पर क्या करें?

निर्वाचन आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि SIR के दौरान जिन लोगों के नाम मसौदा मतदाता सूची से हट गए हैं, वे दोबारा नाम जुड़वाने के लिए फॉर्म-6 भर सकते हैं। इसके लिए उन्हें निर्धारित नियमों के तहत आवेदन करना होगा।

ऐसे में जिन लोगों का नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में नहीं है, उन्हें अपने आवेदन और दस्तावेजों की स्थिति पर ध्यान देना चाहिए। फॉर्म-6 और SIR घोषणा-पत्र अब अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं, इसलिए आवेदन करते समय ECINet पोर्टल पर उपलब्ध निर्देशों को ध्यान से पढ़ना जरूरी होगा।

निर्वाचन आयोग के इस फैसले से नए मतदाताओं के ऑनलाइन पंजीकरण की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण बदलाव आया है। साथ ही, यह घटनाक्रम आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया, कानूनी अधिकारों और तकनीकी प्रणालियों की भूमिका पर चल रही चर्चा को भी सामने लाता है। अब देखना होगा कि अलग-अलग फॉर्म की व्यवस्था लागू होने के बाद SIR के दौरान मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया कितनी सहज और पारदर्शी बनती है।

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