Delhi High Court on Protest: ‘जंतर-मंतर डीनोटिफाई था तो गए क्यों?’ सौरव दास-आशुतोष रांका की हिरासत पर कोर्ट के सवाल

दिल्ली हाईकोर्ट ने सौरव दास और आशुतोष रांका की हिरासत बढ़ाने तथा जमानतदारों को खारिज करने से जुड़े मामले में कई सवाल उठाए। अदालत ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन, बॉन्ड की कथित शर्तों के उल्लंघन और सीधे हाईकोर्ट आने के बजाय उपलब्ध अपील प्रक्रिया अपनाने के मुद्दे पर सुनवाई की।

By  Laxman October 21st 2026 01:39 PM

नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट में सामाजिक कार्यकर्ताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की हिरासत बढ़ाने तथा जमानतदारों को खारिज किए जाने से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान प्रदर्शन, बॉन्ड की शर्तों और कानूनी प्रक्रिया को लेकर कई अहम सवाल उठे। जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने याचिकाकर्ताओं से पूछा कि जब संबंधित आदेशों को चुनौती देने के लिए अपील और अन्य कानूनी विकल्प उपलब्ध हैं, तो वे सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट क्यों पहुंचे।

सुनवाई में अदालत ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन के लिए अधिसूचित क्षेत्र से हटाए जाने, वहां जाने और बैरिकेड पार करने के आरोपों पर भी सवाल किए। याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील अभिक चिमनी ने स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) के आदेशों को चुनौती देते हुए दलील दी कि बॉन्ड भरने के लिए दबाव बनाया गया और जमानतदारों को बार-बार खारिज करने की कार्रवाई मनमानी थी। पुलिस और सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा पेश हुए।

हाईकोर्ट ने पूछा- अपील का विकल्प होते हुए सीधे यहां क्यों आए?

मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से 14 और 19 अक्टूबर को पारित आदेशों को चुनौती दी गई। उनकी दलील थी कि इन आदेशों के जरिए हिरासत बढ़ाई गई और जमानतदारों को स्वीकार नहीं किया गया। वकील ने अदालत से संबंधित आदेश रद्द करने की मांग की।

इस पर हाईकोर्ट ने पूछा कि जब कानून में अपील का प्रावधान मौजूद है, तो उस रास्ते को अपनाने के बजाय सीधे हाईकोर्ट में याचिका क्यों दाखिल की गई। पीठ ने संकेत दिया कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अदालत का अधिकार क्षेत्र व्यापक जरूर है, लेकिन इसका इस्तेमाल करते समय वैकल्पिक कानूनी उपायों की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण होती है।

अदालत ने कहा कि वह यह जांच सकती है कि संबंधित अधिकारी ने उचित प्रक्रिया अपनाई या नहीं और आदेश में ऐसी गंभीर त्रुटि तो नहीं है जिसके कारण न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक हो। लेकिन तथ्यों और सबूतों का विस्तृत मूल्यांकन सामान्य तौर पर अपीलीय अदालत के दायरे में आता है।

याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि मामला केवल आदेश की समीक्षा का नहीं, बल्कि कानून लागू करने की प्रक्रिया और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा है। इसके बावजूद पीठ ने बार-बार पूछा कि उपलब्ध अपील के रास्ते का इस्तेमाल करने में क्या बाधा है।

बॉन्ड की शर्तों और हिरासत को लेकर क्या है विवाद?

सुनवाई में बॉन्ड की कथित शर्तों के उल्लंघन का मुद्दा प्रमुख रहा। अदालत के सामने रखे गए घटनाक्रम के मुताबिक, 10 अक्टूबर को पहली घटना हुई, 11 अक्टूबर को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धाराओं 126 और 170 के तहत बॉन्ड दिए गए, 12 अक्टूबर को जंतर-मंतर को प्रदर्शन के लिए अधिसूचित क्षेत्र से हटाए जाने की बात सामने आई और 13 अक्टूबर को दोनों याचिकाकर्ताओं के वहां जाने का आरोप है।

अदालत ने सवाल किया कि यदि पहले दिए गए बॉन्ड का उल्लंघन हुआ था, तो कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई गई। पीठ ने BNSS की धारा 491 का उल्लेख करते हुए पूछा कि क्या जमानतदारों को जब्त करने या कारण बताओ नोटिस जारी करने जैसे कदमों पर विचार किया गया था।

याचिकाकर्ताओं के वकील ने 19 अक्टूबर के आदेश को मनमाना बताते हुए कहा कि उसमें आवश्यक प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ। उन्होंने यह भी दलील दी कि संबंधित मजिस्ट्रेट के पास हिरासत बढ़ाने का अधिकार नहीं था। दूसरी ओर, अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने अपने आकलन के आधार पर आदेश पारित किया था और हाईकोर्ट को यह देखना होगा कि उसमें हस्तक्षेप करने का पर्याप्त कानूनी आधार है या नहीं।

जंतर-मंतर और बैरिकेड तोड़ने के आरोप पर सवाल

सुनवाई के दौरान पीठ ने पूछा कि जब जंतर-मंतर को प्रदर्शन के लिए अधिसूचित क्षेत्र से हटाने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका लंबित थी, तो क्या उस फैसले पर कोई रोक लगाई गई थी। अदालत ने संकेत दिया कि किसी सरकारी निर्णय की वैधता पर विवाद होना और उस निर्णय पर रोक लगना दो अलग बातें हैं।

पीठ ने यह भी सवाल किया कि अधिसूचित क्षेत्र से हटाए जाने के बाद जंतर-मंतर जाने की घटना को किस कानूनी आधार पर देखा जाना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी फैसले का सही या गलत होना अलग प्रश्न है; सुनवाई में यह भी देखना होगा कि आदेश लागू था या उस पर रोक थी।

बैरिकेड तोड़ने के आरोप पर अदालत ने टिप्पणी की कि बैरिकेड किसी उद्देश्य से लगाए जाते हैं। उन्हें तोड़कर आगे बढ़ने से अन्य लोगों के भी वहां पहुंचने और हालात बिगड़ने का खतरा पैदा हो सकता है। पीठ ने विदेशों में हुए कुछ प्रदर्शनों का उदाहरण देते हुए कहा कि कई बार आंदोलन हिंसा, आगजनी या लूटपाट में बदल जाते हैं।

अदालत के अनुसार, पुलिस की अनुमति और व्यवस्था का उद्देश्य केवल प्रदर्शनकारियों को रोकना नहीं, बल्कि संभावित रूप से स्थिति बिगाड़ने वाले अन्य लोगों को नियंत्रित करना भी हो सकता है। हालांकि, ये टिप्पणियां सुनवाई के दौरान उठाए गए सवालों का हिस्सा हैं। इन्हें याचिकाकर्ताओं के खिलाफ आरोपों पर अंतिम फैसला नहीं माना जाना चाहिए।

जमानतदार चार बार खारिज करने का आरोप

याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि जमानतदारों को कई बार खारिज किया गया। वकील अभिक चिमनी ने दलील दी कि यदि याचिका वापस लेकर याचिकाकर्ताओं को फिर से SEM के सामने जाना पड़ता है और वहां जमानतदार स्वीकार नहीं किए जाते, तो उन्हें दोबारा हाईकोर्ट आना पड़ सकता है। उनके अनुसार, इससे हिरासत की अवधि और बढ़ने की आशंका है।

वकील ने यह भी कहा कि जमानतदारों को बार-बार अस्वीकार करने की कार्रवाई मनमानी है और अदालत को इसके कारणों पर विचार करना चाहिए। उन्होंने बताया कि याचिकाकर्ताओं को नए जमानतदार पेश करने के लिए कहा गया था, लेकिन पेश किए गए जमानतदार स्वीकार नहीं किए गए।

इस पर हाईकोर्ट ने सवाल किया कि जब जमानतदारों को खारिज करने के आदेश को अपीलीय मंच पर चुनौती दी जा सकती है, तो सीधे अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दाखिल करने की जरूरत क्यों पड़ी। अदालत ने BNSS की धारा 136 के तहत अपील की उपलब्ध प्रक्रिया का भी उल्लेख किया।

सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को नए जमानतदार पेश करने का निर्देश दिया गया था और उन्हें कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना चाहिए। इस तरह सुनवाई में जमानतदारों की स्वीकार्यता और हिरासत बढ़ाने के आदेश को अलग-अलग कानूनी प्रश्नों के रूप में देखा गया।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मजिस्ट्रेट के अधिकार पर बहस

याचिकाकर्ताओं के वकील ने BNSS की धारा 135(3) का हवाला देते हुए कहा कि शांति भंग होने की आशंका के आधार पर कार्रवाई के लिए ठोस और तत्काल कारण जरूरी हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या संबंधित आदेश में ऐसी आशंका का पर्याप्त आधार मौजूद था और क्या हिरासत की अवधि तथा प्रकृति पर उचित विचार किया गया।

हाईकोर्ट ने इस पर कहा कि मजिस्ट्रेट ने अपने आकलन के आधार पर आदेश दिया था। अब यह देखना होगा कि प्रक्रिया का पालन किया गया या नहीं और आदेश में ऐसी गलती है या नहीं जो न्यायिक हस्तक्षेप को उचित बनाए। अदालत ने यह भी पूछा कि यदि पहले दिए गए बॉन्ड का उल्लंघन हुआ था, तो कानून के तहत आगे की कार्रवाई करने का अधिकार मजिस्ट्रेट के पास था या नहीं।

सुनवाई में ‘अल्दानिश’ मामले में दी गई कानूनी सुरक्षा के याचिकाकर्ताओं पर लागू होने का सवाल भी उठा। पीठ ने पूछा कि यदि कोई व्यक्ति अलग-अलग मुद्दों पर प्रदर्शन करने की बात कहकर बार-बार बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन करता है, तो ऐसे मामलों में कानूनी व्यवस्था को कैसे लागू किया जाना चाहिए। इस मुद्दे पर अदालत के अंतिम निष्कर्ष के बारे में उपलब्ध विवरण से कोई निश्चित दावा नहीं किया जा सकता।

SEM की सुनवाई का इंतजार करने की सलाह

हाईकोर्ट ने यह भी पूछा कि जब संबंधित SEM अदालत में उसी दिन सुनवाई निर्धारित थी, तो याचिकाकर्ताओं को तत्काल हाईकोर्ट आने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई। पीठ ने सुझाव दिया कि वे पहले निचली अदालत में उपलब्ध उपायों का इस्तेमाल करने पर विचार कर सकते थे।

अदालत ने कहा कि यदि हाईकोर्ट नोटिस जारी करता है, तो राज्य सरकार को जवाब देने के लिए समय देना होगा और इस बीच परिस्थितियां बदल सकती हैं। याचिकाकर्ताओं के वकील ने जवाब दिया कि आदेश में रिहा न करने और जमानतदारों की जांच से जुड़े पहलू मौजूद हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि रिहाई नहीं होनी है, तो जमानतदारों की जांच का क्या उद्देश्य रह जाता है।

पीठ ने कहा कि वह संबंधित पक्ष से इन मुद्दों पर सवाल करेगी। अदालत ने घटनाक्रम का क्रम समझने के लिए तारीखों और आदेशों के बारे में भी जानकारी मांगी। सुनवाई के दौरान याचिका की सुनवाई योग्य होने और उपलब्ध वैकल्पिक उपायों का प्रश्न बार-बार सामने आया।

आगे की सुनवाई में क्या अहम रहेगा?

इस मामले में तीन मुख्य प्रश्न महत्वपूर्ण बने हुए हैं। पहला, क्या हिरासत बढ़ाने और बॉन्ड के कथित उल्लंघन पर की गई कार्रवाई में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन हुआ। दूसरा, जमानतदारों को खारिज करने के फैसले को चुनौती देने के लिए कौन-सा कानूनी मंच उचित है। तीसरा, क्या याचिकाकर्ताओं के मामले में सीधे हाईकोर्ट के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

फिलहाल, सुनवाई में अदालत ने कई सवाल उठाए हैं, लेकिन इन सवालों को अंतिम आदेश या आरोपों की पुष्टि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। मामले की आगे की दिशा अदालत के आदेश और संबंधित पक्षों की दलीलों पर निर्भर करेगी।

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