Explainer: भारत में एक साथ बाढ़ और सूखा क्यों? पहाड़ों से मैदान तक हर राज्य की अलग कहानी

असम में बाढ़ ने 68 लोगों की जान ले ली और 5 लाख से ज्यादा लोग प्रभावित हैं, जबकि राजस्थान और गुजरात जैसे राज्य अब भी अच्छी बारिश का इंतज़ार कर रहे हैं। आखिर एक ही देश में मौसम की इतनी अलग-अलग तस्वीरें क्यों दिख रही हैं, समझिए पूरा विज्ञान।

By  Gurpreet Kaur July 27th 2026 05:32 PM

नई दिल्ली: देश के मौसम की तस्वीर इस समय बेहद उलझी हुई है। एक तरफ असम पानी में डूबा है, बाढ़ ने अब तक 68 लोगों की जान ले ली है और लाखों लोग बेघर हैं। दूसरी तरफ हिमाचल और उत्तराखंड के पहाड़ लगातार दरक रहे हैं, सैकड़ों सड़कें बंद हैं। और तीसरी तरफ देश के कई हिस्से अब भी अच्छी बारिश का इंतज़ार कर रहे हैं। यानी एक ही देश, लेकिन मौसम की तीन बिल्कुल अलग-अलग तस्वीरें।


इसी बीच असम से आई एक तस्वीर ने पूरे देश को भावुक कर दिया है। सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में एक पिता गर्दन तक भरे बाढ़ के पानी में उतरकर, अपने तीन छोटे बच्चों को एक बड़े प्लास्टिक के टब में बैठाकर सुरक्षित जगह तक पहुंचाता दिखाई देता है। न कोई नाव थी, न कोई सरकारी मदद वहां तक पहुंची थी, बस एक बाप का हौसला था। वीडियो में दिख रहे परिवार की पहचान की अभी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो पाई है, लेकिन ये दृश्य असम के बाढ़ग्रस्त इलाकों में उन हज़ारों परिवारों की सच्चाई बयां करता है, जिनके पास बचने का कोई साधन नहीं था।




असम में बाढ़ की ताज़ा तस्वीर: 68 मौतें, 5 जिलों में 5.24 लाख प्रभावित


असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (ASDMA) के 27 जुलाई के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, इस साल बाढ़ से अब तक 68 लोगों की जान जा चुकी है। रविवार को चराएदेव जिले में पानी में डूबने से दो और मौतें दर्ज हुईं। राज्य के पांच जिलों, चराएदेव, शिवसागर, जोरहाट, गोलाघाट और नगांव में क़रीब 5 लाख से ज़्यादा लोग अब भी बाढ़ से प्रभावित हैं। सबसे बुरा हाल चराएदेव का है, जहां अकेले क़रीब 1.9 लाख लोग जलभराव की चपेट में हैं, उसके बाद शिवसागर में 1.5 लाख से ज़्यादा लोग प्रभावित हैं।


राहत की बात ये है कि हालात में हल्का सुधार दिख रहा है, शनिवार को प्रभावितों की संख्या 6.55 लाख थी, जो अब घटकर 5.24 लाख रह गई है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने खुद प्रभावित इलाकों का दौरा करते हुए कहा है कि ऊपरी असम में बाढ़ की स्थिति धीरे-धीरे सामान्य हो रही है और कई इलाकों से पानी उतरना शुरू हो गया है। हालांकि इससे पहले 24 जुलाई को उन्होंने ये भी माना था कि ऊपरी असम के सबसे बुरी तरह प्रभावित इलाकों में फंसे क़रीब 80 हज़ार लोगों तक अभी राहत नहीं पहुंच पाई थी।


एक रिपोर्ट के मुताबिक अब तक राज्य के 77 राजस्व सर्किल और 2,023 गांव बाढ़ की चपेट में आ चुके हैं। फिलहाल 162 राहत शिविर चलाए जा रहे हैं, जिनमें 41,264 लोगों को शरण दी गई है। सेना, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, राज्य पुलिस और स्थानीय प्रशासन लगातार राहत और बचाव अभियान चला रहे हैं, राहत शिविरों में भोजन, दवाइयों और ज़रूरी सुविधाओं का इंतज़ाम किया गया है, जबकि कई इलाकों में बिजली और संचार सेवाएं धीरे-धीरे बहाल की जा रही हैं। हज़ारों हेक्टेयर कृषि भूमि पहले ही पानी में डूब चुकी है, जिससे किसानों की पूरी सीज़न की मेहनत बर्बाद होने का खतरा मंडरा रहा है।





सिर्फ असम तक सीमित नहीं संकट, देश के कई राज्य बारिश और भूस्खलन की चपेट में


बंगाल की खाड़ी में बने लो-प्रेशर सिस्टम और पश्चिमी विक्षोभ के संयुक्त असर से देश के कई हिस्सों में अगले कुछ दिनों तक भारी बारिश की आशंका बनी हुई है।


गुजरात में लगातार बारिश के कारण कई जिले बाढ़ की चपेट में हैं। 40 हज़ार 500 से ज़्यादा लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा चुका है। बारिश से जुड़े हादसों में 5 लोगों की मौत हुई है और एहतियात के तौर पर अहमदाबाद में स्कूल, कॉलेज और आंगनवाड़ी केंद्र बंद रखे गए।


हिमाचल प्रदेश में भारी बारिश और भूस्खलन ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है। राज्य में 100 से ज़्यादा सड़कें बंद हैं और कई इलाकों का संपर्क टूट गया है। उत्तराखंड में भी हालात चिंताजनक बने हुए हैं, उत्तरकाशी में भूस्खलन के कारण गंगोत्री और यमुनोत्री हाईवे बाधित हुए, जबकि पिथौरागढ़ समेत कई जिलों में सड़कें बंद हैं। मौसम विभाग ने अगले तीन दिनों के लिए कई पर्वतीय जिलों में ऑरेंज और येलो अलर्ट जारी किया है।


जम्मू-कश्मीर की तस्वीर भी इस मानसून में बेहद डरावनी रही है। जुलाई के पहले तीन हफ्तों में ही लगातार बादल फटने, फ्लैश फ्लड और भूस्खलन की घटनाओं में कम से कम 28 लोगों की जान जा चुकी है, इसी दौरान 15 से 16 बार बादल फटने की घटनाएं दर्ज हुईं, जो अपने आप में एक असामान्य आंकड़ा है। सबसे ज़्यादा तबाही पुंछ और राजौरी में देखी गई, जहां सुरनकोट तहसील के लोअर मुर्रा इलाके में फ्लैश फ्लड ने कई घर बहा दिए। चिनाब नदी का जलस्तर बढ़ने के बाद बगलिहार और सलाल बांधों से नियंत्रित तरीके से पानी छोड़ा गया, वहीं भारी बारिश के चलते वैष्णो देवी यात्रा भी कुछ दिनों के लिए रोकनी पड़ी थी। मौसम विभाग ने 28 से 31 जुलाई के बीच जम्मू संभाग में एक और भारी बारिश के दौर की चेतावनी दी है।


उत्तर प्रदेश में गंगा, यमुना समेत 10 नदियां उफान पर हैं, घाघरा और शारदा सहित चार नदियां खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं। बलिया में सरयू नदी के कटाव से एक सरकारी स्कूल और एक मकान नदी में समा गया, गोंडा में सौ बीघे से अधिक फसल जलमग्न हो गई। सीतापुर, लखीमपुर, पीलीभीत और बहराइच में बाढ़ जैसे हालात हैं, जहां कई इलाकों में मगरमच्छ तक रिहायशी क्षेत्रों में पहुंच गए हैं।


बिहार के 17 जिलों में तेज़ बारिश, आकाशीय बिजली और तेज़ हवाओं का येलो अलर्ट जारी किया गया है। विडंबना ये है कि राज्य में अब तक सामान्य से 37 प्रतिशत कम बारिश दर्ज हुई है, यानी एक ही राज्य में बारिश का खतरा भी है और बारिश की कमी भी।


झारखंड और छत्तीसगढ़ में आकाशीय बिजली भी इस मानसून में बड़ी चुनौती बनकर सामने आई है। झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम में खेत में काम कर रहीं दो महिलाओं की बिजली गिरने से मौत हो गई, जबकि छत्तीसगढ़ के कोरबा में धान की रोपाई कर रहे तीन किसानों की जान चली गई।




अगले 48 घंटों में क्या, IMD का ताज़ा अलर्ट


भारत मौसम विज्ञान विभाग के मुताबिक 31 जुलाई तक उत्तर, मध्य और पूर्वी भारत के कई हिस्सों में भारी से बहुत भारी बारिश का दौर जारी रह सकता है। 27 जुलाई को हिमाचल, उत्तराखंड, गुजरात क्षेत्र और ओडिशा में ऑरेंज अलर्ट है, जबकि पूर्वी मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में आकाशीय बिजली गिरने की चेतावनी है। 


28 जुलाई को हालात और गंभीर होंगे, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा-चंडीगढ़-दिल्ली, ओडिशा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में बहुत भारी बारिश की चेतावनी है, वहीं जम्मू-कश्मीर, बिहार, पूर्वोत्तर भारत और दक्षिण भारत के तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक व केरल में तेज़ हवाओं के साथ बारिश की आशंका है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा, असम और पूर्वोत्तर के कई राज्यों के लिए अलर्ट जारी किया गया है।




एक ही समय पर बाढ़ और सूखे जैसे हालात क्यों?


मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि अब समस्या सिर्फ इस बात की नहीं है कि कितनी बारिश हुई, बल्कि इस बात की है कि बारिश कब, कहां और कितनी देर में हुई। पहले जहां किसी इलाके में कई दिनों तक हल्की या मध्यम बारिश होती थी, वहीं अब कुछ घंटों में ही पूरे महीने जितनी बारिश दर्ज हो जाती है। यही वजह है कि अचानक बाढ़, शहरी जलभराव और भूस्खलन जैसी घटनाएं पहले की तुलना में कहीं ज़्यादा देखने को मिल रही हैं।


बंगाल की खाड़ी में बना निम्न दबाव का क्षेत्र, सक्रिय मानसून ट्रफ और पश्चिमी विक्षोभ मिलकर देश के कई हिस्सों में भारी बारिश करा रहे हैं, जबकि कुछ क्षेत्रों तक पर्याप्त नमी नहीं पहुंच पा रही, जिससे वहां सामान्य से कम बारिश दर्ज हो रही है। बिहार जैसे राज्यों में बारिश का कुल आंकड़ा सामान्य से कम है, लेकिन कई इलाकों में बाढ़ जैसी स्थिति बन रही है, वहीं राजस्थान और कुछ पश्चिमी क्षेत्रों में अच्छी बारिश का इंतज़ार अब भी जारी है।




वैज्ञानिक मानते हैं कि इसके पीछे सिर्फ मौजूदा मौसम प्रणाली ही ज़िम्मेदार नहीं है। पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है और हिंद महासागर भी पहले की तुलना में ज़्यादा गर्म हो चुका है। गर्म समुद्र ज़्यादा जलवाष्प पैदा करते हैं, और जब यही नमी सक्रिय मानसून से मिलती है, तो कम समय में अत्यधिक बारिश की घटनाएं बढ़ जाती हैं। विश्व मौसम संगठन और कई अंतरराष्ट्रीय जलवायु अध्ययनों में भी कहा गया है कि बढ़ते वैश्विक तापमान के साथ चरम वर्षा की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।


क्या ये सच में पहले से ज़्यादा खतरनाक हो रहा है? इसका जवाब सिर्फ इस साल के आंकड़ों में नहीं, बल्कि दशकों के रिकॉर्ड में छिपा है। भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM) के एक बड़े अध्ययन के मुताबिक, मध्य भारत में एक दिन में अत्यधिक भारी बारिश की घटनाएं 1950 से 2015 के बीच लगभग तीन गुनी बढ़ गई हैं, जबकि इसी दौरान मानसून की सामान्य, फैली हुई बारिश में लगातार कमी आई है। यानी बारिश की कुल मात्रा भले न बदली हो, लेकिन उसका स्वरूप कहीं ज़्यादा उग्र और अप्रत्याशित हो गया है।




बदलते मौसम से अल नीनो और ला नीना का क्या संबंध


अल नीनो और ला नीना दरअसल प्रशांत महासागर के तापमान में आने वाला उतार-चढ़ाव हैं, जो पूरी दुनिया के मौसम को प्रभावित करते हैं। अल नीनो के दौरान समुद्र सामान्य से गर्म हो जाता है और भारत का मानसून अक्सर कमज़ोर पड़ जाता है, जबकि ला नीना के दौरान समुद्र ठंडा पड़ता है और आमतौर पर भारत में बेहतर बारिश की स्थितियां बनती हैं। 


अंतरराष्ट्रीय मौसम एजेंसियों की जुलाई 2026 की ताज़ा रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रशांत महासागर में फिलहाल अल नीनो की स्थितियां लगातार मज़बूत हो रही हैं, ला नीना नहीं, और जुलाई के मध्य तक समुद्री सतह का तापमान सामान्य से काफी ऊपर पहुंच चुका है। कई जलवायु वैज्ञानिकों का आकलन है कि ये अल नीनो साल के आख़िर तक अब तक की सबसे तीव्र घटनाओं में से एक बन सकता है। इतिहास गवाह है कि अल नीनो के वर्षों में भारत का मानसून अक्सर कमज़ोर और असंतुलित रहा है, ठीक वैसा ही असर इस बार बिहार और राजस्थान जैसे राज्यों में भी दिख रहा है।


लेकिन वैज्ञानिक ये भी जोड़ते हैं कि अकेला अल नीनो ही पूरी कहानी नहीं है। हिंद महासागर बीते कुछ दशकों में वैश्विक औसत से भी तेज़ रफ़्तार से गर्म हुआ है, और यही अतिरिक्त गर्मी बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से उठने वाले नमी भरे तूफानों को पहले से ज़्यादा ताकतवर बना रही है। यानी अल नीनो मौसम को एक दिशा में धकेलता है, तो गर्म होता हिंद महासागर उसी बारिश को और उग्र बना देता है, दोनों मिलकर वो डबल असर पैदा कर रहे हैं, जिसे आज देश अलग-अलग राज्यों में एक साथ झेल रहा है।

हालांकि वैज्ञानिक ये भी साफ करते हैं कि किसी एक बाढ़ या बारिश की घटना को सिर्फ अल नीनो या ला नीना से जोड़कर नहीं देखा जा सकता, स्थानीय मौसम प्रणाली, समुद्री तापमान और जलवायु परिवर्तन मिलकर मौसम की तस्वीर तय करते हैं।





क्या इस नई क्लाइमेट रियलिटी के लिए तैयार है भारत 


इस असंतुलन की सबसे बड़ी कीमत खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था चुका रही है। असम में हज़ारों हेक्टेयर फसल पहले ही बर्बाद हो चुकी है, जबकि जिन राज्यों में बारिश कम है वहां किसान बुवाई को लेकर असमंजस में हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर मौसम का ये असंतुलन लंबे समय तक बना रहा, तो इसका असर सिर्फ खेती तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खाद्य कीमतों, ग्रामीण आय और देश की अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई दे सकता है।




विशेषज्ञों का कहना है कि अब सवाल सिर्फ इतना नहीं कि अगला मानसून कैसा रहेगा, सवाल ये है कि भारत को अब मौसम की तरह नहीं, बल्कि बदलती जलवायु की तरह सोचना और जीना सीखना होगा, जहां चेतावनी प्रणाली, पहाड़ों पर सोच-समझकर निर्माण और आपदा से पहले की तैयारी, विकल्प नहीं बल्कि ज़रूरत बन चुकी है।


असम के उस पिता ने अपने तीन बच्चों को बचाने के लिए एक टब को नाव बना लिया। लेकिन सवाल ये है, क्या हर साल लाखों लोगों को अपनी ज़िंदगी बचाने के लिए ऐसे ही जुगाड़ करने पड़ेंगे, या फिर भारत बदलते मौसम के साथ बेहतर तैयारी के साथ खड़ा हो पाएगा?

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