SIR पर बढ़े सवाल: कहीं जीवित मतदाता मृत घोषित, कहीं 1900 की जन्मतिथि; कई राज्यों में गड़बड़ियां
SIR के दौरान कर्नाटक में जीवित मतदाताओं को मृत दिखाने के आरोप, गोवा में 97 पात्र मतदाताओं के नाम गायब होने और महाराष्ट्र में जन्मतिथि की गड़बड़ी सामने आई। दिल्ली और पश्चिम बंगाल में नोटिस व अपीलों ने भी चुनाव आयोग पर सवाल बढ़ाए।
दिल्ली: विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत मतदाता सूचियों को दुरुस्त करने की प्रक्रिया के बीच देश के अलग-अलग राज्यों से कई तरह की गड़बड़ियों की खबरें सामने आई हैं। कहीं जीवित मतदाताओं को रिकॉर्ड में मृत दिखाने के आरोप लगे हैं, तो कहीं पात्र मतदाताओं के नाम अंतिम सूची से गायब मिले। महाराष्ट्र में लाखों मतदाताओं की जन्मतिथि से जुड़ी तकनीकी त्रुटि और दिल्ली व पश्चिम बंगाल में नोटिस तथा अपीलों की बड़ी संख्या ने भी चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं।
चुनाव आयोग का कहना है कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूचियों को साफ-सुथरा और सटीक बनाना है। हालांकि, सामने आए मामलों ने गलत नाम हटाए जाने, तकनीकी खामियों और शिकायतों के समय पर निपटारे को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं।
कर्नाटक: जीवित मतदाताओं को मृत दिखाने का आरोप, भाजपा विधायक के खिलाफ FIR
कर्नाटक के विजयपुरा में भाजपा विधायक बसनगौड़ा पाटिल यत्नाल के खिलाफ कथित तौर पर फर्जी मृत्यु प्रमाणपत्रों के जरिए आठ मतदाताओं के नाम हटवाने के प्रयास के आरोप में प्राथमिकी दर्ज की गई है। मामले में 50 वर्षीय सब्जी विक्रेता अब्दुलराजाक मौलासाब बगवान ने बताया कि बूथ स्तर के अधिकारी की ओर से सत्यापन के लिए संपर्क किए जाने के बाद उन्हें कागजों में मृत घोषित किए जाने की जानकारी मिली।
जिन आठ लोगों के नाम कथित तौर पर हटाने का प्रयास किया गया, उनमें छह महिलाएं और दो पुरुष शामिल बताए गए हैं। यत्नाल ने किसी भी गलत काम में शामिल होने से इनकार किया है और कहा है कि वह अदालत में प्राथमिकी को चुनौती देंगे। मामले में लगे आरोपों की जांच जारी है।
यह मामला कर्नाटक में फॉर्म-7 के कथित दुरुपयोग से जुड़ी अन्य शिकायतों के बीच सामने आया है। फॉर्म-7 का इस्तेमाल मतदाता सूची में किसी व्यक्ति के नाम शामिल किए जाने पर आपत्ति दर्ज कराने या मौजूदा नाम हटाने का अनुरोध करने के लिए किया जाता है। कांग्रेस ने भी चुनावी गड़बड़ियों के आरोप लगाए हैं। इन घटनाओं ने गलत तरीके से मतदाताओं के नाम हटाए जाने से रोकने के लिए मौजूद सुरक्षा उपायों पर बहस तेज कर दी है।
गोवा: पात्र होने के बावजूद अंतिम सूची से 97 मतदाताओं के नाम गायब
गोवा में द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, 97 मतदाताओं के मामले की जांच करने के बाद स्थानीय निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (ERO) ने उन्हें पात्र पाया, लेकिन इसके बावजूद उनके नाम अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो सके। रिपोर्ट के मुताबिक, गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने सात दिनों के भीतर आठ बार चुनाव आयोग को पत्र लिखकर पहले हटाए गए नामों को बहाल करने का तकनीकी रास्ता मांगा।
बताया गया कि ECINet सॉफ्टवेयर में नाम हटाए जाने की प्रक्रिया को वापस लेने यानी पहले की स्थिति में बहाल करने का विकल्प उपलब्ध नहीं था। इस प्रक्रिया पर जरूरी तकनीकी नियंत्रण आयोग के केंद्रीय कार्यालय के पास था। नतीजतन, अंतिम मतदाता सूची 97 नामों के बिना प्रकाशित हुई।
रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग ने भी स्वीकार किया कि ऐसी परिस्थितियों में नाम हटाने की प्रक्रिया को वापस लेने के लिए उसके सिस्टम में आवश्यक सुविधा उपलब्ध नहीं थी। यह मामला तकनीकी गड़बड़ी होने पर पात्र मतदाताओं के नाम समय रहते बहाल करने की व्यवस्था पर सवाल उठाता है।
महाराष्ट्र: 2.7 लाख मतदाताओं की जन्मतिथि में तकनीकी गड़बड़ी
महाराष्ट्र की प्रारूप मतदाता सूची में भी एक बड़ी तकनीकी त्रुटि सामने आई। रिपोर्ट के अनुसार, करीब 2.7 लाख मतदाताओं की उम्र 101 से 150 वर्ष के बीच दर्ज हो गई थी और उनके जन्म का वर्ष 1900 दिखाया गया था। यह समस्या मुख्य रूप से नासिक जिले के तीन विधानसभा क्षेत्रों में सामने आई।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने 2 सितंबर को चुनाव आयोग को इस गड़बड़ी की जानकारी दी थी। हालांकि, बार-बार संपर्क किए जाने के बाद 6 अक्टूबर को जाकर त्रुटि सुधारी गई। यह मामला मतदाता डेटा की गुणवत्ता और तकनीकी त्रुटियों को ठीक करने में लगने वाले समय पर सवाल खड़े करता है।
दिल्ली: 33 लाख मतदाताओं को नोटिस, 20 लाख मामलों का निपटारा
दिल्ली में प्रारूप मतदाता सूची में अपनी पात्रता साबित करने के लिए करीब 33 लाख मतदाताओं को नोटिस जारी किए गए। 12 अक्टूबर तक लगभग 20 लाख मामलों का निपटारा किए जाने की जानकारी सामने आई। हालांकि, इन आंकड़ों में स्वीकार किए गए और खारिज किए गए, दोनों तरह के मामले शामिल हैं। इसलिए 20 लाख मामलों का निपटारा होने का अर्थ यह नहीं है कि इन सभी मतदाताओं की पात्रता स्वीकार कर ली गई है। इस बीच, उच्चतम न्यायालय ने तथाकथित तार्किक विसंगतियों के आधार पर नोटिस जारी किए जाने के कारणों पर भी सवाल उठाए हैं और चुनाव आयोग से जवाब मांगा है।
इस घटनाक्रम ने उन मतदाताओं के लिए स्पष्ट प्रक्रिया और समय पर राहत की जरूरत को रेखांकित किया है, जिनके रिकॉर्ड में गलती हो सकती है या जिन्हें अपनी पात्रता साबित करने के लिए नोटिस मिला है।
पश्चिम बंगाल: लाखों मतदाताओं ने नाम हटाए जाने के खिलाफ की अपील
पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग ने उच्चतम न्यायालय को बताया कि जांच प्रक्रिया के दौरान हटाए गए 27 लाख मतदाताओं में से लगभग 22.2 लाख ने अपने नाम हटाए जाने के खिलाफ अपील की है। आयोग के अनुसार, अन्य लोगों के नाम मतदाता सूची में शामिल किए जाने के खिलाफ भी लगभग 16.1 लाख अपीलें दर्ज की गई हैं।
अपीलों की इतनी बड़ी संख्या ने उनके निपटारे में लगने वाले समय को लेकर चिंता बढ़ा दी है। मुख्य सवाल यह है कि जिन पात्र मतदाताओं के नाम सूची से हट गए हैं, उन्हें समय रहते राहत और नाम बहाली का अवसर कैसे मिलेगा।
चुनाव आयोग के भीतर मतभेदों की खबर
SIR को लेकर सवाल केवल मतदाता सूचियों और तकनीकी खामियों तक सीमित नहीं हैं। द इंडियन एक्सप्रेस की एक पड़ताल में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों के दौरान मतदाताओं के नाम जोड़ने, हटाने और मतदाता सूची के डेटा पर नियंत्रण से जुड़े फैसलों को लेकर 14 बार औपचारिक आपत्तियां उठाईं।
वहीं, चुनाव आयोग का कहना है कि संस्थान के भीतर विचारों में अंतर होना सामान्य बात है और SIR सहित संबंधित फैसले सर्वसम्मति से लिए गए। इस रिपोर्ट के बाद आयोग के आंतरिक कामकाज और निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर भी चर्चा तेज हुई है।
SIR की प्रक्रिया पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
कर्नाटक में कथित गलत तरीके से नाम हटाने के प्रयास, गोवा में पात्र मतदाताओं के नाम अंतिम सूची में शामिल नहीं हो पाना, महाराष्ट्र में जन्मतिथि से जुड़ी बड़ी तकनीकी त्रुटि और दिल्ली तथा पश्चिम बंगाल में नोटिस व अपीलों की संख्या—इन सभी मामलों ने मतदाता सूची की सटीकता पर ध्यान केंद्रित किया है।
SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को दुरुस्त करना है, लेकिन इसके साथ यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि किसी पात्र मतदाता का नाम गलती से न हटे और रिकॉर्ड में त्रुटि होने पर उसे समय रहते सुधारा जा सके। सामने आए मामलों में आरोपों, तकनीकी खामियों और प्रशासनिक देरी की प्रकृति अलग-अलग है। इनका अंतिम आकलन संबंधित जांच, आधिकारिक जवाबों और अपीलों के निपटारे के आधार पर ही किया जा सकेगा।