'हर नागरिक का जीवन अनमोल': 5 प्वांइट्स से समझिए सोनम वांगचुक के अनशन से जुड़ा मामला...

सोनम वांगचुक का यह संघर्ष अब केवल एक व्यक्तिगत भूख हड़ताल नहीं, बल्कि भारतीय शिक्षा प्रणाली में सुधार की एक बड़ी मुहिम बन चुका है। दिल्ली हाईकोर्ट के दखल ने उनके जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक कदम बढ़ाया है, लेकिन असली समाधान सरकार के हाथों में है।

By  Preeti Kamal July 16th 2026 01:40 PM -- Updated: July 16th 2026 12:55 PM

नई दिल्ली: जलवायु कार्यकर्ता और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल आज (16 जुलाई 2026) अपने 19वें दिन में प्रवेश कर गई है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर कड़ाके की गर्मी और शारीरिक कमजोरी के बावजूद वांगचुक अपने संकल्प पर डटे हुए हैं। इस बीच, दिल्ली हाईकोर्ट ने उनके स्वास्थ्य को लेकर केंद्र सरकार को कड़े निर्देश दिए हैं।

यह विरोध केवल लद्दाख के मुद्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की शिक्षा व्यवस्था और प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता की मांग को लेकर है। GTC News के इस विशेष एक्सप्लेनर में आइए जानते हैं कि इस पूरे आंदोलन की मुख्य वजह क्या है और कोर्ट ने इस पर क्या रुख अपनाया है।


1. अनशन की शुरुआत और मुख्य कारण

सोनम वांगचुक ने 28 जून 2026 को जंतर-मंतर पर अपनी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी। हालांकि वे अक्सर लद्दाख के पर्यावरण और संवैधानिक अधिकारों के लिए आवाज उठाते रहे हैं, लेकिन इस बार उनके आंदोलन का मुख्य केंद्र NEET-UG 2026 परीक्षा में हुई कथित अनियमितताएं और पेपर लीक का मामला है। वे कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा शुरू किए गए विरोध प्रदर्शन का समर्थन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगें निम्नलिखित हैं:

  • NEET पेपर लीक मामले की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा।
  • नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) को भंग करना।
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 की समीक्षा और शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही तय करना।
  • पेपर लीक के कारण प्रभावित छात्रों के परिवारों को मुआवजा देना।

2. दिल्ली हाईकोर्ट का हस्तक्षेप: "जीवन अनमोल है"

वांगचुक के बिगड़ते स्वास्थ्य को देखते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी। इस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की। हाईकोर्ट ने कहा कि सोनम वांगचुक का स्वास्थ्य और सुरक्षा 'अनमोल' है।

कोर्ट ने सरकार को क्या आदेश दिए?

  • नियमित जांच: सरकारी डॉक्टरों की एक टीम द्वारा वांगचुक की रोजाना (Daily) मेडिकल जांच की जानी चाहिए।
  • तत्काल हस्तक्षेप: यदि डॉक्टरों की रिपोर्ट में स्वास्थ्य के गंभीर रूप से बिगड़ने के संकेत मिलते हैं, तो सरकार को तुरंत हस्तक्षेप करना होगा।
  • सुरक्षा का भरोसा: सॉलिसिटर जनरल ने कोर्ट को आश्वासन दिया है कि मेडिकल सलाह के आधार पर वांगचुक को हर संभव सहायता और सुरक्षा प्रदान की जाएगी।

3. स्वास्थ्य बुलेटिन: 19 दिनों में क्या बदला?

मेडिकल बुलेटिन (CJP द्वारा जारी) के अनुसार, 19 दिनों के अनशन ने वांगचुक के शरीर पर गहरा प्रभाव डाला है। राष्ट्रीय समाचारों में उनकी स्थिति को लेकर चिंता जताई जा रही है।

ताजा स्वास्थ्य आंकड़े (16 जुलाई 2026 तक):

  • वजन में गिरावट: अनशन शुरू होने के बाद से उनका वजन 8.9 किलोग्राम कम हो गया है।
  • वर्तमान वजन: 57.15 किलोग्राम
  • रक्तचाप (BP): 105/76 mmHg
  • शुगर लेवल: 80 mg/dL
  • ऑक्सीजन स्तर: 97%

डॉक्टर्स का कहना है कि उन्हें चलने-फिरने में काफी कठिनाई हो रही है और वे थकान महसूस कर रहे हैं, हालांकि वे मानसिक रूप से पूरी तरह सतर्क (Alert) हैं।

4. वांगचुक का अडिग रुख और 20 जुलाई की रणनीति

कई विपक्षी नेताओं, जिनमें उद्धव ठाकरे भी शामिल हैं, ने वांगचुक से अनशन समाप्त करने की अपील की है। हालांकि, वांगचुक ने स्पष्ट कर दिया है कि वे तब तक पीछे नहीं हटेंगे जब तक सरकार उनकी मांगों पर ठोस कदम नहीं उठाती। उन्होंने कहा, "अगर मैं अभी अनशन तोड़ देता हूं, तो सरकार को यह गलत संदेश जाएगा कि वे बिना किसी जवाबदेही के काम कर सकते हैं। यह लोकतंत्र और छात्रों के भविष्य के लिए ठीक नहीं है।"

20 जुलाई का आह्वान:

वांगचुक ने 20 जुलाई 2026 को देश भर के लोगों और छात्रों से जंतर-मंतर पर बड़ी संख्या में जुटने की अपील की है। इसी दिन संसद का मानसून सत्र भी शुरू हो रहा है। उनका लक्ष्य इस दिन सरकार को अपनी मांगों को लेकर एक कड़ा संदेश देना है।


5. राजनीतिक समर्थन और जमीनी कवरेज

इस आंदोलन को देश भर के नागरिक समाज और विपक्षी दलों का व्यापक समर्थन मिल रहा है। पंजाब और हरियाणा के कई छात्र संगठनों ने भी इस मांग को जायज ठहराया है। पंजाब की खबरों पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि यदि 20 जुलाई तक सरकार कोई समाधान नहीं निकालती, तो यह विरोध देशव्यापी रूप ले सकता है।

निष्कर्ष: सोनम वांगचुक का यह संघर्ष अब केवल एक व्यक्तिगत भूख हड़ताल नहीं, बल्कि भारतीय शिक्षा प्रणाली में सुधार की एक बड़ी मुहिम बन चुका है। दिल्ली हाईकोर्ट के दखल ने उनके जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक कदम बढ़ाया है, लेकिन असली समाधान सरकार के हाथों में है।

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