विवाद की जड़ और याचिका की मांग यह कानूनी विवाद पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में एक नई मस्जिद के निर्माण की घोषणा के बाद शुरू हुआ। निलंबित तृणमूल कांग्रेस (TMC) विधायक हुमायूं कबीर ने मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की एक 'प्रतिकृति' (Replica) बनाने का ऐलान किया था, जिसके बाद देवकी नंदन पांडे नामक याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिका में तर्क दिया गया था कि बाबर एक 'आक्रमणकारी' था और उसके नाम पर किसी भी धार्मिक ढांचे का निर्माण हिंदू समुदाय की भावनाओं को आहत करता है। याचिकाकर्ता ने केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश देने की मांग की थी कि वे बाबर या बाबरी नाम से जुड़ी किसी भी संरचना के नामकरण पर प्रतिबंध लगाने के लिए दिशा-निर्देश जारी करें।
सुप्रीम कोर्ट का रुख और टिप्पणी सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता के वकील ने बाबर को 'क्रूर आक्रमणकारी' बताते हुए अपनी दलीलें पेश कीं, तो पीठ ने मामले में हस्तक्षेप करने से साफ मना कर दिया। जस्टिस विक्रम नाथ ने कड़े शब्दों में कहा, "हम इसे खारिज कर रहे हैं, आप संदेश समझें और बहस बंद करें।" कोर्ट के इस सख्त रुख को देखते हुए वकील ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संवैधानिक रूप से किसी भी समुदाय को अपने धार्मिक स्थलों का नाम तय करने का अधिकार है और केवल ऐतिहासिक दावों के आधार पर इस तरह का 'ब्लैंकेट बैन' (पूर्ण प्रतिबंध) नहीं लगाया जा सकता। कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद याचिका को कानूनी रूप से समाप्त कर दिया गया।
राजनीतिक प्रतिक्रिया और सामाजिक प्रभाव सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। मुर्शिदाबाद में मस्जिद का निर्माण करा रहे हुमायूं कबीर ने कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए इसे 'संवैधानिक अधिकारों की जीत' बताया है। उन्होंने कहा कि भारत का संविधान हर नागरिक को अपनी पसंद का पूजा स्थल बनाने का अधिकार देता है। दूसरी ओर, याचिका का समर्थन करने वाले संगठनों ने निराशा व्यक्त की है। गौरतलब है कि 2019 के ऐतिहासिक राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने विवादित भूमि हिंदुओं को दी थी और मुसलमानों को मस्जिद के लिए अलग से 5 एकड़ जमीन आवंटित करने का आदेश दिया था। वर्तमान विवाद उसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जोड़कर देखा जा रहा है।