ट्रंप की हार पर अभिजीत दीपके का ज्ञानेश कुमार पर तंज, बोले- CEC होते तो नतीजे कुछ और होते
अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी की हार पर भारत में भी प्रतिक्रियाएं आई हैं। CJP प्रमुख अभिजीत दीपके ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर तंज कसा, जबकि प्रवक्ता सौरव दास ने इसे तानाशाही और मजबूत नेता की राजनीति के लिए झटका बताया।
नई दिल्ली: अमेरिका के 2026 मिडटर्म चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को मिली करारी शिकस्त के बाद भारत में भी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रमुख अभिजीत दीपके ने इस नतीजे को लेकर भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर तंज कसा है। उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि अगर अमेरिकी चुनाव ज्ञानेश कुमार की देखरेख में कराए गए होते, तो ट्रंप को इस तरह हार का सामना नहीं करना पड़ता।
दीपके की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब भारत में भी चुनाव आयोग की भूमिका और चुनावी प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक बहस जारी है। अभिजीत दीपके और उनके साथी पहले भी चुनाव आयोग के कामकाज पर सवाल उठाते रहे हैं। उनका आरोप है कि ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में आयोग की कार्यप्रणाली सत्तारूढ़ बीजेपी के पक्ष में झुकी हुई है। हालांकि, ये उनके राजनीतिक आरोप हैं, स्थापित तथ्य नहीं।
सौरव दास ने ट्रंप की राजनीति पर साधा निशाना
CJP के प्रवक्ता सौरव दास ने भी अमेरिकी चुनाव के नतीजों पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी की हार को दुनिया भर में तानाशाही और मजबूत नेता की छवि पेश करने वाली राजनीति के लिए झटका बताया।
दास ने सोशल मीडिया पर लिखा, "तानाशाह ट्रंप की पार्टी अमेरिकी प्रतिनिधि सभा और सीनेट, दोनों पर अपना नियंत्रण खो रही है। लगता है कि दुनिया भर में तानाशाह बनने की कोशिश करने वालों के लिए मुश्किल समय चल रहा है।"
उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र में किसी नेता की लोकप्रियता का दावा चुनावी नतीजों की कसौटी पर परखा जाता है। उनके मुताबिक, मजबूत नेता की छवि बनाने और सत्ता पर पकड़ बनाए रखने की कोशिश हमेशा मतदाताओं के फैसले के सामने सफल नहीं होती।
जवाबदेही को चुनावी जीत-हार से आगे रखने की बात
सौरव दास ने अपनी प्रतिक्रिया में केवल चुनावी नतीजों को ही अहम नहीं बताया, बल्कि सत्ता में बैठे नेताओं की जवाबदेही पर भी जोर दिया। उनका कहना है कि लोकतंत्र में सरकार बदलना या किसी पार्टी का चुनाव हारना ही पूरी प्रक्रिया नहीं है। चुनाव के बाद भी सत्ता में रहने वाले नेताओं और उनके सहयोगियों से सवाल पूछना जरूरी है।
दास ने इस राजनीतिक बदलाव को महंगाई, रोजगार और आर्थिक स्थिरता जैसे आम लोगों से जुड़े मुद्दों के संदर्भ में भी देखा। उनके मुताबिक, मतदाता केवल बड़े राजनीतिक नारों या मजबूत नेतृत्व की छवि से प्रभावित नहीं होते, बल्कि रोजमर्रा की समस्याओं और सरकार के प्रदर्शन को भी ध्यान में रखते हैं।
अमेरिकी चुनाव में डेमोक्रेट्स की बड़ी वापसी
अमेरिका में 3 नवंबर को हुए मिडटर्म चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी ने बड़ा उलटफेर करते हुए सीनेट और प्रतिनिधि सभा, दोनों में बहुमत हासिल किया। एसोसिएटेड प्रेस की 4 नवंबर की रिपोर्ट के अनुसार, डेमोक्रेट्स ने कई अहम सीटों पर जीत दर्ज की और रिपब्लिकन पार्टी से दोनों सदनों का नियंत्रण छीन लिया। यह परिणाम ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है।
चुनाव में महंगाई, जीवन-यापन की बढ़ती लागत, ईरान युद्ध और सरकार से जुड़ी चिंताएं मतदाताओं के प्रमुख मुद्दों में शामिल रहीं। डेमोक्रेट्स की जीत ने यह संकेत दिया कि अमेरिकी मतदाता मध्यावधि चुनावों के जरिए राष्ट्रपति की नीतियों और सरकार के प्रदर्शन पर अपनी राय जाहिर कर सकते हैं।
भारत की चुनावी बहस से भी जोड़ी जा रही है तुलना
अभिजीत दीपके का ज्ञानेश कुमार पर तंज और सौरव दास की टिप्पणी अमेरिकी चुनाव से आगे बढ़कर भारत में चुनाव आयोग की भूमिका पर चल रही बहस से भी जुड़ती है। दोनों नेताओं ने अमेरिकी नतीजों को अपने राजनीतिक नजरिए से पेश किया है।
हालांकि, अमेरिका और भारत की चुनावी व्यवस्थाएं, संस्थागत ढांचे और राजनीतिक परिस्थितियां अलग-अलग हैं। इसलिए दोनों देशों के चुनावों की सीधी तुलना सावधानी से की जानी चाहिए। फिलहाल अमेरिकी नतीजों ने ट्रंप की राजनीतिक रणनीति पर सवाल खड़े किए हैं, जबकि भारत में इन परिणामों को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है।