Explainer: ISRO के 100 वैज्ञानिकों ने क्यों छोड़ी नौकरी, क्या है नए एग्जिट नियम और गगनयान पर असर?

ISRO से 100 से अधिक वैज्ञानिकों के इस्तीफों के बाद सरकार ने एग्जिट नियम सख्त कर दिए हैं। जानिए इसकी वजह, नए नियम क्या हैं और क्या इसका गगनयान जैसे अहम मिशनों पर कोई असर पड़ेगा।

By  Preeti Kamal July 17th 2026 02:05 PM

नई दिल्ली: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO), जो अपनी किफ़ायती और सटीक अंतरिक्ष सफलताओं के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है, इस समय एक अभूतपूर्व प्रशासनिक चुनौती का सामना कर रहा है। पिछले कुछ महीनों में संगठन से अनुभवी वैज्ञानिकों और तकनीकी कर्मचारियों के इस्तीफे की खबरों ने राष्ट्रीय सुरक्षा और गगनयान जैसे महत्वपूर्ण मिशनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

आखिर इन इस्तीफों की असल वजह क्या है, कहीं इसके पीछे कोई ऐसी वजह तो नहीं जो किसी खास बात का संकेत कर रही हो। एक सवाल यह भी है कि कहीं इन इस्तीफों का असर वर्तमान में ISRO के किन प्रोजेक्ट्स पर पड़ेगा! इस विस्तृत लेख के माध्यम से हम उन तथ्यों का विश्लेषण करेंगे जो हाल ही में सामने आए हैं और जानेंगे कि क्या वास्तव में भारत के अंतरिक्ष मिशन खतरे में हैं?

1. ISRO में इस समय क्या हो रहा है और इस्तीफों का पैमाना क्या है?

ताजा आंकड़ों और रिपोर्टों के अनुसार, पिछले 10 महीनों के भीतर ISRO से 100 से अधिक वैज्ञानिकों और तकनीकी कर्मचारियों ने या तो इस्तीफा दे दिया है या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) ले ली है। यह संख्या इसलिए चौंकाने वाली है क्योंकि ये वैज्ञानिक संगठन की रीढ़ माने जाने वाले प्रमुख मिशनों का हिस्सा थे।

प्रभावित केंद्र: सबसे अधिक इस्तीफे यूआर राव सैटेलाइट सेंटर (URSC) से हुए हैं, जहां लगभग 80 वैज्ञानिकों ने पद छोड़ा है। इसके अलावा, तिरुवनंतपुरम स्थित विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (VSSC) से 20 से अधिक वैज्ञानिकों ने इस्तीफा दिया है।

स्थिति: हालांकि, यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है कि इन सभी इस्तीफों को अभी तक आधिकारिक तौर पर स्वीकार नहीं किया गया है, लेकिन आवेदन की संख्या चिंता का विषय बनी हुई है।


2. कौन-से बड़े मिशन और प्रमुख वैज्ञानिक इस बदलाव से प्रभावित हुए हैं?

इस्तीफा देने वालों में जूनियर कर्मचारी ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय महत्व के प्रोजेक्ट्स का नेतृत्व करने वाले वरिष्ठ वैज्ञानिक भी शामिल हैं। इनमें से कई का सीधा संबंध भारत के महत्वाकांक्षी गगनयान मिशन से है।

  • विक्टर जोसेफ टी: ये LVM3 (लॉन्च व्हीकल मार्क-3) के प्रोजेक्ट डायरेक्टर थे। गौरतलब है कि गगनयान मिशन के लिए इसी लॉन्च व्हीकल का इस्तेमाल किया जाना है।
  • आदित्य रल्लापल्ली: ये चंद्रयान-3 मिशन से जुड़े वरिष्ठ वैज्ञानिक थे।
  • SpaDeX प्रोजेक्ट डायरेक्टर: अंतरिक्ष में डॉकिंग मिशन (SpaDeX) का नेतृत्व करने वाले वरिष्ठ वैज्ञानिक ने भी URSC से इस्तीफा दिया है।

इन अनुभवी चेहरों के जाने से प्रोजेक्ट की निरंतरता पर अस्थायी दबाव पड़ने की संभावना जताई जा रही है।


3. वैज्ञानिक आखिर ISRO जैसी प्रतिष्ठित संस्था क्यों छोड़ रहे हैं?

विशेषज्ञों और रिपोर्टों के अनुसार, इसके पीछे कई आर्थिक और नीतिगत कारण हैं:

निजी अंतरिक्ष क्षेत्र का उदय: 2020 में अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने और 2023 की नई अंतरिक्ष नीति के बाद भारत में 400 से अधिक स्पेस स्टार्टअप सक्रिय हो गए हैं। पिक्सेल (Pixxel), ध्रुवा स्पेस, स्काईरूट एरोस्पेस और अग्निकुल कॉसमॉस जैसी कंपनियां अब ISRO के वैज्ञानिकों के लिए आकर्षक विकल्प बन गई हैं।

  • बेहतर पैकेज और अवसर: निजी कंपनियां न केवल ISRO की तुलना में कहीं अधिक वेतन दे रही हैं, बल्कि वे स्टॉक ऑप्शंस (ESOPs), तेज करियर ग्रोथ और काम करने के लचीले वातावरण का भी प्रस्ताव दे रही हैं।
  • मिशनों में देरी: हाल के वर्षों में कुछ मिशनों में हुई देरी (जैसे गगनयान की समयसीमा का आगे बढ़ना) और प्रशासनिक बाधाओं ने भी वैज्ञानिकों को नए अवसरों की ओर प्रेरित किया है।

पूर्व प्रमुखों का रुख: पूर्व ISRO चेयरमैन डॉ. एस. सोमनाथ का 'अग्निकुल कॉसमॉस' के बोर्ड में ऑब्जर्वर के तौर पर शामिल होना इस बात का बड़ा संकेत है कि प्रतिभा का प्रवाह अब सरकारी से निजी क्षेत्र की ओर हो रहा है।

4. क्या इन इस्तीफों से 'गगनयान' मिशन रुक जाएगा?

यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। सरकार और वर्तमान ISRO नेतृत्व ने इस पर स्पष्ट रुख अपनाया है:

  • डॉ. जितेंद्र सिंह का बयान: केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्यमंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने स्पष्ट किया है कि गगनयान मिशन नहीं रुका है और न ही रुकेगा। उन्होंने कहा कि संगठन में लोगों का आना-जाना एक सामान्य प्रक्रिया है।
  • संस्थागत मजबूती: ISRO के वर्तमान चेयरमैन वी. नारायणन के अनुसार, संगठन के पास ऐसी कार्यप्रणाली है जो किसी एक व्यक्ति के जाने से बाधित नहीं होती। हालांकि, पूर्व वैज्ञानिकों का मानना है कि 20-25 साल के अनुभव वाले व्यक्ति के जाने से "अस्थायी झटका" लग सकता है, लेकिन मौजूदा टीमें इस अंतर को भरने में सक्षम हैं।
  • विफलता का संदर्भ: यह ध्यान देना भी जरूरी है कि हाल ही में PSLV-C62 (जनवरी 2026) और PSLV-C61 (मई 2024) जैसे मिशनों में कुछ तकनीकी विफलताएं देखी गईं, जिसके बाद टीम पर प्रदर्शन का दबाव बढ़ गया है।


5. सरकार ने इस्तीफों को रोकने के लिए नियमों में क्या बदलाव किए हैं?

वैज्ञानिकों के पलायन को नियंत्रित करने के लिए अंतरिक्ष विभाग (Department of Space - DoS) ने 14 जुलाई 2026 को एक नया और सख्त निर्देश जारी किया है:

  • निर्णय लेने की शक्ति: अब तक वैज्ञानिकों के इस्तीफे या VRS पर फैसला ISRO के अलग-अलग केंद्रों के निदेशकों के पास होता था। अब इसे बदलकर सीधे 'अंतरिक्ष विभाग' को सौंप दिया गया है।
  • ग्रुप 'ए' वैज्ञानिकों पर सख्ती: गगनयान और अन्य रणनीतिक मिशनों पर काम कर रहे 'ग्रुप ए' के वैज्ञानिकों के इस्तीफे अब आसानी से स्वीकार नहीं किए जाएंगे। सरकार चाहती है कि महत्वपूर्ण मिशनों के बीच में प्रतिभा का नुकसान न हो।
  • प्रशासनिक तर्क: सरकार का कहना है कि यह निर्णय अधिक "परिपक्व स्तर" पर फैसले लेने के लिए किया गया है ताकि राष्ट्रीय हितों की रक्षा की जा सके।

6. क्या यह ISRO के लिए वास्तव में कोई 'संकट' है?

आंकड़ों के नजरिए से देखें तो राय बंटी हुई है:

अट्रिशन रेट (Attrition Rate): पूर्व वैज्ञानिक राधा कृष्ण कवुलुरु के अनुसार, URSC में अट्रिशन दर लगभग 7% है। यदि इसकी तुलना भारतीय आईटी उद्योग (15%) से की जाए, तो यह काफी कम है। उनके अनुसार, यह संकट नहीं बल्कि एक नए "स्पेस इकोसिस्टम" के गठन का संकेत है।

कार्य वातावरण की चुनौती: कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि समस्या केवल वेतन नहीं है, बल्कि "नौकरशाही मानसिकता" और काम करने का माहौल भी है। यदि ISRO को अपनी श्रेष्ठता बरकरार रखनी है, तो उसे अपनी प्रतिभा को सहेजने के लिए अधिक लचीलापन अपनाना होगा।

निष्कर्ष: ISRO से वैज्ञानिकों का जाना निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण मोड़ है, लेकिन इसे गगनयान की पूर्ण विफलता के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। सरकार के नए सख्त नियम और निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी भारत को एक नए 'स्पेस ईरा' में ले जा रही है, जहां सरकारी और निजी संस्थाओं के बीच प्रतिभा का संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती होगी।

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