Meta पर दुनिया भर में सवाल: अमेरिका में 9000 करोड़ जुर्माना, भारत में पोस्ट हटाने पर बवाल
दुनिया की सबसे बड़ी सोशल मीडिया कंपनी इस वक्त हर मोर्चे पर घिरी है। अमेरिका में अदालत का रिकॉर्ड जुर्माना, भारत में सरकार से माफी, और अरविंद केजरीवाल का नया आरोप। जानिए पूरी कहानी, सिलसिलेवार।
नई दिल्ली: फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप, तीनों की मालिक कंपनी मेटा इस वक्त एक साथ कई विवादों में घिरी है। अमेरिका की एक अदालत ने कंपनी पर 9 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का जुर्माना लगाया है। भारत में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक पोस्ट फेसबुक से हटाए जाने के बाद मामला संसद तक पहुंच गया, और मेटा के CEO मार्क जुकरबर्ग को भारत सरकार से माफी मांगनी पड़ी। और अब दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का एक नया दावा सामने आया है, जो कंपनी को बिल्कुल उलट दिशा से घेर रहा है।
यहां पूरा मामला विस्तार से समझिए।
अमेरिका में मेटा पर 9030 करोड़ रुपए का जुर्माना बच्चों की मेंटल हेल्थ के मामले में लगाया गया है। यह पूरा मामला दिसंबर 2023 में शुरू हुआ था, जब अमेरिका के न्यू मैक्सिको राज्य के अटॉर्नी जनरल राउल टोरेस ने मेटा और उसके CEO मार्क जुकरबर्ग के खिलाफ मुकदमा दायर किया। आरोप था कि फेसबुक और इंस्टाग्राम पर ऐसे फीचर्स और एल्गोरिदम इस्तेमाल किए गए, जो बच्चों और किशोरों में लत पैदा करते हैं, उन्हें घंटों स्क्रीन से जोड़े रखते हैं, और मानसिक स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह साबित होते हैं। साथ ही यह भी आरोप था कि कंपनी ने बच्चों को यौन शोषण के खतरों से बचाने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए।
करीब ढाई साल की सुनवाई के बाद, 24 मार्च 2026 को न्यू मैक्सिको की जूरी ने मेटा को दोषी ठहराया। जूरी ने माना कि कंपनी को पहले से पता था कि उसके प्लेटफॉर्म पर बच्चों का यौन शोषण हो रहा है, फिर भी उसने इसे छुपाया। इसके लिए मेटा पर 375 मिलियन डॉलर, यानी करीब 3571 करोड़ रुपए का जुर्माना तय हुआ। इसी दौरान मार्च 2026 में मार्क जुकरबर्ग की रिकॉर्डेड गवाही भी कोर्ट में पेश की गई थी।

मामले का दूसरा फेज मुआवजे को लेकर था। 4 मई से 22 मई 2026 तक इस पर सुनवाई चली। अगस्त 2026 में कोर्ट ने अतिरिक्त 567 मिलियन डॉलर, यानी करीब 5390 करोड़ रुपए का जुर्माना और जोड़ दिया। कुल मिलाकर मेटा पर अब 942 मिलियन डॉलर, यानी 9030 करोड़ रुपए की देनदारी है।
इसमें से 420 मिलियन डॉलर (करीब 3993 करोड़ रुपए) सीधे युवाओं के इलाज पर खर्च होंगे। बाकी बची रकम अगले 5 साल में अवेयरनेस, प्रिवेंशन और स्क्रीनिंग सर्विसेज़ जैसे कार्यक्रमों पर लगाई जाएगी।
आरोप आखिर लगे क्यों?
जांच में सामने आया कि मेटा का एल्गोरिदम खासतौर पर इस तरह बनाया गया है कि बच्चे प्लेटफॉर्म पर ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताएं। इसके पीछे चार तरीके काम करते हैं:
- पर्सनलाइजेशन: वही कंटेंट बार-बार दिखाना, जो यूज़र को पसंद हो
- नोटिफिकेशन ट्रिगर: बार-बार सूचना भेजकर वापस बुलाना
- इनफिनिट स्क्रॉल: कंटेंट का कभी खत्म न होना
- रील्स/शॉर्ट वीडियो: तेजी से बदलता कंटेंट, जो दिमाग को लगातार रिवॉर्ड जैसा महसूस कराता है
आंकड़े भी इसकी गंभीरता बताते हैं। प्यू रिसर्च सेंटर के मुताबिक करीब 46% अमेरिकी टीनएजर्स मानते हैं कि वे लगभग हमेशा ऑनलाइन रहते हैं। अमेरिका के सर्जन जनरल ने 2023 में ही चेतावनी दी थी कि सोशल मीडिया का ज्यादा इस्तेमाल बच्चों में डिप्रेशन और एंग्जाइटी का खतरा बढ़ाता है। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल की रिसर्च के मुताबिक, सोशल मीडिया पर मिलने वाले लाइक्स और नया कंटेंट दिमाग में डोपामिन रिलीज करता है, वैसे ही, जैसे किसी नशे की लत में होता है।

मेटा का रुख और कानून की उलझन
मेटा इस फैसले को मानने को तैयार नहीं है। मार्च 2026 में ही कंपनी ने ऐलान कर दिया था कि वह इसके खिलाफ अपील करेगी। कंपनी का कहना है कि वह प्लेटफॉर्म पर सुरक्षा के लिए लगातार काम कर रही है, लेकिन हर “बैड एक्टर” को रोकना मुमकिन नहीं।
दिलचस्प बात यह भी है कि खुद कोर्ट ने कहा कि बच्चों की प्राइवेसी से जुड़ा अमेरिकी कानून COPPA मेटा को 13 साल से कम उम्र के बच्चों का एज वैरिफिकेशन करने से रोकता है। यानी जो कानून बच्चों की हिफाजत के लिए बनाया गया, वही फिलहाल इस समस्या के एक बड़े समाधान में रोड़ा बना हुआ है।
जानकारों का मानना है कि यह मामला यहीं नहीं थमेगा। न्यू मैक्सिको का यह फैसला आगे एक बड़ी मिसाल बन सकता है, और अमेरिका के 40 से ज्यादा राज्यों के अटॉर्नी जनरल मेटा के खिलाफ इसी तरह का सख्त रुख अपना सकते हैं।

भारत में विवाद: PM मोदी की पोस्ट हटी, मांगनी पड़ी माफी
23 जुलाई की रात, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने X हैंडल पर एक वीडियो संदेश पोस्ट किया, जिसकी अवधि 2 मिनट 56 सेकंड थी। इसमें उन्होंने पेपर लीक के खिलाफ सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया, और फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने के निर्देश की जानकारी दी।
यह वीडियो NEET-UG पेपर लीक विवाद और 36-दिन लंबे छात्र आंदोलन के बीच PM का Gen-Z को पहला सीधा संबोधन था। यह आंदोलन 25 जुलाई को तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ खत्म हुआ। इससे पाठक को समझ आएगा कि पोस्ट इतनी संवेदनशील क्यों थी।
“पेपर लीक कोई मामूली विषय नहीं है। लाखों छात्रों, उनके माता-पिता के लिए पीड़ादायक है... हमारी जिम्मेदारी थी कि छात्रों का साल बर्बाद न हो, इसलिए कम समय में 22 लाख छात्रों का एग्जाम कराया... इसलिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का निर्देश दिया है।”
28 जुलाई को यही वीडियो इंस्टाग्राम और फेसबुक पर उपलब्ध नहीं रहा। यूज़र्स को स्क्रीन पर संदेश मिला कि पोस्ट भारत में एक कानूनी अनुरोध की वजह से उपलब्ध नहीं है। कुछ ही घंटों में पोस्ट बहाल कर दी गई, और मेटा ने इसे तकनीकी गड़बड़ी बताया।
सरकार ने इस स्पष्टीकरण को पर्याप्त नहीं माना। क्योंकि प्रभावित अकाउंट देश के प्रधानमंत्री का सत्यापित अकाउंट था। उसी दिन आईटी मंत्रालय ने मेटा से जवाब मांगा।
टाइमलाइन: पोस्ट हटने से माफी तक
4 अगस्त: मेटा के अधिकारियों ने आईटी सचिव एस. कृष्णन से मुलाकात की। सरकार ने साफ कहा कि ऐसी गलती दोबारा नहीं होनी चाहिए।
5 अगस्त: मामला संसद तक पहुंचा। संचार और सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने मेटा के अधिकारियों को तलब किया। समिति अध्यक्ष निशिकांत दुबे ने मांग रखी कि मार्क जुकरबर्ग तीन दिन के भीतर बिना शर्त माफी मांगें, वरना भारत में मिलने वाली सेफ हार्बर सुरक्षा पर पुनर्विचार किया जा सकता है, और इसके बाद कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है।
बुधवार को मेटा की ग्लोबल टीम, चीफ ग्लोबल अफेयर्स ऑफिसर जोएल कैप्लन के नेतृत्व में, आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव और सचिव एस. कृष्णन से मिली। कैप्लन ने कंपनी की ओर से PM की पोस्ट गलती से हटाने पर माफी मांगी। इसके अलावा, सरकारी सूत्रों (PTI) के हवाले से यह भी सामने आया कि जुकरबर्ग ने CSAM, डीपफेक कंटेंट और प्लेटफॉर्म संचालन की गलतियों पर माफी भेजी। हालांकि मेटा ने इस दावे की पुष्टि नहीं की।

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, इस माफी के साथ मेटा ने कुछ अहम बातें भी स्वीकार कीं:
- कंपनी के प्लेटफॉर्म पर चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज मैटेरियल (CSAM) मौजूद है
- कंपनी डीपफेक कंटेंट को रोकने में नाकाम रही
- कुछ खास तरह के कंटेंट को बढ़ावा देने के लिए बड़ी रकम खर्च की गई, जिससे अवैध कंटेंट को भी प्रमोशन मिला
सरकार ने मेटा से यह भी कहा कि वह खुद को केवल एक “इंटरमीडियरी” यानी बिचौलिया नहीं बता सकती, क्योंकि कंटेंट किस यूज़र तक पहुंचेगा, यह फैसला मेटा खुद करती है- इसलिए कंपनी को IT एक्ट के तहत मिलने वाली सेफ हार्बर सुरक्षा का लाभ नहीं मिल सकता।
इसी दौरान एक और मामला सामने आया। हैदराबाद साइबर क्राइम पुलिस ने मेटा इंडिया के हेड अरुण श्रीनिवास और कई सोशल मीडिया अकाउंट हैंडलर्स के खिलाफ FIR दर्ज की। यह मामला PM मोदी के एक AI मॉर्फ्ड (डीपफेक) वीडियो से जुड़ा था, जिसे जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान शेयर किया गया था। भाजपा कार्यकर्ताओं की शिकायत पर दो अलग मामले दर्ज हुए, और श्रीनिवास को दोनों में सह-आरोपी बनाया गया।

केंद्र सरकार अब मेटा की ग्लोबल टीम से सीधे पूछताछ करने की तैयारी में है। सूत्रों के मुताबिक, टीम अगले हफ्ते दिल्ली आ रही है, और सरकार तीन मुद्दों पर जवाब मांगेगी, कंपनी के एल्गोरिदम में कथित पक्षपात, एल्गोरिदम की कार्यप्रणाली, और पब्लिक ऑर्डर से जुड़े मामलों में कंपनी की भूमिका।
दुनियाभर में मेटा पर लगे आरोप, और अब केजरीवाल का नया दावा
मेटा पर उठ रहे सवाल किसी एक देश या एक घटना तक सीमित नहीं हैं। पिछले कई वर्षों में दुनिया भर में इस कंपनी को डेटा सुरक्षा, चुनावों, हेट स्पीच, फेक न्यूज़ और कंटेंट मॉडरेशन जैसे मुद्दों पर लगातार आलोचना का सामना करना पड़ा है।
इनमें सबसे चर्चित मामला था कैम्ब्रिज एनालिटिका का। आरोप लगा था कि करोड़ों फेसबुक यूज़र्स का निजी डेटा उनकी स्पष्ट सहमति के बिना राजनीतिक विज्ञापनों के लिए इस्तेमाल किया गया। इस विवाद ने दुनिया भर में यह बहस छेड़ दी थी कि क्या सोशल मीडिया कंपनियां सिर्फ प्लेटफॉर्म हैं, या वो लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को भी प्रभावित कर सकती हैं।
इसके बाद अलग-अलग देशों में मेटा पर चुनावों के दौरान एल्गोरिदम के प्रभाव, राजनीतिक कंटेंट की पहुंच, और फेक न्यूज़ के प्रसार को लेकर सवाल उठते रहे। यूरोप में कंपनी को डिजिटल नियमों के तहत जवाबदेही बढ़ाने का दबाव झेलना पड़ा, जबकि अमेरिका में भी कई बार कांग्रेस के सामने मेटा के अधिकारियों से जवाब मांगा गया।
भारत में भी मेटा कई बार विवादों में रहा है। कभी हेट स्पीच रोकने को लेकर सवाल, कभी फेक न्यूज़ और सांप्रदायिक तनाव फैलाने वाले कंटेंट को लेकर।

केजरीवाल का दावा - मेटा को उलट दिशा से घेरता आरोप
गुरुवार को दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दावा किया कि उनका इंस्टाग्राम अकाउंट भारत में बैन कर दिया गया है। उन्होंने अपने अकाउंट स्टेटस पेज का एक स्क्रीनशॉट भी साझा किया, जिसमें "अनअवेलेबल इन सम लोकेशन्स" यानी कुछ स्थानों पर उपलब्ध न होने का संदेश दिख रहा था।
केजरीवाल ने आरोप लगाया कि सरकार मेटा पर दबाव बना रही है ताकि एथेनॉल और पेपर लीक जैसे मुद्दों पर बोलने वाले अकाउंट्स को प्रतिबंधित किया जाए। उन्होंने मेटा से अपील की कि कंपनी ऐसे दबाव के आगे न झुके।
(यह आरोप फिलहाल सिंगल-सोर्स है- सिर्फ केजरीवाल का बयान। न मेटा और न ही सरकार की तरफ से इस पर कोई पुष्टि या खंडन आया है।)
गौर करने वाली बात यह है कि केजरीवाल का यह आरोप ठीक उसी समय आया है, जब मेटा पहले से ही PM मोदी की पोस्ट हटाने के मामले में सरकार के निशाने पर है। यानी एक तरफ सरकार मेटा पर एंटी-गवर्नमेंट कंटेंट को बढ़ावा देने का आरोप लगा रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष के एक बड़े नेता का आरोप है कि मेटा सरकार के दबाव में उनकी आवाज़ दबा रही है। दोनों आरोप एक-दूसरे के बिल्कुल उलट दिशा में हैं, और यही मेटा की सबसे बड़ी मुश्किल बनती जा रही है, कंपनी को हर तरफ से घेरा जा रहा है।
आलोचकों का कहना है कि मेटा का एल्गोरिदम लोगों को लंबे समय तक प्लेटफॉर्म पर बनाए रखने वाले कंटेंट को प्राथमिकता देता है। वहीं कंपनी का पक्ष है कि वह लगातार अपने सिस्टम में सुधार कर रही है, एक स्वतंत्र ओवरसाइट बोर्ड के जरिए फैसलों की समीक्षा कराती है, और दुनिया भर के कानूनों का पालन करने के लिए अपने कंटेंट मॉडरेशन को बेहतर बना रही है।

आगे क्या? सिर्फ कानूनी नहीं, भरोसे का सवाल
आज फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप सिर्फ बातचीत का माध्यम नहीं रहे। ये चुनावी बहसों को प्रभावित करते हैं, कारोबार का जरिया हैं, करोड़ों युवाओं की रोज़मर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं, और कई बार सरकारों और समाज के बीच संवाद का सबसे बड़ा मंच भी बन जाते हैं। लेकिन जितनी बड़ी किसी कंपनी की पहुंच होती है, उतनी ही बड़ी उसकी जिम्मेदारी भी होती है।
न्यू मैक्सिको का यह फैसला सिर्फ जुर्माने तक सीमित नहीं है, जज ने मेटा को अपने प्लेटफॉर्म में बुनियादी बदलाव करने के भी आदेश दिए हैं। इनमें 18 साल से कम उम्र के यूज़र्स के लिए Like काउंट हटाना (जो माता-पिता या अभिभावक की मंज़ूरी के बिना न दिखे), नाबालिगों को रात 10 बजे से सुबह 7 बजे तक पुश नोटिफिकेशन न भेजना, और उनके प्लेटफॉर्म इस्तेमाल को महीने में करीब 90 घंटे, यानी रोज़ाना लगभग 3 घंटे तक सीमित करना शामिल है। जानकार मानते हैं कि लंबे समय में यह डिज़ाइन-स्तर की बंदिश कंपनी के लिए जुर्माने से भी बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।
मेटा हर मामले में यही कहती है कि वह यूज़र्स की सुरक्षा को बेहतर बनाने के लिए लगातार नए कदम उठा रही है, अदालत के फैसले के खिलाफ अपील करेगी, और भारत समेत दुनिया भर के कानूनों का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध है। लेकिन अमेरिका की अदालतों से लेकर भारत की संसद तक, और यूरोप के नियामकों से लेकर डिजिटल अधिकार समूहों तक, एक सवाल लगातार पूछा जा रहा है: क्या सिर्फ माफी, जुर्माना और नई नीतियां इतनी बड़ी डिजिटल ताकत की जवाबदेही तय करने के लिए काफी हैं? या फिर अब वक्त आ गया है, जब दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों के लिए सिर्फ नए फीचर्स नहीं, बल्कि नए नियम भी तय किए जाएं।