IAF से राजनीतिक गलियारों तक: कौन थे चंद्रनाथ रथ, जो बने शुभेंदु अधिकारी के सबसे भरोसेमंद 'साये'?

By  GTC Bharat May 7th 2026 07:00 PM -- Updated: May 7th 2026 07:05 PM

अनुशासन, रणनीति और वफादारी की कहानी—कैसे एक पूर्व वायुसेना अधिकारी बना बंगाल की राजनीति का सबसे बड़ा 'बैकस्टेज प्लेयर'।


पश्चिम बंगाल की राजनीति अक्सर अपनी गरमाहट और तीखी बयानबाजी के लिए जानी जाती है। कैमरे के सामने बड़े-बड़े नेता गरजते हैं, रैलियां होती हैं और आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता है। लेकिन इस चकाचौंध के पीछे कुछ ऐसे 'साइलेंट रणनीतिकार' होते हैं, जो बिना किसी शोर-शराबे के पूरी बिसात बिछाते हैं। चंद्रनाथ रथ एक ऐसा ही नाम थे। उन्हें बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और भाजपा के कद्दावर नेता शुभेंदु अधिकारी का 'साया' माना जाता था।

वायुसेना के कड़े अनुशासन से निकलकर राजनीति के पेचीदा गलियारों तक चंद्रनाथ का सफर जितना प्रेरणादायक था, उसका अंत उतना ही चौंकाने वाला रहा। आज जब बंगाल की राजनीति में उनकी कमी महसूस की जा रही है, तो आइए जानते हैं कौन थे चंद्रनाथ रथ और कैसे वह शुभेंदु अधिकारी की कोर टीम का सबसे अटूट हिस्सा बने।

वायुसेना की वर्दी से राजनीतिक अखाड़े तक


चंद्रनाथ रथ का जन्म पूर्व मेदिनीपुर के चांदीपुर में हुआ था। उनकी शुरुआती शिक्षा रहड़ा रामकृष्ण मिशन जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में हुई, जहाँ से उन्होंने अनुशासन और सेवा के संस्कार सीखे। उनके जीवन का एक बड़ा हिस्सा देश की रक्षा में बीता। उन्होंने लगभग 20 वर्षों तक भारतीय वायुसेना (IAF) में अपनी सेवाएं दीं।

वायुसेना में रहते हुए चंद्रनाथ ने न केवल तकनीकी कौशल सीखा, बल्कि विषम परिस्थितियों में शांत रहकर निर्णय लेने की कला भी विकसित की। यही वह गुण था जिसने बाद में उन्हें राजनीति के 'बैकस्टेज' का माहिर खिलाड़ी बनाया। वायुसेना से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) लेने के बाद, उन्होंने कुछ समय कॉर्पोरेट जगत में बिताया, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। उनके आध्यात्मिक झुकाव और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की इच्छा उन्हें वापस बंगाल खींच लाई।

'अधिकारी' परिवार से पुराना नाता और भरोसे की नींव

चंद्रनाथ का परिवार मेदिनीपुर की मिट्टी से जुड़ा था और 'अधिकारी' परिवार के साथ उनके संबंध काफी पुराने थे। जब शुभेंदु अधिकारी ममता बनर्जी की सरकार में परिवहन मंत्री थे, तब चंद्रनाथ ने उनके दफ्तर के समन्वय और प्रशासनिक कार्यों को संभालना शुरू किया।

2019-20 के आसपास जब बंगाल की राजनीति ने करवट ली और शुभेंदु अधिकारी ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) का दामन छोड़ भाजपा का झंडा थामा, तो चंद्रनाथ रथ उन गिने-चुने लोगों में से थे जो उनके साथ साये की तरह खड़े रहे। उन्होंने दिसंबर 2020 में आधिकारिक तौर पर भाजपा का दामन थामा। यह महज एक पार्टी बदलना नहीं था, बल्कि एक नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत थी जहाँ चंद्रनाथ को अब एक बड़ी और जटिल जिम्मेदारी संभालनी थी।

रणनीतिकार का काम: चुपचाप, सटीक और प्रभावी

राजनीति में 'शैडो' या 'साया' होना कोई छोटी बात नहीं है। इसका मतलब है कि नेता की सुरक्षा से लेकर उसके चुनावी कैंपेन के लॉजिस्टिक्स तक की जिम्मेदारी आपके कंधों पर है। चंद्रनाथ रथ शुभेंदु अधिकारी के लिए यही भूमिका निभा रहे थे।

उनकी मुख्य जिम्मेदारियां:

  • लॉजिस्टिक्स और कैंपेन मैनेजमेंट: रैलियों का आयोजन, रूट प्लान करना और कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल बिठाना।
  • भवानीपुर उप-चुनाव: जब भाजपा ने ममता बनर्जी के खिलाफ भवानीपुर में पूरी ताकत झोंकी थी, तब बैकग्राउंड में लॉजिस्टिक्स संभालने का अहम काम चंद्रनाथ ने ही किया था।
  • संगठनात्मक तालमेल: पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं और नेतृत्व के बीच सेतु का काम करना।
  • लो-प्रोफाइल रहना: वह कभी मीडिया की लाइमलाइट में नहीं आए। उनकी ताकत उनकी खामोशी और काम के प्रति उनकी एकाग्रता थी।

शुभेंदु अधिकारी की टीम के सदस्यों का कहना है कि चंद्रनाथ स्वभाव से बहुत ही मृदुभाषी थे, लेकिन जब बात काम की आती थी, तो वह वायुसेना वाले अनुशासन से समझौता नहीं करते थे।

एक दुखद अंत: मध्यमग्राम की वो काली रात

मई 2026 की शुरुआत बंगाल के लिए एक दुखद खबर लेकर आई। बुधवार की रात, जब चंद्रनाथ रथ कोलकाता एयरपोर्ट के पास स्थित मध्यमग्राम से अपनी स्कॉर्पियो कार में गुजर रहे थे, तब घात लगाकर बैठे हमलावरों ने उन पर ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी। दो मोटर-साइकिल सवार हमलावरों ने उनके वाहन को घेरा और बेहद करीब से उन पर गोलियां चलाईं।

इस हमले ने पूरी राज्य की राजनीति को हिलाकर रख दिया। पुलिस की शुरुआती जांच में इसे एक "प्रोफेशनल हिट" माना जा रहा है, जिसमें काफी समय से रेकी की गई थी। यह घटना न केवल एक अपराध (Murder) की खबर थी, बल्कि बंगाल में राजनीतिक हिंसा के बढ़ते स्तर का एक चिंताजनक संकेत भी थी।

चंद्रनाथ रथ का जाना सिर्फ एक राजनीतिक सहयोगी का जाना नहीं है, बल्कि उस वफादारी और अनुशासन का अंत है जो आज की राजनीति में दुर्लभ है। शुभेंदु अधिकारी के लिए यह एक व्यक्तिगत और राजनीतिक नुकसान है, जिसकी भरपाई आसान नहीं होगी। चंद्रनाथ ने साबित किया कि राजनीति सिर्फ भाषणों और नारों का खेल नहीं है; यह पर्दे के पीछे की गई कड़ी मेहनत और अटूट भरोसे की नींव पर टिकी होती है।


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