भगवान Birsa Munda की 150वीं जयंती के अवसर पर दिल्ली में आयोजित एक विशाल आदिवासी सम्मेलन ने देशभर में “डीलिस्टिंग” को लेकर नई बहस छेड़ दी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े Janjati Suraksha Manch द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में लाखों आदिवासियों के शामिल होने का दावा किया गया।
कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah और दिल्ली की मुख्यमंत्री Rekha Gupta भी मौजूद रहीं। सभा में आदिवासी संगठनों ने जोरदार तरीके से “डीलिस्टिंग” की मांग उठाई, जिसके बाद यह मुद्दा राष्ट्रीय चर्चा का केंद्र बन गया है।
आखिर क्या है डीलिस्टिंग?
डीलिस्टिंग का अर्थ है किसी समुदाय को अनुसूचित जनजाति (ST) की सूची से बाहर करना।
आदिवासी संगठनों की मांग है कि जो लोग पारंपरिक आदिवासी धर्म और संस्कृति छोड़कर किसी अन्य धर्म को अपना चुके हैं, उन्हें ST सूची से बाहर किया जाए। उनका तर्क है कि ऐसे लोग एक साथ दो तरह के लाभ ले रहे हैं — एक ओर ST आरक्षण और दूसरी ओर अल्पसंख्यक समुदायों को मिलने वाली सुविधाएं।
प्रदर्शन कर रहे संगठनों का कहना है कि आरक्षण का लाभ उन्हीं आदिवासियों को मिलना चाहिए जो आज भी पारंपरिक जनजातीय संस्कृति, रीति-रिवाज और सामाजिक व्यवस्था से जुड़े हुए हैं।
संविधान के अनुच्छेद 342 पर फोकस
डीलिस्टिंग की मांग करने वाले संगठन चाहते हैं कि केंद्र सरकार संविधान के अनुच्छेद 342 में संशोधन करे।
Article 342 of the Constitution of India राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि वह राज्यों के परामर्श से किसी समुदाय को अनुसूचित जनजाति घोषित कर सकें।
आदिवासी नेताओं का कहना है कि अब इसी प्रावधान में बदलाव कर धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों को ST सूची से बाहर करने की व्यवस्था की जानी चाहिए।
समर्थन करने वालों के क्या तर्क हैं?
डीलिस्टिंग का समर्थन करने वाले संगठनों का मानना है कि इससे असली आदिवासी समुदायों को ज्यादा लाभ मिलेगा।
उनका कहना है कि कई इलाकों में धर्मांतरण के बाद भी लोग ST आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं, जिससे पारंपरिक जनजातीय समाज के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।
समर्थकों का यह भी दावा है कि डीलिस्टिंग से आदिवासी संस्कृति और पहचान को बचाने में मदद मिलेगी।
विरोध करने वाले क्या कह रहे हैं?
दूसरी ओर ईसाई और अन्य धर्म अपना चुके कई आदिवासी संगठन इस मांग का विरोध कर रहे हैं।
उनका कहना है कि आदिवासी पहचान केवल धर्म से तय नहीं होती, बल्कि वंश, संस्कृति और सामाजिक इतिहास से जुड़ी होती है।
विरोध करने वाले संगठनों का तर्क है कि धर्म बदलने से किसी की जनजातीय पहचान खत्म नहीं हो जाती। साथ ही वे इसे संविधान द्वारा दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के खिलाफ भी बता रहे हैं।
कुछ संगठनों ने आरोप लगाया कि यह मुद्दा राजनीतिक रूप से आदिवासी समाज को बांटने की कोशिश है।
अमित शाह ने क्या कहा?
दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि संविधान हर नागरिक को अपनी परंपराओं और स्वदेशी आस्था का पालन करने का अधिकार देता है।
उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति का जबरन या लालच देकर धर्म परिवर्तन कराना गलत है।
अमित शाह ने यह भी कहा कि आदिवासी समाज प्रकृति पूजक है और उसकी परंपराएं भारतीय संस्कृति और सनातन मूल्यों से जुड़ी हुई हैं।
UCC पर भी दिया संदेश
सभा के दौरान अमित शाह ने यह भी स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार ने आदिवासी समुदाय को यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) के दायरे से बाहर रखा है।
उन्होंने आदिवासी समाज से अपील की कि वे किसी भी तरह की अफवाह या भ्रम में न आएं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से जुड़ी चर्चा
डीलिस्टिंग की मांग के दौरान Supreme Court of India के हालिया फैसले की भी चर्चा हुई।
सुप्रीम कोर्ट ने इस साल मार्च में कहा था कि अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के दलितों तक सीमित रहेगा। यदि कोई व्यक्ति अन्य धर्म अपनाता है तो उसे SC श्रेणी का लाभ नहीं मिलेगा।
अब कुछ आदिवासी संगठन इसी तरह का नियम ST समुदाय पर भी लागू करने की मांग कर रहे हैं।
क्या हो सकता है असर?
अगर भविष्य में डीलिस्टिंग से जुड़ा कोई कानून संसद से पारित होता है, तो धर्म परिवर्तन कर चुके आदिवासियों को ST आरक्षण और उससे जुड़ी सरकारी सुविधाओं से बाहर किया जा सकता है।
इसका असर खासतौर पर झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश और पूर्वोत्तर राज्यों जैसे आदिवासी बहुल इलाकों में देखने को मिल सकता है।
बढ़ सकती है राजनीतिक बहस
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में डीलिस्टिंग का मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक रूप से और ज्यादा बड़ा हो सकता है।
जहां एक पक्ष इसे आदिवासी पहचान और अधिकारों की रक्षा का मुद्दा बता रहा है, वहीं दूसरा पक्ष इसे संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक समानता से जोड़कर देख रहा है।
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