<?xml version='1.0' encoding='UTF-8' ?><rss xmlns:content='http://purl.org/rss/1.0/modules/content/' xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/'  version='2.0'><channel><title>GTC Bharat</title><link>https://www.gtcbharat.com</link><lastBuildDate><![CDATA[Sun, 23 Aug 2026 17:59:29 +0530 ]]></lastBuildDate><language>en</language><image><title>GTC Bharat</title><url>https://media.gtcbharat.com/uploads/GTC-Bhart.svg</url><link>https://www.gtcbharat.com</link></image><description>GTC Bharat: Hindi News(हिंदी न्यूज़): Bharat की ताज़ा खबरें | Hindi News, हिंदी समाचार </description><item><guid isPermaLink='true'><![CDATA[ https://www.gtcbharat.com/health-news/chandipura-virus-alert-children-symptoms-prevention-5743 ]]></guid><title><![CDATA[ बच्चों के लिए खतरे की घंटी बना चांदीपुरा वायरस, डॉक्टरों ने बताए शुरुआती लक्षण,  बचाव के जरूरी उपाय ]]></title><link><![CDATA[ https://www.gtcbharat.com/health-news/chandipura-virus-alert-children-symptoms-prevention-5743 ]]></link><pubDate><![CDATA[Tue, 04 Aug 2026 18:14:39 +0530 ]]></pubDate><description><![CDATA[ नई दिल्ली: देश के कुछ राज्यों में एक बार फिर चांदीपुरा वायरस (Chandipura Virus - CHPV) ने स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ा दी है। गुजरात और राजस्थान में सामने आए मामलों के बाद प्रशासन सतर्क हो गया है और  ]]></description><content:encoded><![CDATA[ <p><b>नई दिल्ली:</b> देश के कुछ राज्यों में एक बार फिर <b>चांदीपुरा वायरस (Chandipura Virus - CHPV)</b> ने स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ा दी है। गुजरात और राजस्थान में सामने आए मामलों के बाद प्रशासन सतर्क हो गया है और लोगों से विशेष सावधानी बरतने की अपील की जा रही है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह वायरस खासतौर पर 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए अधिक खतरनाक साबित हो सकता है, क्योंकि बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता और <b>तंत्रिका तंत्र (Central Nervous System)</b> पूरी तरह विकसित नहीं होता।</p><p>विशेषज्ञों के अनुसार, यदि समय रहते लक्षणों की पहचान कर इलाज शुरू न किया जाए तो संक्रमण तेजी से गंभीर रूप ले सकता है। ऐसे में माता-पिता के लिए यह जरूरी है कि वे बच्चों की सेहत में आने वाले छोटे-से-छोटे बदलाव पर भी नजर रखें।</p><h5 class=""><b>बच्चों पर क्यों ज्यादा असर करता है वायरस?</b></h5><p>डॉक्टरों के मुताबिक, चांदीपुरा वायरस शरीर में प्रवेश करने के बाद सीधे सेंट्रल नर्वस सिस्टम को प्रभावित कर सकता है। बच्चों में इम्यून सिस्टम पूरी तरह विकसित न होने के कारण संक्रमण तेजी से फैल सकता है और कम समय में गंभीर न्यूरोलॉजिकल समस्याएं पैदा कर सकता है।</p><p>कई मामलों में संक्रमण के बाद केवल 24 से 48 घंटे के भीतर मरीज की हालत तेजी से बिगड़ सकती है। इसलिए शुरुआती लक्षणों को सामान्य वायरल बुखार समझकर नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है।</p><h5 class=""><b>कैसे फैलता है यह संक्रमण?</b></h5><p>विशेषज्ञों का कहना है कि चांदीपुरा वायरस मुख्य रूप से सैंडफ्लाई (रेतीली मक्खी) के काटने से फैलता है। कुछ शोधों में मच्छरों की भूमिका पर भी चर्चा हुई है, लेकिन प्रमुख माध्यम सैंडफ्लाई को ही माना जाता है।</p><p>राहत की बात यह है कि यह वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में सीधे नहीं फैलता। यानी संक्रमित बच्चे के संपर्क में आने से संक्रमण नहीं होता। इसके बावजूद संक्रमित क्षेत्रों में अतिरिक्त सतर्कता बरतने की सलाह दी जा रही है।</p><h5 class=""><b>किन लक्षणों को गंभीरता से लें?</b></h5><p>चांदीपुरा वायरस के लक्षण अचानक दिखाई दे सकते हैं। शुरुआत में बच्चे को तेज बुखार, लगातार उल्टी, सिरदर्द, शरीर में दर्द और कमजोरी महसूस हो सकती है।</p><p>यदि संक्रमण बढ़ने लगे तो बच्चा अत्यधिक सुस्त हो सकता है, उसे चक्कर आ सकते हैं, बेहोशी, दौरे पड़ना या भ्रम की स्थिति जैसी समस्याएं भी सामने आ सकती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे किसी भी लक्षण को नजरअंदाज करने के बजाय तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए।</p><h5 class=""><b>इलाज के लिए क्या विकल्प हैं?</b></h5><p>फिलहाल चांदीपुरा वायरस के लिए कोई विशेष एंटीवायरल दवा या वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। डॉक्टर मरीज के लक्षणों के अनुसार उपचार करते हैं। इसमें बुखार नियंत्रित करना, शरीर में पानी की कमी रोकना, दौरे की स्थिति को संभालना और जरूरत पड़ने पर आईसीयू में निगरानी शामिल होती है।</p><p>विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर चिकित्सा मिलने से जटिलताओं का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है।</p><h5 class=""><b>बचाव ही सबसे प्रभावी उपाय</b></h5><p>चूंकि इस वायरस का कोई टीका उपलब्ध नहीं है, इसलिए बचाव को ही सबसे प्रभावी हथियार माना जा रहा है।</p><p>विशेषज्ञों की सलाह है कि बच्चों को मच्छरदानी के अंदर सुलाया जाए और बाहर निकलते समय पूरी बांह के कपड़े पहनाए जाएं। घर और आसपास की साफ-सफाई बनाए रखें तथा पानी जमा न होने दें। मिट्टी की दीवारों, दरारों और नमी वाली जगहों की नियमित सफाई करें, क्योंकि सैंडफ्लाई ऐसे स्थानों पर पनप सकती है।</p><p>यदि स्थानीय स्वास्थ्य विभाग की ओर से कीटनाशक छिड़काव की सलाह दी जाए तो उसका पालन करना भी जरूरी है।</p><h5 class=""><b>डॉक्टरों की सलाह</b></h5><p>स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून के दौरान बच्चों में होने वाले तेज बुखार या लगातार उल्टी को सामान्य मौसमी संक्रमण मानकर घर पर इलाज करने की गलती न करें। यदि बच्चे की हालत तेजी से बिगड़ रही हो, बार-बार उल्टी हो रही हो या दौरे जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराना चाहिए।</p><p>विशेषज्ञों का मानना है कि जागरूकता, समय पर पहचान और त्वरित उपचार ही इस वायरस से होने वाले गंभीर खतरे को कम करने का सबसे प्रभावी तरीका है।</p> ]]></content:encoded><media:description type='plain'><![CDATA[ बच्चों के लिए खतरे की घंटी बना चांदीपुरा वायरस, डॉक्टरों ने बताए शुरुआती लक्षण,  बचाव के जरूरी उपाय ]]></media:description></item><item><guid isPermaLink='true'><![CDATA[ https://www.gtcbharat.com/health-news/liver-health-tips-5-daily-habits-that-can-damage-liver-5490 ]]></guid><title><![CDATA[ सिर्फ शराब नहीं! ये 5 रोजमर्रा की आदतें भी बना सकती हैं लिवर को बीमार, एक्सपर्ट्स चेतावनी ]]></title><link><![CDATA[ https://www.gtcbharat.com/health-news/liver-health-tips-5-daily-habits-that-can-damage-liver-5490 ]]></link><pubDate><![CDATA[Fri, 17 Jul 2026 16:00:07 +0530 ]]></pubDate><description><![CDATA[ हमारे शरीर का लिवर (Liver) एक ऐसा अंग है जो बिना रुके 24 घंटे काम करता है। यह शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालने, भोजन को पचाने, ऊर्जा संग्रहित करने और जरूरी प्रोटीन बनाने जैसे कई अहम कार्य करता है ]]></description><content:encoded><![CDATA[ <p>हमारे शरीर का<b> लिवर (Liver) </b>एक ऐसा अंग है जो बिना रुके 24 घंटे काम करता है। यह शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालने, भोजन को पचाने, ऊर्जा संग्रहित करने और जरूरी प्रोटीन बनाने जैसे कई अहम कार्य करता है। आमतौर पर जब लिवर की बीमारी की बात होती है तो सबसे पहले शराब का नाम सामने आता है। हालांकि मेडिकल विशेषज्ञों का कहना है कि केवल अल्कोहल ही नहीं, बल्कि हमारी रोजमर्रा की कई आदतें भी लिवर को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचा सकती हैं।</p><p>आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग सुविधा और स्वाद के लिए ऐसी चीजों का सेवन कर रहे हैं, जो लंबे समय में लिवर की कार्यक्षमता को प्रभावित करती हैं। कई बार नुकसान इतना धीरे-धीरे होता है कि शुरुआती चरण में कोई लक्षण भी दिखाई नहीं देते। इसलिए समय रहते सावधानी बरतना बेहद जरूरी है।</p><h5 class=""><b>1. बिना जरूरत पेनकिलर लेने की आदत</b></h5><p>हल्का सिरदर्द, बदन दर्द या बुखार होते ही कई लोग डॉक्टर की सलाह के बिना दर्द निवारक दवाइयों का सेवन कर लेते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ पेनकिलर दवाओं का लगातार या जरूरत से अधिक इस्तेमाल लिवर पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है। विशेष रूप से अधिक मात्रा में दवा लेने से लिवर की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ जाता है।</p><p>इसलिए किसी भी दवा का नियमित सेवन करने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है।</p><h5 class=""><b>2. ज्यादा चीनी और फ्रुक्टोज वाले खाद्य पदार्थ</b></h5><p>कोल्ड ड्रिंक, पैकेट वाले जूस, मिठाइयां, कैंडी, केक और प्रोसेस्ड स्नैक्स में अत्यधिक मात्रा में चीनी और फ्रुक्टोज पाया जाता है। लगातार इनका सेवन करने से शरीर में अतिरिक्त फैट बनने लगता है, जो धीरे-धीरे लिवर में जमा हो सकता है।</p><p>यह स्थिति आगे चलकर नॉन-अल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD) का कारण बन सकती है। यदि आप रोजाना मीठे पेय पदार्थों का सेवन करते हैं, तो इसे कम करना लिवर की सेहत के लिए बेहतर कदम हो सकता है।</p><h5 class=""><b>3. जंक फूड और प्रोसेस्ड फूड</b></h5><p>फास्ट फूड आज की लाइफस्टाइल का हिस्सा बन चुका है, लेकिन यही आदत लिवर के लिए बड़ी समस्या बन सकती है। बर्गर, पिज्जा, फ्रेंच फ्राइज, चिप्स और अन्य प्रोसेस्ड फूड में ट्रांस फैट, सैचुरेटेड फैट और अत्यधिक नमक होता है।</p><p>इनका लगातार सेवन लिवर में सूजन बढ़ा सकता है और फैट जमा होने की प्रक्रिया को तेज कर सकता है। साथ ही मोटापा और मेटाबॉलिक सिंड्रोम का खतरा भी बढ़ जाता है, जो लिवर संबंधी बीमारियों का प्रमुख कारण है।</p><h5 class=""><b>4. बिना डॉक्टर की सलाह के सप्लीमेंट्स लेना</b></h5><p>फिटनेस, मसल्स बनाने और तेजी से वजन कम करने के नाम पर बाजार में कई तरह के सप्लीमेंट्स और हर्बल प्रोडक्ट्स उपलब्ध हैं। कई लोग इन्हें पूरी तरह सुरक्षित मानकर बिना किसी मेडिकल सलाह के इस्तेमाल करने लगते हैं।</p><p>विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ सप्लीमेंट्स में मौजूद तत्व लिवर पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं। स्टेरॉयड आधारित उत्पाद या अनियंत्रित मात्रा में लिए गए सप्लीमेंट्स लिवर इंजरी का कारण बन सकते हैं। इसलिए किसी भी सप्लीमेंट का सेवन करने से पहले योग्य चिकित्सक से सलाह अवश्य लें।</p><h5 class=""><b>5. हेपेटाइटिस जैसी बीमारियों को नजरअंदाज करना</b></h5><p>हेपेटाइटिस-बी और हेपेटाइटिस-सी जैसे वायरल संक्रमण लिवर के सबसे बड़े दुश्मनों में शामिल हैं। यदि इनका समय पर इलाज नहीं कराया जाए, तो यह संक्रमण धीरे-धीरे लिवर सिरोसिस या लिवर कैंसर जैसी गंभीर समस्याओं में बदल सकता है।</p><p>विशेषज्ञों के अनुसार, हेपेटाइटिस-बी का टीकाकरण, सुरक्षित रक्त संक्रमण, स्वच्छता और समय-समय पर स्वास्थ्य जांच इस बीमारी से बचाव के प्रभावी उपाय हैं।</p><h5 class=""><b>लिवर को स्वस्थ रखने के आसान उपाय</b></h5><p>अगर आप अपने लिवर को लंबे समय तक स्वस्थ रखना चाहते हैं, तो कुछ आसान आदतें अपनानी चाहिए।</p><ul><li>संतुलित और पौष्टिक भोजन करें।<br></li><li>रोजाना कम से कम 30 मिनट व्यायाम करें।<br></li><li>जंक फूड और मीठे पेय पदार्थों का सेवन सीमित करें।<br></li><li>बिना डॉक्टर की सलाह के दवाइयां या सप्लीमेंट्स न लें।<br></li><li>पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं।<br></li><li>समय-समय पर हेल्थ चेकअप कराते रहें।</li></ul><p>लिवर हमारे शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंगों में से एक है और इसकी देखभाल केवल शराब से दूरी बनाकर ही नहीं की जा सकती। जरूरत से ज्यादा पेनकिलर, मीठे पेय पदार्थ, प्रोसेस्ड फूड, अनियंत्रित सप्लीमेंट्स और वायरल संक्रमण भी लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं। यदि आप स्वस्थ जीवन चाहते हैं, तो अपनी रोजमर्रा की खानपान और जीवनशैली की आदतों में छोटे-छोटे बदलाव करके अपने लिवर को लंबे समय तक स्वस्थ रख सकते हैं।</p> ]]></content:encoded><media:description type='plain'><![CDATA[ सिर्फ शराब नहीं! ये 5 रोजमर्रा की आदतें भी बना सकती हैं लिवर को बीमार, एक्सपर्ट्स चेतावनी ]]></media:description></item><item><guid isPermaLink='true'><![CDATA[ https://www.gtcbharat.com/health-news/hba1c-test-diabetes-7-important-tests-new-research-5351 ]]></guid><title><![CDATA[ क्या सिर्फ HbA1c टेस्ट काफी है? नई रिसर्च के बाद जानिए डायबिटीज की 7 जरूरी जांच ]]></title><link><![CDATA[ https://www.gtcbharat.com/health-news/hba1c-test-diabetes-7-important-tests-new-research-5351 ]]></link><pubDate><![CDATA[Thu, 09 Jul 2026 17:50:47 +0530 ]]></pubDate><description><![CDATA[ डायबिटीज की पहचान और उसकी निगरानी के लिए लंबे समय से HbA1c टेस्ट को सबसे भरोसेमंद जांचों में से एक माना जाता रहा है। यह टेस्ट पिछले लगभग तीन महीनों के औसत ब्लड शुगर स्तर का अनुमान देता है। लेकिन हाल ह ]]></description><content:encoded><![CDATA[ <p>डायबिटीज की पहचान और उसकी निगरानी के लिए लंबे समय से <b>HbA1c</b> टेस्ट को सबसे भरोसेमंद जांचों में से एक माना जाता रहा है। यह टेस्ट पिछले लगभग तीन महीनों के औसत ब्लड शुगर स्तर का अनुमान देता है। लेकिन हाल ही में प्रकाशित एक शोध ने इस टेस्ट को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है।</p><p>रिसर्च के अनुसार, भारत और दक्षिण एशिया के कई देशों में बड़ी संख्या में लोग आयरन की कमी (Iron Deficiency Anemia) से प्रभावित हैं। ऐसे लोगों में HbA1c टेस्ट के परिणाम वास्तविक ब्लड शुगर स्तर से अलग हो सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इस वजह से केवल HbA1c के आधार पर डायबिटीज की पुष्टि करना हमेशा सही नहीं हो सकता।</p><p>हालांकि, यह समझना जरूरी है कि मरीज को कौन-सी जांच करानी चाहिए, इसका अंतिम निर्णय डॉक्टर की सलाह पर ही होना चाहिए।</p><h5 class=""><b>क्या होता है HbA1c टेस्ट?</b></h5><p>HbA1c एक ब्लड टेस्ट है, जिसे ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन टेस्ट भी कहा जाता है। यह बताता है कि पिछले दो से तीन महीनों में किसी व्यक्ति का औसत ब्लड शुगर स्तर कैसा रहा है।</p><p>डॉक्टर इस टेस्ट का इस्तेमाल डायबिटीज की पहचान के साथ-साथ पहले से डायबिटीज से पीड़ित मरीजों में शुगर कंट्रोल की निगरानी के लिए भी करते हैं।</p><p>&lt;blockquote class="instagram-media" data-instgrm-captioned data-instgrm-permalink="https://www.instagram.com/reel/DakjPvChp_3/?utm_source=ig_embed&amp;amp;utm_campaign=loading" data-instgrm-version="14" style=" background:#FFF; border:0; border-radius:3px; box-shadow:0 0 1px 0 rgba(0,0,0,0.5),0 1px 10px 0 rgba(0,0,0,0.15); margin: 1px; max-width:540px; min-width:326px; padding:0; width:99.375%; width:-webkit-calc(100% - 2px); width:calc(100% - 2px);"&gt;&lt;div style="padding:16px;"&gt; &lt;a href="https://www.instagram.com/reel/DakjPvChp_3/?utm_source=ig_embed&amp;amp;utm_campaign=loading" style=" background:#FFFFFF; line-height:0; padding:0 0; text-align:center; text-decoration:none; width:100%;" target="_blank"&gt; &lt;div style=" display: flex; flex-direction: row; align-items: center;"&gt; &lt;div style="background-color: #F4F4F4; border-radius: 50%; flex-grow: 0; height: 40px; margin-right: 14px; width: 40px;"&gt;&lt;/div&gt; &lt;div style="display: flex; flex-direction: column; flex-grow: 1; justify-content: center;"&gt; &lt;div style=" 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C517.703,76.634 519.376,77.658 521.349,78.425 C523.257,79.167 525.438,79.673 528.631,79.82 C531.831,79.965 532.853,80.001 541,80.001 C549.148,80.001 550.169,79.965 553.369,79.82 C556.562,79.673 558.743,79.167 560.652,78.425 C562.623,77.658 564.297,76.634 565.965,74.965 C567.633,73.296 568.659,71.625 569.425,69.651 C570.167,67.743 570.674,65.562 570.82,62.369 C570.966,59.17 571,58.147 571,50 C571,41.851 570.966,40.831 570.82,37.631"&gt;&lt;/path&gt;&lt;/g&gt;&lt;/g&gt;&lt;/g&gt;&lt;/svg&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="padding-top: 8px;"&gt; &lt;div style=" color:#3897f0; font-family:Arial,sans-serif; font-size:14px; font-style:normal; font-weight:550; line-height:18px;"&gt;View this post on Instagram&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="padding: 12.5% 0;"&gt;&lt;/div&gt; &lt;div style="display: flex; flex-direction: row; margin-bottom: 14px; align-items: center;"&gt;&lt;div&gt; &lt;div style="background-color: #F4F4F4; border-radius: 50%; height: 12.5px; width: 12.5px; transform: 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style=" background-color: #F4F4F4; flex-grow: 0; height: 12px; width: 16px; transform: translateY(-4px);"&gt;&lt;/div&gt; &lt;div style=" width: 0; height: 0; border-top: 8px solid #F4F4F4; border-left: 8px solid transparent; transform: translateY(-4px) translateX(8px);"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt; &lt;div style="display: flex; flex-direction: column; flex-grow: 1; justify-content: center; margin-bottom: 24px;"&gt; &lt;div style=" background-color: #F4F4F4; border-radius: 4px; flex-grow: 0; height: 14px; margin-bottom: 6px; width: 224px;"&gt;&lt;/div&gt; &lt;div style=" background-color: #F4F4F4; border-radius: 4px; flex-grow: 0; height: 14px; width: 144px;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/a&gt;&lt;p style=" color:#c9c8cd; font-family:Arial,sans-serif; font-size:14px; line-height:17px; margin-bottom:0; margin-top:8px; overflow:hidden; padding:8px 0 7px; text-align:center; text-overflow:ellipsis; white-space:nowrap;"&gt;&lt;a href="https://www.instagram.com/reel/DakjPvChp_3/?utm_source=ig_embed&amp;amp;utm_campaign=loading" style=" color:#c9c8cd; font-family:Arial,sans-serif; font-size:14px; font-style:normal; font-weight:normal; line-height:17px; text-decoration:none;" target="_blank"&gt;A post shared by Dr Nishchal Gupta MD (Hom.) (@dr.nishchal_gupta_homoeopathy)&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;/blockquote&gt;<br>&lt;script async src="//www.instagram.com/embed.js"&gt;&lt;/script&gt;</p><h5 class=""><b>आयरन की कमी क्यों डाल सकती है असर?</b></h5><p>विशेषज्ञों के अनुसार, जब शरीर में आयरन की कमी होती है तो लाल रक्त कोशिकाओं (RBCs) का जीवनकाल और उनकी कार्यप्रणाली प्रभावित हो सकती है। इसका असर HbA1c रिपोर्ट पर भी पड़ सकता है।</p><p>ऐसी स्थिति में रिपोर्ट वास्तविक शुगर स्तर से अधिक या कम दिखाई दे सकती है। इसलिए यदि मरीज को एनीमिया है, तो डॉक्टर अन्य जांचों को भी साथ में देखने की सलाह दे सकते हैं।</p><h5 class=""><b>डायबिटीज की पुष्टि के लिए कौन-कौन से टेस्ट जरूरी हो सकते हैं?</b></h5><p>विशेषज्ञों के अनुसार केवल एक टेस्ट पर निर्भर रहने के बजाय मरीज की पूरी स्वास्थ्य स्थिति को समझना जरूरी होता है। इसके लिए डॉक्टर निम्न जांचों की सलाह दे सकते हैं—</p><ol><li><b>BSF (Blood Sugar Fasting) -&nbsp;</b>खाली पेट ब्लड शुगर की जांच डायबिटीज की शुरुआती पहचान में मदद करती है।</li><li><b>OGTT (Oral Glucose Tolerance Test) -&nbsp;</b>इस टेस्ट में ग्लूकोज पीने के बाद शरीर की शुगर नियंत्रित करने की क्षमता का आकलन किया जाता है।</li><li><b>Serum Insulin Test -&nbsp;</b>यह जांच बताती है कि शरीर कितना इंसुलिन बना रहा है और इंसुलिन रेजिस्टेंस की स्थिति क्या है।</li><li><b>CBC (Complete Blood Count) -&nbsp;</b>CBC टेस्ट से एनीमिया और अन्य रक्त संबंधी समस्याओं का पता चलता है, जो HbA1c रिपोर्ट को प्रभावित कर सकती हैं।</li><li><b>Lipid Profile -&nbsp;</b>डायबिटीज के मरीजों में हृदय रोग का खतरा अधिक रहता है। इसलिए कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स की जांच भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।</li><li><b>Urine Routine/Microscopy -&nbsp;</b>यह टेस्ट किडनी और मूत्र संक्रमण जैसी समस्याओं की शुरुआती पहचान में मदद करता है।</li><li><b>Urine Microalbumin -&nbsp;</b>डायबिटीज के कारण किडनी पर पड़ने वाले शुरुआती प्रभाव का पता लगाने के लिए यह जांच बेहद उपयोगी मानी जाती है।</li></ol><h5 class=""><b>क्या अब HbA1c की जरूरत नहीं रहेगी?</b></h5><p>विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। HbA1c आज भी दुनिया भर में एक महत्वपूर्ण जांच मानी जाती है। हालांकि जिन मरीजों में आयरन की कमी, एनीमिया या कुछ अन्य स्वास्थ्य स्थितियां हों, वहां डॉक्टर अतिरिक्त जांचों के आधार पर ही अंतिम निर्णय लेते हैं।</p><p>यानी HbA1c को पूरी तरह छोड़ने की बजाय मरीज की मेडिकल हिस्ट्री, लक्षण और अन्य जांच रिपोर्टों के साथ मिलाकर देखा जाना चाहिए।</p><h5 class=""><b>डॉक्टर की सलाह सबसे जरूरी</b></h5><p>डायबिटीज की जांच या इलाज के लिए स्वयं कोई टेस्ट चुनना उचित नहीं है। यदि बार-बार प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, अचानक वजन घटना, थकान या धुंधला दिखाई देने जैसे लक्षण हों तो डॉक्टर से सलाह लेकर आवश्यक जांच करानी चाहिए।</p><p>विशेषज्ञों का मानना है कि सही समय पर सही जांच और समय पर इलाज से डायबिटीज की जटिलताओं को काफी हद तक रोका जा सकता है।</p><p><b>डॉ. निश्चल गुप्ता होम्योपैथी के एक भरोसेमंद कंसल्टेंट हैं, जिन्हें क्लिनिकल प्रैक्टिस का 17 साल से ज़्यादा का अनुभव है। होम्योपैथी में MD की डिग्री के साथ, डॉ. गुप्ता ने कई सालों में एलर्जी, त्वचा की समस्याओं, पाचन संबंधी दिक्कतों, गठिया और हार्मोनल असंतुलन जैसी कई तरह की बीमारियों का सफलतापूर्वक इलाज किया है और सभी उम्र के मरीज़ों का भरोसा जीता है।</b></p><p><b>नोट</b>: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। किसी भी मेडिकल निर्णय के लिए डॉक्टर या स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।</p> ]]></content:encoded><media:description type='plain'><![CDATA[ क्या सिर्फ HbA1c टेस्ट काफी है? नई रिसर्च के बाद जानिए डायबिटीज की 7 जरूरी जांच ]]></media:description></item><item><guid isPermaLink='true'><![CDATA[ https://www.gtcbharat.com/health-news/gen-z-healthy-habits-healthy-lifestyle-tips-in-hindi-5309 ]]></guid><title><![CDATA[ Gen Z की ये 5 हेल्दी आदतें बदल सकती हैं आपकी पूरी लाइफ, आज से ही करें शुरुआत ]]></title><link><![CDATA[ https://www.gtcbharat.com/health-news/gen-z-healthy-habits-healthy-lifestyle-tips-in-hindi-5309 ]]></link><pubDate><![CDATA[Tue, 07 Jul 2026 11:36:37 +0530 ]]></pubDate><description><![CDATA[ नई पीढ़ी यानी Gen Z तेज़ रफ्तार जिंदगी, डिजिटल लाइफस्टाइल और लगातार बदलती दिनचर्या के बीच अपने करियर और व्यक्तिगत जीवन को संतुलित करने की कोशिश कर रही है। हालांकि, इस दौड़ में सबसे ज्यादा असर उनकी सेह ]]></description><content:encoded><![CDATA[ <p>नई पीढ़ी यानी <b>Gen Z</b> तेज़ रफ्तार जिंदगी, डिजिटल लाइफस्टाइल और लगातार बदलती दिनचर्या के बीच अपने करियर और व्यक्तिगत जीवन को संतुलित करने की कोशिश कर रही है। हालांकि, इस दौड़ में सबसे ज्यादा असर उनकी सेहत पर पड़ रहा है। &nbsp;देर रात तक मोबाइल चलाना, अनियमित खानपान, जंक फूड की बढ़ती आदत और शारीरिक गतिविधियों की कमी आज युवाओं में आम समस्या बन चुकी है।&nbsp;<b>डॉक्टर निश्चल गुप्ता (Dr. Nishchal Gupta)</b>&nbsp; का मानना है कि अगर कम उम्र में ही कुछ अच्छी आदतें अपनाई जाएं, तो भविष्य में मोटापा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और मानसिक तनाव जैसी कई समस्याओं से काफी हद तक बचा जा सकता है।</p><h5 class=""><b>1. समय पर सोना बनाएं सबसे पहली प्राथमिकता</b></h5><p>स्वस्थ जीवन की शुरुआत अच्छी नींद से होती है। पर्याप्त और समय पर नींद लेने से शरीर को खुद को रिपेयर करने का समय मिलता है। लगातार देर रात तक जागने से शरीर का प्राकृतिक बायोलॉजिकल क्लॉक प्रभावित होता है, जिससे थकान, चिड़चिड़ापन, ध्यान की कमी और हार्मोनल असंतुलन जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि रोजाना एक निश्चित समय पर सोने और उठने की आदत विकसित करनी चाहिए।</p><h5 class=""><b>2. रात में स्क्रीन टाइम कम करें</b></h5><p>सोने से पहले मोबाइल, लैपटॉप या टीवी का अधिक इस्तेमाल शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकता है। इन डिवाइस से निकलने वाली ब्लू लाइट शरीर में तनाव से जुड़े हार्मोन कोर्टिसोल को प्रभावित कर सकती है और मेलाटोनिन हार्मोन के उत्पादन को भी कम कर सकती है, जिससे अच्छी नींद नहीं आती। बेहतर होगा कि सोने से कम से कम एक घंटा पहले स्क्रीन से दूरी बना लें।</p><p>&lt;blockquote class="instagram-media" data-instgrm-captioned data-instgrm-permalink="https://www.instagram.com/reel/DUDUKsWAbfI/?utm_source=ig_embed&amp;amp;utm_campaign=loading" data-instgrm-version="14" style=" background:#FFF; border:0; border-radius:3px; box-shadow:0 0 1px 0 rgba(0,0,0,0.5),0 1px 10px 0 rgba(0,0,0,0.15); margin: 1px; max-width:540px; min-width:326px; padding:0; width:99.375%; width:-webkit-calc(100% - 2px); width:calc(100% - 2px);"&gt;&lt;div style="padding:16px;"&gt; &lt;a href="https://www.instagram.com/reel/DUDUKsWAbfI/?utm_source=ig_embed&amp;amp;utm_campaign=loading" style=" background:#FFFFFF; line-height:0; padding:0 0; text-align:center; text-decoration:none; width:100%;" target="_blank"&gt; &lt;div style=" display: flex; flex-direction: row; align-items: center;"&gt; &lt;div style="background-color: #F4F4F4; border-radius: 50%; flex-grow: 0; height: 40px; margin-right: 14px; width: 40px;"&gt;&lt;/div&gt; &lt;div style="display: flex; flex-direction: column; flex-grow: 1; justify-content: center;"&gt; &lt;div style=" background-color: #F4F4F4; border-radius: 4px; flex-grow: 0; height: 14px; margin-bottom: 6px; width: 100px;"&gt;&lt;/div&gt; &lt;div style=" background-color: #F4F4F4; border-radius: 4px; flex-grow: 0; height: 14px; width: 60px;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="padding: 19% 0;"&gt;&lt;/div&gt; &lt;div style="display:block; height:50px; margin:0 auto 12px; width:50px;"&gt;&lt;svg width="50px" height="50px" viewBox="0 0 60 60" version="1.1" xmlns="https://www.w3.org/2000/svg" xmlns:xlink="https://www.w3.org/1999/xlink"&gt;&lt;g stroke="none" stroke-width="1" fill="none" fill-rule="evenodd"&gt;&lt;g transform="translate(-511.000000, -20.000000)" fill="#000000"&gt;&lt;g&gt;&lt;path d="M556.869,30.41 C554.814,30.41 553.148,32.076 553.148,34.131 C553.148,36.186 554.814,37.852 556.869,37.852 C558.924,37.852 560.59,36.186 560.59,34.131 C560.59,32.076 558.924,30.41 556.869,30.41 M541,60.657 C535.114,60.657 530.342,55.887 530.342,50 C530.342,44.114 535.114,39.342 541,39.342 C546.887,39.342 551.658,44.114 551.658,50 C551.658,55.887 546.887,60.657 541,60.657 M541,33.886 C532.1,33.886 524.886,41.1 524.886,50 C524.886,58.899 532.1,66.113 541,66.113 C549.9,66.113 557.115,58.899 557.115,50 C557.115,41.1 549.9,33.886 541,33.886 M565.378,62.101 C565.244,65.022 564.756,66.606 564.346,67.663 C563.803,69.06 563.154,70.057 562.106,71.106 C561.058,72.155 560.06,72.803 558.662,73.347 C557.607,73.757 556.021,74.244 553.102,74.378 C549.944,74.521 548.997,74.552 541,74.552 C533.003,74.552 532.056,74.521 528.898,74.378 C525.979,74.244 524.393,73.757 523.338,73.347 C521.94,72.803 520.942,72.155 519.894,71.106 C518.846,70.057 518.197,69.06 517.654,67.663 C517.244,66.606 516.755,65.022 516.623,62.101 C516.479,58.943 516.448,57.996 516.448,50 C516.448,42.003 516.479,41.056 516.623,37.899 C516.755,34.978 517.244,33.391 517.654,32.338 C518.197,30.938 518.846,29.942 519.894,28.894 C520.942,27.846 521.94,27.196 523.338,26.654 C524.393,26.244 525.979,25.756 528.898,25.623 C532.057,25.479 533.004,25.448 541,25.448 C548.997,25.448 549.943,25.479 553.102,25.623 C556.021,25.756 557.607,26.244 558.662,26.654 C560.06,27.196 561.058,27.846 562.106,28.894 C563.154,29.942 563.803,30.938 564.346,32.338 C564.756,33.391 565.244,34.978 565.378,37.899 C565.522,41.056 565.552,42.003 565.552,50 C565.552,57.996 565.522,58.943 565.378,62.101 M570.82,37.631 C570.674,34.438 570.167,32.258 569.425,30.349 C568.659,28.377 567.633,26.702 565.965,25.035 C564.297,23.368 562.623,22.342 560.652,21.575 C558.743,20.834 556.562,20.326 553.369,20.18 C550.169,20.033 549.148,20 541,20 C532.853,20 531.831,20.033 528.631,20.18 C525.438,20.326 523.257,20.834 521.349,21.575 C519.376,22.342 517.703,23.368 516.035,25.035 C514.368,26.702 513.342,28.377 512.574,30.349 C511.834,32.258 511.326,34.438 511.181,37.631 C511.035,40.831 511,41.851 511,50 C511,58.147 511.035,59.17 511.181,62.369 C511.326,65.562 511.834,67.743 512.574,69.651 C513.342,71.625 514.368,73.296 516.035,74.965 C517.703,76.634 519.376,77.658 521.349,78.425 C523.257,79.167 525.438,79.673 528.631,79.82 C531.831,79.965 532.853,80.001 541,80.001 C549.148,80.001 550.169,79.965 553.369,79.82 C556.562,79.673 558.743,79.167 560.652,78.425 C562.623,77.658 564.297,76.634 565.965,74.965 C567.633,73.296 568.659,71.625 569.425,69.651 C570.167,67.743 570.674,65.562 570.82,62.369 C570.966,59.17 571,58.147 571,50 C571,41.851 570.966,40.831 570.82,37.631"&gt;&lt;/path&gt;&lt;/g&gt;&lt;/g&gt;&lt;/g&gt;&lt;/svg&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="padding-top: 8px;"&gt; &lt;div style=" color:#3897f0; font-family:Arial,sans-serif; font-size:14px; font-style:normal; font-weight:550; line-height:18px;"&gt;View this post on Instagram&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="padding: 12.5% 0;"&gt;&lt;/div&gt; &lt;div style="display: flex; flex-direction: row; margin-bottom: 14px; align-items: center;"&gt;&lt;div&gt; &lt;div style="background-color: #F4F4F4; border-radius: 50%; height: 12.5px; width: 12.5px; transform: translateX(0px) translateY(7px);"&gt;&lt;/div&gt; &lt;div style="background-color: #F4F4F4; height: 12.5px; transform: rotate(-45deg) translateX(3px) translateY(1px); width: 12.5px; flex-grow: 0; margin-right: 14px; margin-left: 2px;"&gt;&lt;/div&gt; &lt;div style="background-color: #F4F4F4; border-radius: 50%; height: 12.5px; width: 12.5px; transform: translateX(9px) translateY(-18px);"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-left: 8px;"&gt; &lt;div style=" background-color: #F4F4F4; border-radius: 50%; flex-grow: 0; height: 20px; width: 20px;"&gt;&lt;/div&gt; &lt;div style=" width: 0; height: 0; border-top: 2px solid transparent; border-left: 6px solid #f4f4f4; border-bottom: 2px solid transparent; transform: translateX(16px) translateY(-4px) rotate(30deg)"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-left: auto;"&gt; &lt;div style=" width: 0px; border-top: 8px solid #F4F4F4; border-right: 8px solid transparent; transform: translateY(16px);"&gt;&lt;/div&gt; &lt;div style=" background-color: #F4F4F4; flex-grow: 0; height: 12px; width: 16px; transform: translateY(-4px);"&gt;&lt;/div&gt; &lt;div style=" width: 0; height: 0; border-top: 8px solid #F4F4F4; border-left: 8px solid transparent; transform: translateY(-4px) translateX(8px);"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt; &lt;div style="display: flex; flex-direction: column; flex-grow: 1; justify-content: center; margin-bottom: 24px;"&gt; &lt;div style=" background-color: #F4F4F4; border-radius: 4px; flex-grow: 0; height: 14px; margin-bottom: 6px; width: 224px;"&gt;&lt;/div&gt; &lt;div style=" background-color: #F4F4F4; border-radius: 4px; flex-grow: 0; height: 14px; width: 144px;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/a&gt;&lt;p style=" color:#c9c8cd; font-family:Arial,sans-serif; font-size:14px; line-height:17px; margin-bottom:0; margin-top:8px; overflow:hidden; padding:8px 0 7px; text-align:center; text-overflow:ellipsis; white-space:nowrap;"&gt;&lt;a href="https://www.instagram.com/reel/DUDUKsWAbfI/?utm_source=ig_embed&amp;amp;utm_campaign=loading" style=" color:#c9c8cd; font-family:Arial,sans-serif; font-size:14px; font-style:normal; font-weight:normal; line-height:17px; text-decoration:none;" target="_blank"&gt;A post shared by Dr Nishchal Gupta MD (Hom.) (@dr.nishchal_gupta_homoeopathy)&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;/blockquote&gt;<br>&lt;script async src="//www.instagram.com/embed.js"&gt;&lt;/script&gt;</p><p><br></p><h5 class=""><b>3. कभी भी भोजन स्किप न करें</b></h5><p>व्यस्त दिनचर्या के कारण कई युवा नाश्ता या दोपहर का खाना छोड़ देते हैं। ऐसा करने से शरीर को समय पर ऊर्जा नहीं मिलती और मेटाबॉलिज्म प्रभावित हो सकता है। नियमित समय पर संतुलित भोजन करने से शरीर को आवश्यक पोषण मिलता है और पूरे दिन ऊर्जा बनी रहती है। साथ ही यह ओवरईटिंग और जंक फूड की इच्छा को भी कम करता है।</p><h5 class=""><b>4. रोज कम से कम 30 मिनट शरीर को सक्रिय रखें</b></h5><p>फिट रहने के लिए महंगे जिम की जरूरत नहीं होती। रोजाना 30 मिनट पैदल चलना, दौड़ना, साइकिल चलाना, तैराकी करना या कोई भी पसंदीदा खेल खेलना शरीर को सक्रिय रखने के लिए पर्याप्त हो सकता है। नियमित शारीरिक गतिविधि से हृदय स्वस्थ रहता है, वजन नियंत्रित रहता है और मानसिक स्वास्थ्य भी बेहतर होता है।</p><h5 class=""><b>5. जंक और प्रोसेस्ड फूड को सीमित करें</b></h5><p>फास्ट फूड और प्रोसेस्ड फूड का अधिक सेवन धीरे-धीरे शरीर पर नकारात्मक असर डाल सकता है। इनमें अक्सर अधिक मात्रा में नमक, चीनी और अनहेल्दी फैट होते हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि इन्हें रोजाना खाने के बजाय सप्ताह में केवल एक बार तक सीमित रखना बेहतर है। रोजमर्रा की डाइट में ताजे फल, हरी सब्जियां, दालें, साबुत अनाज और प्रोटीन युक्त भोजन शामिल करना चाहिए।</p><h5 class=""><b>छोटी आदतें, बड़ा बदलाव</b></h5><p>स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि स्वस्थ जीवन के लिए किसी बड़े बदलाव की जरूरत नहीं होती। समय पर सोना, नियमित भोजन करना, रोज थोड़ा व्यायाम करना और संतुलित आहार अपनाना जैसी छोटी आदतें लंबे समय तक शरीर और मानसिक स्वास्थ्य दोनों को बेहतर बनाए रखने में मदद करती हैं। Gen Z अगर अभी से इन आदतों को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना ले, तो भविष्य में जीवनशैली से जुड़ी कई गंभीर बीमारियों का खतरा काफी कम किया जा सकता है।</p><p><b><i>डॉ. निश्चल गुप्ता होम्योपैथी के एक भरोसेमंद कंसल्टेंट हैं, जिन्हें क्लिनिकल प्रैक्टिस का 17 साल से ज़्यादा का अनुभव है। होम्योपैथी में MD की डिग्री के साथ, डॉ. गुप्ता ने कई सालों में एलर्जी, त्वचा की समस्याओं, पाचन संबंधी दिक्कतों, गठिया और हार्मोनल असंतुलन जैसी कई तरह की बीमारियों का सफलतापूर्वक इलाज किया है और सभी उम्र के मरीज़ों का भरोसा जीता है।</i></b></p> ]]></content:encoded><media:description type='plain'><![CDATA[ Gen Z की ये 5 हेल्दी आदतें बदल सकती हैं आपकी पूरी लाइफ, आज से ही करें शुरुआत ]]></media:description></item><item><guid isPermaLink='true'><![CDATA[ https://www.gtcbharat.com/health-news/icmr-minds-wins-egovernance-gold-award-2026-5281 ]]></guid><title><![CDATA[ ICMR को ई-गवर्नेंस 2026 में गोल्ड अवॉर्ड, AI आधारित स्वास्थ्य पहल को मिला सम्मान... ]]></title><link><![CDATA[ https://www.gtcbharat.com/health-news/icmr-minds-wins-egovernance-gold-award-2026-5281 ]]></link><pubDate><![CDATA[Sun, 05 Jul 2026 15:05:00 +0530 ]]></pubDate><description><![CDATA[ नई दिल्ली: भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) की प्रमुख पहल ICMR- माइंड्स (ICMR-MINDS) को राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस पुरस्कार 2026 में कैटेगरी-2 (AI और नई तकनीकों के उपयोग से नागरिक-केंद्रित सेवाओं म ]]></description><content:encoded><![CDATA[ <p><span style="font-size: 1rem;"><b>नई दिल्ली: </b>भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) की प्रमुख पहल ICMR- माइंड्स (ICMR-MINDS) को राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस पुरस्कार 2026 में कैटेगरी-2 (AI और नई तकनीकों के उपयोग से नागरिक-केंद्रित सेवाओं में नवाचार) के तहत गोल्ड अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। यह पुरस्कार कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन मंत्रालय के प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग (डीएआरपीजी) द्वारा प्रदान किया जाता है।</span></p><p>आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, यह पुरस्कार केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने राजस्थान सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी एवं संचार मंत्री कर्नल राज्यवर्धन राठौड़, राजस्थान के मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास तथा डीएआरपीजी और पेंशन एवं पेंशनभोगी कल्याण विभाग की सचिव निवेदिता शुक्ला वर्मा की उपस्थिति में प्रदान किया।</p><p><b>मंत्रालय ने सोशल मीडिया पर साझा की जानकारी</b></p><p>स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर इस उपलब्धि को साझा करते हुए कहा, "भारत की डिजिटल स्वास्थ्य यात्रा के लिए यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। मंत्रालय को ई-संजीवनी टेलीमेडिसिन सेवा से एकीकृत AI-सक्षम क्लीनिकल डिसीजन सपोर्ट सिस्टम के लिए राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस पुरस्कार 2026 (गोल्ड) से सम्मानित किया गया है।"</p><p><span style="color: rgb(136, 153, 166); font-family: &quot;Helvetica Neue&quot;, sans-serif; font-size: 12px; text-align: center; white-space: nowrap;">&lt;blockquote class="twitter-tweet"&gt;&lt;p lang="en" dir="ltr"&gt;🏆 A milestone for India’s digital healthcare journey! 🇮🇳&lt;br&gt;&lt;br&gt;The Ministry of Health and Family Welfare has been conferred the National Award for e-Governance 2026 (Gold) by the Department of Administrative Reforms and Public Grievances for its AI-enabled Clinical Decision Support… &lt;a href="https://t.co/aRgixa5mb4"&gt;pic.twitter.com/aRgixa5mb4&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&amp;mdash; Ministry of Health (@MoHFW_INDIA) &lt;a href="https://x.com/MoHFW_INDIA/status/2072709371642159384?ref_src=twsrc^tfw"&gt;July 2, 2026&lt;/a&gt;&lt;/blockquote&gt; &lt;script async src="https://platform.x.com/widgets.js" charset="utf-8"&gt;&lt;/script&gt;</span></p><p><b>लक्षणों के आधार पर डॉक्टरों को ट्रीटमेंट करने में&nbsp; मिलती है मदद</b></p><p>मंत्रालय ने बताया कि यह पुरस्कार उसकी ओर से संयुक्त सचिव मधुकर कुमार भगत और उनकी टीम ने प्राप्त किया। मंत्रालय के अनुसार, ई-संजीवनी प्लेटफॉर्म से जुड़ा AI-सक्षम क्लीनिकल डिसीजन सपोर्ट सिस्टम मरीजों के लक्षणों के आधार पर डॉक्टरों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित चिकित्सकीय सहायता प्रदान करता है। इससे डॉक्टरों के निर्णय लेने की क्षमता मजबूत होती है और लाखों मरीजों को लाभ मिलता है।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">मंत्रालय ने कहा कि यह सम्मान AI और उभरती तकनीकों के माध्यम से सुलभ, प्रभावी और नागरिक-केंद्रित स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।</span></p><p><b>'विकसित भारत 2047' के लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण कदम</b><span style="font-size: 1rem;"></span></p><p>एक अन्य पोस्ट में मंत्रालय ने ICMR को बधाई देते हुए कहा कि ICMR- माइंड्स पहल को मानसिक स्वास्थ्य और नशा संबंधी विकारों की स्क्रीनिंग एवं प्रबंधन को गैर-संचारी रोग (एनसीडी) देखभाल के साथ डिजिटल तकनीक के माध्यम से जोड़ने में नवाचार के लिए गोल्ड अवॉर्ड मिला है। यह 'विकसित भारत 2047' के लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।</p><p>यह सम्मान 1-2 जुलाई 2026 को जयपुर, राजस्थान में आयोजित 29वें राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस सम्मेलन (एनसीईजी 2026) के दौरान प्रदान किया गया।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">ICMR- माइंड्स एक कार्यान्वयन अनुसंधान परियोजना है, जिसका उद्देश्य मानसिक एवं नशा संबंधी विकारों की स्क्रीनिंग और उपचार को अन्य गैर-संचारी रोगों की सेवाओं के साथ जोड़ना है। इसका क्लीनिकल डिसीजन सपोर्ट सिस्टम (सीडीएसएस) प्रशिक्षित गैर-विशेषज्ञ स्वास्थ्यकर्मियों को डिजिटल निर्णय सहायता के जरिए मानसिक स्वास्थ्य की स्क्रीनिंग, मूल्यांकन, फॉलो-अप और नियमित उपचार में सक्षम बनाता है।</span></p><p><b>मरीजों की निरंतर देखभाल सुनिश्चित होती है</b><span style="font-size: 1rem;"></span></p><p>इस प्लेटफॉर्म में डिजिटल स्क्रीनिंग, भूमिका-आधारित चिकित्सकीय मार्गदर्शन, ऑफलाइन सुविधा, बहुभाषी इंटरफेस, गेमिफाइड फीचर्स तथा रियल-टाइम एडमिन डैशबोर्ड जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं। साथ ही यह रेफरल और बैक-रेफरल प्रणाली के जरिए मरीजों की निरंतर देखभाल सुनिश्चित करता है, जिससे विशेषज्ञ चिकित्सकों पर भार कम होता है और मरीजों के उपचार में निरंतरता बनी रहती है।</p><p><b>सात प्रमुख संस्थानों के सहयोग से संचालित है यह परियोजना</b></p><p>यह परियोजना सात राज्यों में सात प्रमुख संस्थानों के सहयोग से संचालित की जा रही है, जिनमें अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, गुवाहाटी, गुजरात इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ, अहमदाबाद, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली, सेंट जॉन्स मेडिकल कॉलेज, बेंगलुरु, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, भोपाल, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, भुवनेश्वर तथा पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (पीजीआईएमईआर), चंडीगढ़ शामिल हैं।</p><p>&nbsp;<b>'ICMR&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">तकनीक-संचालित&nbsp;</span><span style="font-size: 1rem;">नवाचारों को आगे भी बढ़ावा देता रहेगा'</span></b></p><p>इस उपलब्धि पर प्रतिक्रिया देते हुए डॉ. राजीव बहल, स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के सचिव एवं ICMR के महानिदेशक ने कहा कि ICMR सार्वजनिक स्वास्थ्य की जटिल चुनौतियों के समाधान के लिए डेटा आधारित और तकनीक-संचालित नवाचारों को आगे भी बढ़ावा देता रहेगा। उन्होंने कहा कि सहभागी संस्थानों और राज्य स्वास्थ्य प्रणालियों के साथ मिलकर ICMR देशवासियों को किफायती, मानकीकृत और उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है।</p> ]]></content:encoded><media:description type='plain'><![CDATA[ ICMR को ई-गवर्नेंस 2026 में गोल्ड अवॉर्ड, AI आधारित स्वास्थ्य पहल को मिला सम्मान... ]]></media:description></item><item><guid isPermaLink='true'><![CDATA[ https://www.gtcbharat.com/health-news/nocturia-night-frequent-urination-symptoms-causes-treatment-hindi-5251 ]]></guid><title><![CDATA[ रात में बार-बार पेशाब आना कहीं बीमारी का संकेत तो नहीं? जानिए कब डॉक्टर से मिलना है जरूरी ]]></title><link><![CDATA[ https://www.gtcbharat.com/health-news/nocturia-night-frequent-urination-symptoms-causes-treatment-hindi-5251 ]]></link><pubDate><![CDATA[Fri, 03 Jul 2026 21:00:00 +0530 ]]></pubDate><description><![CDATA[ रात में एक बार पेशाब के लिए उठना कई लोगों के लिए सामान्य हो सकता है, खासकर बढ़ती उम्र में। लेकिन अगर यह सिलसिला हर रात दो, तीन या उससे अधिक बार होने लगे और आपकी नींद बार-बार टूटने लगे, तो यह केवल आदत  ]]></description><content:encoded><![CDATA[ <p>रात में एक बार पेशाब के लिए उठना कई लोगों के लिए सामान्य हो सकता है, खासकर बढ़ती उम्र में। लेकिन अगर यह सिलसिला हर रात दो, तीन या उससे अधिक बार होने लगे और आपकी नींद बार-बार टूटने लगे, तो यह केवल आदत या उम्र का असर नहीं भी हो सकता। विशेषज्ञों के अनुसार, यह स्थिति शरीर में किसी छिपी हुई बीमारी का शुरुआती संकेत हो सकती है।</p><p>चिकित्सा विज्ञान में रात के समय बार-बार पेशाब आने की समस्या को <b>नॉक्ट्यूरिया (Nocturia)</b> कहा जाता है। यह अपने आप में कोई बीमारी नहीं है, बल्कि एक ऐसा लक्षण है जो कई स्वास्थ्य समस्याओं की ओर इशारा करता है। इसलिए इस समस्या को लंबे समय तक नजरअंदाज करना सही नहीं माना जाता।</p><h5 class=""><b>क्या है नॉक्ट्यूरिया?</b></h5><p>जब कोई व्यक्ति रात में सोते समय दो या उससे अधिक बार पेशाब करने के लिए उठता है, तो उसे नॉक्ट्यूरिया कहा जाता है। इसकी वजह से नींद पूरी नहीं हो पाती, जिससे दिनभर थकान, चिड़चिड़ापन और काम करने की क्षमता पर असर पड़ सकता है।</p><p>विशेषज्ञों का कहना है कि उम्र बढ़ने के साथ शरीर में कुछ प्राकृतिक बदलाव होते हैं, जिनकी वजह से कुछ लोगों को रात में एक बार उठना पड़ सकता है। लेकिन अगर यह समस्या लगातार बढ़ रही है या रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर रही है, तो इसकी जांच कराना जरूरी है।</p><h5 class=""><b>किन कारणों से हो सकती है यह समस्या?</b><br></h5><p>रात में बार-बार पेशाब आने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। सबसे सामान्य वजह सोने से पहले अधिक मात्रा में पानी या अन्य तरल पदार्थ पीना है। इसके अलावा शाम के समय चाय, कॉफी या शराब का अधिक सेवन भी इसका कारण बन सकता है।</p><p><b>हालांकि कई बार यह समस्या गंभीर बीमारियों का संकेत भी हो सकती है। इनमें शामिल हैं—</b></p><ul><li>डायबिटीज (मधुमेह)<br></li><li>पुरुषों में बढ़ा हुआ प्रोस्टेट<br></li><li>ओवरएक्टिव ब्लैडर<br></li><li>यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (UTI)<br></li><li>किडनी संबंधी समस्याएं<br></li><li>हृदय रोग<br></li><li>स्लीप एपनिया<br></li><li>कुछ दवाओं का प्रभाव</li></ul><p>अगर इनमें से कोई कारण मौजूद है, तो केवल पानी कम पीने से समस्या का समाधान नहीं होगा।</p><h5 class=""><b>कब समझें कि डॉक्टर से मिलना जरूरी है?</b></h5><p>यदि रात में बार-बार पेशाब आने के साथ निम्न लक्षण भी दिखाई दें, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए&nbsp;</p><ul><li>पेशाब में जलन या दर्द<br></li><li>पेशाब में खून आना<br></li><li>बहुत अधिक प्यास लगना<br></li><li>अचानक वजन कम होना<br></li><li>पैरों में सूजन<br></li><li>बुखार<br></li><li>पेशाब करने में कठिनाई<br></li><li>लगातार नींद पूरी न होना और दिनभर थकान महसूस होना</li></ul><p>ऐसे लक्षण किसी गंभीर बीमारी की ओर संकेत कर सकते हैं, इसलिए समय रहते जांच कराना जरूरी है।</p><h5 class=""><b>कैसे होती है जांच?</b></h5><p>डॉक्टर सबसे पहले मरीज की मेडिकल हिस्ट्री, खानपान की आदतों और दवाओं की जानकारी लेते हैं। इसके बाद आवश्यकता के अनुसार कुछ जांचें कराई जा सकती हैं, जैसे&nbsp;</p><ul><li>यूरिन टेस्ट<br></li><li>ब्लड शुगर टेस्ट<br></li><li>किडनी फंक्शन टेस्ट<br></li><li>प्रोस्टेट और ब्लैडर की जांच<br></li><li>अल्ट्रासाउंड<br></li><li>ब्लैडर डायरी (कुछ दिनों तक पेशाब की आदतों का रिकॉर्ड)</li></ul><p>इन जांचों की मदद से समस्या की वास्तविक वजह का पता लगाया जाता है और उसी के अनुसार उपचार शुरू किया जाता है।</p><h5 class=""><b>क्या लाइफस्टाइल में बदलाव से मिल सकती है राहत?</b></h5><p>यदि समस्या किसी गंभीर बीमारी की वजह से नहीं है, तो कुछ आसान बदलाव काफी मददगार साबित हो सकते हैं।</p><ul><li>सोने से 2–3 घंटे पहले अधिक पानी या तरल पदार्थ पीने से बचें।<br></li><li>शाम के बाद चाय, कॉफी और शराब का सेवन सीमित करें।<br></li><li>डायबिटीज और ब्लड प्रेशर को नियंत्रण में रखें।<br></li><li>नियमित व्यायाम और स्वस्थ वजन बनाए रखें।<br></li><li>डॉक्टर की सलाह के अनुसार दवाओं का सही समय निर्धारित करें।</li></ul><p>हालांकि बिना डॉक्टर की सलाह के खुद से दवा लेना या घरेलू नुस्खों पर निर्भर रहना उचित नहीं है।</p><h5 class=""><b>शरीर के संकेतों को नजरअंदाज न करें</b></h5><p>रात में बार-बार पेशाब आना मामूली समस्या भी हो सकती है और किसी गंभीर बीमारी का शुरुआती संकेत भी। इसलिए यदि यह परेशानी लगातार बनी हुई है और आपकी नींद या दैनिक जीवन को प्रभावित कर रही है, तो विशेषज्ञ से सलाह लेना सबसे बेहतर कदम है।</p><p>समय पर जांच और सही इलाज से अधिकांश मामलों में इस समस्या को नियंत्रित किया जा सकता है। इसलिए शरीर के ऐसे संकेतों को नजरअंदाज करने के बजाय उन्हें समझना और समय रहते उचित कदम उठाना ही समझदारी है।</p> ]]></content:encoded><media:description type='plain'><![CDATA[ रात में बार-बार पेशाब आना कहीं बीमारी का संकेत तो नहीं? जानिए कब डॉक्टर से मिलना है जरूरी ]]></media:description></item><item><guid isPermaLink='true'><![CDATA[ https://www.gtcbharat.com/health-news/spine-health-alert-5-daily-habits-damaging-your-back-and-neck-5075 ]]></guid><title><![CDATA[ Spine Health Alert: रीढ़ की हड्डी को कमजोर बना रही हैं आपकी ये 5 रोजमर्रा की आदतें ]]></title><link><![CDATA[ https://www.gtcbharat.com/health-news/spine-health-alert-5-daily-habits-damaging-your-back-and-neck-5075 ]]></link><pubDate><![CDATA[Tue, 23 Jun 2026 12:00:00 +0530 ]]></pubDate><description><![CDATA[ नई दिल्ली: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में कमर दर्द, गर्दन की जकड़न और पीठ से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। कभी केवल बढ़ती उम्र से जुड़ी मानी जाने वाली ये परेशानियां अब युवाओं और बच्चों में भी आम ह ]]></description><content:encoded><![CDATA[ <p><b>नई दिल्ली:</b> आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में कमर दर्द, गर्दन की जकड़न और पीठ से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। कभी केवल बढ़ती उम्र से जुड़ी मानी जाने वाली ये परेशानियां अब युवाओं और बच्चों में भी आम होती जा रही हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कोई गंभीर बीमारी नहीं, बल्कि हमारी रोजमर्रा की कुछ गलत आदतें बड़ी वजह बन रही हैं।</p><p>ऑफिस में घंटों बैठकर काम करना, मोबाइल स्क्रीन पर लगातार झुके रहना, गलत तरीके से सोना और शारीरिक गतिविधियों की कमी जैसी आदतें धीरे-धीरे रीढ़ की हड्डी (Spine) को नुकसान पहुंचा सकती हैं। समय रहते इन आदतों को नहीं बदला गया तो भविष्य में स्लिप डिस्क, सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस और क्रॉनिक बैक पेन जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है।</p><p>1. घंटों तक लगातार बैठे रहना</p><p>आधुनिक कार्यशैली में अधिकांश लोग दिन का बड़ा हिस्सा कुर्सी पर बैठकर बिताते हैं। लंबे समय तक बिना ब्रेक लिए बैठे रहने से रीढ़ की हड्डी पर लगातार दबाव पड़ता है।</p><p>विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार बैठने से पीठ की मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं और शरीर का भार सीधे स्पाइन पर आने लगता है। इससे कमर दर्द और रीढ़ से जुड़ी अन्य समस्याएं पैदा हो सकती हैं।</p><p>क्या करें?</p><ul><li>हर 30 से 40 मिनट बाद उठकर कुछ मिनट टहलें।<br></li><li>काम के दौरान सही पोस्चर बनाए रखें।<br></li><li>एर्गोनोमिक कुर्सी का उपयोग करें।</li></ul><p>2. मोबाइल का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल</p><p>स्मार्टफोन का अत्यधिक उपयोग आज स्पाइन हेल्थ के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। मोबाइल देखते समय लोग अक्सर गर्दन को आगे की ओर झुका लेते हैं, जिसे मेडिकल भाषा में “टेक्स्ट नेक” कहा जाता है।</p><p>इस स्थिति में गर्दन और कंधों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। लंबे समय तक ऐसा करने से गर्दन की मांसपेशियां कमजोर हो सकती हैं और रीढ़ का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ सकता है।</p><p>बचाव के उपाय</p><ul><li>मोबाइल को आंखों के स्तर पर रखें।<br></li><li>लगातार स्क्रीन देखने से बचें।<br></li><li>गर्दन की स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज करें।</li></ul><p>3. गलत तरीके से सोना</p><p>अच्छी नींद केवल समय की नहीं, बल्कि सही मुद्रा की भी मांग करती है। बहुत ऊंचा तकिया या अत्यधिक नरम गद्दा रीढ़ की हड्डी को सही सपोर्ट नहीं दे पाता।</p><p>इसके कारण सुबह उठने पर गर्दन और पीठ में दर्द या जकड़न महसूस हो सकती है। लंबे समय तक गलत सोने की आदत स्पाइन की संरचना को भी प्रभावित कर सकती है।</p><p>ध्यान रखें</p><ul><li>मध्यम कठोरता वाला गद्दा चुनें।<br></li><li>गर्दन को सपोर्ट देने वाला तकिया इस्तेमाल करें।<br></li><li>पेट के बल सोने से बचें।</li></ul><p>4. बढ़ता वजन भी है बड़ा कारण</p><p>शरीर का अतिरिक्त वजन, विशेषकर पेट के आसपास जमा चर्बी, रीढ़ की हड्डी पर अतिरिक्त दबाव डालती है। इससे कमर दर्द और जोड़ों से जुड़ी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।</p><p>विशेषज्ञों के मुताबिक मोटापा केवल हृदय रोगों का ही नहीं, बल्कि स्पाइन संबंधी समस्याओं का भी प्रमुख कारण है।</p><p>कैसे रखें नियंत्रण?</p><ul><li>संतुलित आहार लें।<br></li><li>नियमित व्यायाम करें।<br></li><li>जंक फूड और मीठे पेय पदार्थों से दूरी बनाएं।</li></ul><p>5. भारी सामान उठाने का गलत तरीका</p><p>कई लोग भारी सामान उठाते समय घुटनों को मोड़ने के बजाय सीधे कमर से झुक जाते हैं। यह आदत लोअर बैक पर अचानक दबाव डालती है और स्लिप डिस्क जैसी गंभीर समस्याओं का कारण बन सकती है।</p><p>सही तरीका</p><ul><li>सामान उठाने से पहले घुटनों को मोड़ें।<br></li><li>वजन शरीर के करीब रखें।<br></li><li>अचानक झटके से बचें।</li></ul><p>स्पाइन को स्वस्थ रखने के आसान उपाय</p><p>रीढ़ की हड्डी को मजबूत बनाए रखने के लिए कुछ सरल आदतें अपनाई जा सकती हैं:</p><ul><li>रोज कम से कम 30 मिनट वॉक करें।<br></li><li>योग और स्ट्रेचिंग को दिनचर्या में शामिल करें।<br></li><li>सही बैठने और खड़े होने की मुद्रा अपनाएं।<br></li><li>पर्याप्त पानी पिएं।<br></li><li>लंबे समय तक एक ही स्थिति में न रहें।<br></li><li>स्क्रीन टाइम सीमित करें।</li></ul><p>समय रहते संभलना जरूरी</p><p>विशेषज्ञों का कहना है कि स्पाइन शरीर की मुख्य संरचना है, जो पूरे शरीर को संतुलन और सहारा देती है। इसलिए इसकी देखभाल को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। छोटी-छोटी गलत आदतें लंबे समय में बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं का रूप ले सकती हैं।</p><p>यदि आपको लगातार गर्दन, पीठ या कमर में दर्द महसूस हो रहा है, तो इसे सामान्य समझकर नजरअंदाज न करें। समय पर जीवनशैली में बदलाव और चिकित्सकीय सलाह भविष्य की गंभीर परेशानियों से बचा सकती है।</p> ]]></content:encoded><media:description type='plain'><![CDATA[ Spine Health Alert: रीढ़ की हड्डी को कमजोर बना रही हैं आपकी ये 5 रोजमर्रा की आदतें ]]></media:description></item><item><guid isPermaLink='true'><![CDATA[ https://www.gtcbharat.com/health-news/3-habits-that-double-disease-risk-after-age-30-health-alert-5074 ]]></guid><title><![CDATA[ 30 के बाद फिट और हेल्दी रहना है तो आज ही छोड़ दें ये 3 नुकसानदायक आदतें ]]></title><link><![CDATA[ https://www.gtcbharat.com/health-news/3-habits-that-double-disease-risk-after-age-30-health-alert-5074 ]]></link><pubDate><![CDATA[Tue, 23 Jun 2026 12:00:00 +0530 ]]></pubDate><description><![CDATA[ नई दिल्ली: एक समय था जब डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट डिजीज और जोड़ों से जुड़ी समस्याएं बढ़ती उम्र के साथ देखने को मिलती थीं। लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। 30 साल की उम्र पार करते ही बड़ी संख्या में ]]></description><content:encoded><![CDATA[ <p><b>नई दिल्ली:</b> एक समय था जब डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट डिजीज और जोड़ों से जुड़ी समस्याएं बढ़ती उम्र के साथ देखने को मिलती थीं। लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। 30 साल की उम्र पार करते ही बड़ी संख्या में लोग ऐसी बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं, जिन्हें पहले बुजुर्गों की बीमारी माना जाता था।</p><p>स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इसके पीछे केवल आनुवंशिक कारण नहीं, बल्कि बदलती जीवनशैली और रोजमर्रा की कुछ खराब आदतें भी जिम्मेदार हैं। आधुनिक जीवन की भागदौड़, अनियमित खानपान और शारीरिक गतिविधियों में कमी ने युवाओं की सेहत पर गहरा असर डाला है। डॉक्टरों के मुताबिक यदि समय रहते इन आदतों में सुधार नहीं किया गया, तो कई गंभीर बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ सकता है।</p><h5 class=""><b>कम उम्र में क्यों बढ़ रही हैं लाइफस्टाइल बीमारियां?</b></h5><p>विशेषज्ञों का मानना है कि आज की पीढ़ी पहले की तुलना में अधिक सुविधाजनक जीवन जी रही है, लेकिन इसका असर शारीरिक सक्रियता पर पड़ा है। ऑनलाइन सेवाओं, लंबे समय तक स्क्रीन के सामने बैठने और फास्ट फूड की बढ़ती आदतों ने शरीर के प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित किया है।</p><p>इसके साथ ही नींद की कमी, बढ़ता मानसिक दबाव और अनियमित दिनचर्या भी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को बढ़ावा दे रहे हैं।</p><h5 class=""><b>आदत नंबर 1: लगातार मानसिक तनाव</b></h5><p>मानसिक तनाव आज लगभग हर व्यक्ति की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। हालांकि सीमित तनाव सामान्य माना जाता है, लेकिन यदि यह लंबे समय तक बना रहे तो शरीर पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।</p><p>तनाव की स्थिति में शरीर में कई हार्मोन असंतुलित हो जाते हैं। इसका असर हृदय, मस्तिष्क और पाचन तंत्र पर पड़ता है। लगातार तनाव से हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा, नींद की समस्या, चिंता और अवसाद जैसी परेशानियां बढ़ सकती हैं।</p><p>विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक तनाव में रहने वाले लोगों में हार्ट डिजीज और मेटाबॉलिक डिसऑर्डर का खतरा भी बढ़ जाता है।</p><h5 class=""><b>आदत नंबर 2: एक्सरसाइज से दूरी</b></h5><p>शारीरिक गतिविधियों की कमी आज की सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक है। कई लोग घंटों ऑफिस में बैठकर काम करते हैं और दिनभर में पर्याप्त शारीरिक गतिविधि नहीं कर पाते।</p><p>नियमित व्यायाम शरीर को सक्रिय रखने के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद माना जाता है। एक्सरसाइज से ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है, वजन नियंत्रित रहता है और हृदय मजबूत बनता है।</p><p>इसके अलावा नियमित शारीरिक गतिविधि करने से तनाव कम होता है, नींद बेहतर आती है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है। विशेषज्ञों के अनुसार रोज कम से कम 30 मिनट की शारीरिक गतिविधि कई गंभीर बीमारियों के खतरे को कम कर सकती है।</p><h5 class=""><b>आदत नंबर 3: सिगरेट और शराब का सेवन</b></h5><p>धूम्रपान और शराब का सेवन शरीर को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाने वाली आदतों में शामिल है। शुरुआत में इनके दुष्प्रभाव स्पष्ट नहीं दिखते, लेकिन समय के साथ ये गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं।</p><p>तंबाकू में मौजूद हानिकारक रसायन फेफड़ों, हृदय और रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं। वहीं अत्यधिक शराब का सेवन लिवर, किडनी और मस्तिष्क पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।</p><p>विशेषज्ञों का कहना है कि धूम्रपान और शराब का संयोजन कैंसर, लिवर रोग और हृदय संबंधी समस्याओं का जोखिम कई गुना बढ़ा सकता है।</p><h5 class=""><b>स्वस्थ रहने के लिए क्या करें?</b></h5><p>स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार कुछ आसान बदलाव अपनाकर कई बीमारियों से बचा जा सकता है।</p><p><b>अपनाएं ये हेल्दी आदतें:</b></p><ul><li>रोजाना कम से कम 30 मिनट व्यायाम करें<br></li><li>संतुलित और पौष्टिक आहार लें<br></li><li>फास्ट फूड और जंक फूड का सेवन कम करें<br></li><li>पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं<br></li><li>रोज 7 से 8 घंटे की नींद लें<br></li><li>योग और ध्यान को दिनचर्या में शामिल करें<br></li><li>धूम्रपान और शराब से दूरी बनाएं<br></li><li>तनाव को नियंत्रित करने के लिए सकारात्मक गतिविधियों में हिस्सा लें</li></ul><h5 class=""><b>समय रहते सुधार जरूरी</b></h5><p>विशेषज्ञों का मानना है कि 30 की उम्र के बाद शरीर में कई प्राकृतिक बदलाव शुरू हो जाते हैं। ऐसे में स्वस्थ जीवनशैली अपनाना बेहद जरूरी हो जाता है। छोटी-छोटी लापरवाहियां भविष्य में बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती हैं।</p><p>यदि खानपान, नींद, व्यायाम और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान दिया जाए तो न केवल बीमारियों का खतरा कम किया जा सकता है, बल्कि लंबे समय तक स्वस्थ और सक्रिय जीवन भी जिया जा सकता है।</p> ]]></content:encoded><media:description type='plain'><![CDATA[ 30 के बाद फिट और हेल्दी रहना है तो आज ही छोड़ दें ये 3 नुकसानदायक आदतें ]]></media:description></item><item><guid isPermaLink='true'><![CDATA[ https://www.gtcbharat.com/health-news/egg-for-babies-benefits-of-introducing-eggs-at-6-to-8-months-5073 ]]></guid><title><![CDATA[ बच्चों को कब से खिलाना चाहिए अंडा? नई रिसर्च में सामने आए चौंकाने वाले फायदे ]]></title><link><![CDATA[ https://www.gtcbharat.com/health-news/egg-for-babies-benefits-of-introducing-eggs-at-6-to-8-months-5073 ]]></link><pubDate><![CDATA[Tue, 23 Jun 2026 11:00:00 +0530 ]]></pubDate><description><![CDATA[ नई दिल्ली: बच्चों की परवरिश के दौरान माता-पिता के मन में सबसे बड़ा सवाल यही रहता है कि शिशु को कौन-सी चीज कब खिलानी चाहिए। खासकर अंडे को लेकर अक्सर असमंजस बना रहता है। कई परिवारों में यह धारणा रही है  ]]></description><content:encoded><![CDATA[ <p><b>नई दिल्ली:</b> बच्चों की परवरिश के दौरान माता-पिता के मन में सबसे बड़ा सवाल यही रहता है कि शिशु को कौन-सी चीज कब खिलानी चाहिए। खासकर अंडे को लेकर अक्सर असमंजस बना रहता है। कई परिवारों में यह धारणा रही है कि अंडा जल्दी देने से बच्चों में एलर्जी का खतरा बढ़ सकता है। हालांकि अब हालिया शोध इस सोच को बदलता नजर आ रहा है।</p><p>विशेषज्ञों के अनुसार, सही समय पर अंडा शुरू करना न केवल सुरक्षित हो सकता है बल्कि इससे बच्चों में भविष्य में होने वाली खाद्य एलर्जी का जोखिम भी कम हो सकता है। हाल में प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने इस विषय पर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है, जिससे माता-पिता को बच्चों के आहार को लेकर बेहतर निर्णय लेने में मदद मिल सकती है।</p><h5 class=""><b>6 से 8 महीने की उम्र को माना गया उपयुक्त</b></h5><p>शोधकर्ताओं के अनुसार, शिशु के छह से आठ महीने की उम्र के बीच अंडा आहार में शामिल करना लाभकारी हो सकता है। इस अवधि में बच्चे ठोस भोजन की शुरुआत कर चुके होते हैं और उनका पाचन तंत्र नए खाद्य पदार्थों को स्वीकार करने के लिए विकसित होने लगता है।</p><p>विशेषज्ञों का कहना है कि इस उम्र में धीरे-धीरे अंडा शुरू करने से शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली उसे पहचानना सीखती है, जिससे आगे चलकर एलर्जी की संभावना कम हो सकती है।</p><h5 class=""><b>रिसर्च में क्या सामने आया?</b></h5><p>अध्ययन में पाया गया कि जिन बच्चों को शुरुआती महीनों में अंडा दिया गया, उनमें अंडे से संबंधित एलर्जी के मामले अपेक्षाकृत कम देखे गए। खासकर उन बच्चों में इसका सकारात्मक प्रभाव अधिक दिखाई दिया जिन्हें त्वचा संबंधी समस्याएं, जैसे एक्जिमा, होने की संभावना थी।</p><p>विशेषज्ञ मानते हैं कि शुरुआती उम्र में नियंत्रित मात्रा में एलर्जी पैदा करने वाले खाद्य पदार्थ देने से शरीर उनके प्रति सहनशीलता विकसित कर सकता है।</p><h5 class=""><b>अंडा क्यों है बच्चों के लिए फायदेमंद?</b></h5><p>अंडा पोषण का बेहतरीन स्रोत माना जाता है। इसमें प्रोटीन, विटामिन D, विटामिन B12, आयरन, कोलीन और कई आवश्यक पोषक तत्व पाए जाते हैं जो बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।</p><p>अंडे में मौजूद उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन मांसपेशियों के विकास में मदद करता है, जबकि कोलीन मस्तिष्क के विकास और याददाश्त को मजबूत बनाने में सहायक माना जाता है।</p><p><b>अंडा खाने के प्रमुख फायदे</b></p><ul><li>शरीर को उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन मिलता है<br></li><li>मस्तिष्क के विकास में मदद करता है<br></li><li>हड्डियों को मजबूत बनाने में सहायक<br></li><li>प्रतिरक्षा प्रणाली को बेहतर बनाता है<br></li><li>आंखों और त्वचा के स्वास्थ्य के लिए लाभकारी<br></li><li>बच्चों की वृद्धि और विकास को समर्थन देता है</li></ul><h5 class=""><b>शुरुआत कैसे करें?</b></h5><p>बाल रोग विशेषज्ञों के अनुसार, पहली बार अंडा देते समय उसे पूरी तरह पकाकर ही देना चाहिए। कच्चा या अधपका अंडा बच्चों के लिए सुरक्षित नहीं माना जाता।</p><p>शुरुआत में अंडे की जर्दी को अच्छी तरह मैश करके कम मात्रा में दिया जा सकता है। यदि बच्चा उसे आसानी से पचा ले और कोई एलर्जी प्रतिक्रिया न दिखे, तो धीरे-धीरे मात्रा बढ़ाई जा सकती है।</p><h5 class=""><b>किन बातों का रखें ध्यान?</b></h5><p>यदि परिवार में पहले से खाद्य एलर्जी का इतिहास है, तो अंडा शुरू करने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर होगा। अंडा देने के बाद बच्चे में किसी प्रकार के चकत्ते, उल्टी, सांस लेने में परेशानी या सूजन जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।</p><p>विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि नया खाद्य पदार्थ शुरू करने के बाद कुछ दिनों तक बच्चे पर नजर रखनी चाहिए ताकि किसी संभावित प्रतिक्रिया का समय रहते पता चल सके।</p><h5 class=""><b>स्वस्थ विकास के लिए संतुलित आहार जरूरी</b></h5><p>डॉक्टरों का कहना है कि अंडा बच्चों के लिए पोषण का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है, लेकिन इसे संतुलित आहार के साथ ही शामिल करना चाहिए। फल, सब्जियां, दालें और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थ भी बच्चे के संपूर्ण विकास के लिए आवश्यक हैं।</p><p>नई रिसर्च यह संकेत देती है कि सही उम्र में और सही तरीके से अंडा शुरू करने से बच्चों को पोषण संबंधी लाभ मिल सकते हैं और कुछ मामलों में एलर्जी का जोखिम भी कम हो सकता है। इसलिए माता-पिता को विशेषज्ञ सलाह के साथ बच्चों के आहार में इसे शामिल करने पर विचार करना चाहिए।</p> ]]></content:encoded><media:description type='plain'><![CDATA[ बच्चों को कब से खिलाना चाहिए अंडा? नई रिसर्च में सामने आए चौंकाने वाले फायदे ]]></media:description></item><item><guid isPermaLink='true'><![CDATA[ https://www.gtcbharat.com/health-news/sleep-ranking-2026-india-china-top-countries-with-most-sleep-5072 ]]></guid><title><![CDATA[ नींद के मामले में कौन है दुनिया का चैंपियन? भारत और चीन भी टॉप-5 में, जानिए पूरी रिपोर्ट ]]></title><link><![CDATA[ https://www.gtcbharat.com/health-news/sleep-ranking-2026-india-china-top-countries-with-most-sleep-5072 ]]></link><pubDate><![CDATA[Tue, 23 Jun 2026 10:00:00 +0530 ]]></pubDate><description><![CDATA[ नई दिल्ली: तेज रफ्तार जिंदगी, बढ़ते स्क्रीन टाइम और काम के दबाव के बीच दुनिया भर में नींद की समस्या एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। हालांकि हाल ही में सामने आए वैश्विक आंकड़े एक दिलचस्प तस्वीर पेश करते ]]></description><content:encoded><![CDATA[ <p><b>नई दिल्ली: </b>तेज रफ्तार जिंदगी, बढ़ते स्क्रीन टाइम और काम के दबाव के बीच दुनिया भर में नींद की समस्या एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। हालांकि हाल ही में सामने आए वैश्विक आंकड़े एक दिलचस्प तस्वीर पेश करते हैं। कई ऐसे देश हैं जहां लोग हर रात लंबी और बेहतर नींद ले रहे हैं। खास बात यह है कि इस सूची में भारत और चीन जैसे व्यस्त जीवनशैली वाले देश भी शीर्ष पांच में शामिल हैं।</p><p>विशेषज्ञों का मानना है कि पर्याप्त नींद केवल आराम का माध्यम नहीं है, बल्कि यह शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी बेहद जरूरी है। अच्छी नींद शरीर की ऊर्जा बहाल करने, तनाव कम करने और प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।</p><h5 class=""><b>दक्षिण अफ्रीका बना दुनिया का ‘स्लीप चैंपियन’</b></h5><p>वैश्विक नींद पैटर्न पर आधारित एक अध्ययन के अनुसार दक्षिण अफ्रीका के लोग सबसे अधिक नींद लेने वालों में शामिल हैं। यहां लोग औसतन 9 घंटे से अधिक समय तक सोते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि नियमित दिनचर्या और जीवनशैली के कुछ पहलू इस परिणाम के पीछे अहम कारण हो सकते हैं</p><p>लंबी नींद लेने वाले देशों की सूची में दक्षिण अफ्रीका के बाद चीन का स्थान आता है, जहां लोग औसतन 9 घंटे के आसपास नींद लेते हैं।</p><h5 class=""><b>भारत भी टॉप-5 देशों में शामिल</b></h5><p>भारत ने भी इस सूची में उल्लेखनीय स्थान हासिल किया है। रिपोर्ट के अनुसार भारतीय नागरिक औसतन करीब 8 घंटे 48 मिनट की नींद लेते हैं। यह आंकड़ा दर्शाता है कि स्वास्थ्य और रिकवरी को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ रही है।</p><p>विशेषज्ञों का मानना है कि पर्याप्त नींद लेने वाले लोगों में कार्यक्षमता बेहतर होती है और मानसिक तनाव अपेक्षाकृत कम रहता है।</p><p><b>सबसे ज्यादा नींद लेने वाले देश</b></p><ul><li>दक्षिण अफ्रीका – 9 घंटे 13 मिनट<br></li><li>चीन – 9 घंटे 2 मिनट<br></li><li>अमेरिका – 8 घंटे 59 मिनट<br></li><li>एस्टोनिया – 8 घंटे 50 मिनट<br></li><li>भारत – 8 घंटे 48 मिनट</li></ul><h5 class=""><b>किन देशों में सबसे कम सोते हैं लोग?</b></h5><p>जहां कुछ देश लंबी नींद के लिए चर्चा में हैं, वहीं कई देशों में लोगों की नींद का औसत काफी कम है। रिपोर्ट के मुताबिक कुवैत सबसे कम नींद लेने वाले देशों में शामिल है। इसके अलावा जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में भी लोग अपेक्षाकृत कम समय सोते हैं।</p><p>विशेषज्ञों का मानना है कि अत्यधिक कार्यभार, देर रात तक डिजिटल डिवाइस का उपयोग और शहरी जीवनशैली नींद की अवधि को प्रभावित करते हैं।</p><h5 class=""><b>केवल घंटे नहीं, नींद की गुणवत्ता भी जरूरी</b></h5><p>स्वास्थ्य विशेषज्ञ बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि सिर्फ अधिक घंटे सोना ही पर्याप्त नहीं है। यदि नींद बार-बार टूटती है या व्यक्ति पर्याप्त आराम महसूस नहीं करता, तो लंबी अवधि की नींद भी अपेक्षित लाभ नहीं दे पाती।</p><p>गहरी और गुणवत्तापूर्ण नींद शरीर की मरम्मत, मस्तिष्क की कार्यक्षमता और भावनात्मक संतुलन के लिए आवश्यक मानी जाती है।</p><h5 class=""><b>कम नींद से बढ़ सकता है बीमारी का खतरा</b></h5><p>विश्व स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार लगातार कम नींद लेने से कई स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। इनमें हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा, मानसिक तनाव, अवसाद और कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली जैसी समस्याएं शामिल हैं।</p><p>शोध यह भी बताते हैं कि पर्याप्त नींद न मिलने पर स्मरण शक्ति और एकाग्रता प्रभावित हो सकती है। इसलिए स्वस्थ जीवनशैली के लिए नियमित और संतुलित नींद को प्राथमिकता देना जरूरी है।</p><h5 class=""><b>स्वास्थ्य की असली पूंजी है अच्छी नींद</b></h5><p>विशेषज्ञों का कहना है कि अच्छी नींद किसी भी व्यक्ति की सबसे बड़ी स्वास्थ्य संपत्ति है। व्यस्त जीवन के बीच यदि शरीर और दिमाग को पर्याप्त आराम मिलता है, तो कार्यक्षमता और जीवन की गुणवत्ता दोनों बेहतर होती हैं। यही कारण है कि आज दुनिया भर में लोग बेहतर नींद को स्वस्थ जीवन की पहली शर्त मानने लगे हैं।</p> ]]></content:encoded><media:description type='plain'><![CDATA[ नींद के मामले में कौन है दुनिया का चैंपियन? भारत और चीन भी टॉप-5 में, जानिए पूरी रिपोर्ट ]]></media:description></item></channel></rss>