₹2,500 वाली लक्ष्मी योजना पर दिल्ली HC का सवाल, महिलाओं को MLA-MP की मंजूरी क्यों जरूरी?

दिल्ली की ₹2,500 मासिक लक्ष्मी योजना में MLA-MP की मंजूरी अनिवार्य किए जाने पर हाई कोर्ट ने सवाल उठाया है। कोर्ट ने सरकार से 10 दिन में इस शर्त का उद्देश्य स्पष्ट करने को कहा है।

By  Laxman August 25th 2026 04:00 PM -- Updated: August 25th 2026 03:23 PM

नई दिल्ली: दिल्ली सरकार की ₹2,500 प्रति माह वाली लक्ष्मी योजना को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट ने अहम सवाल उठाया है। कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि किसी महिला को कल्याणकारी योजना का लाभ देने के लिए स्थानीय सांसद या विधायक की मंजूरी को अनिवार्य क्यों बनाया गया है।

मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की पीठ ने सोमवार को सुनवाई के दौरान इस शर्त पर सवाल उठाते हुए सरकार से इसका उद्देश्य स्पष्ट करने को कहा। कोर्ट ने पूछा कि अगर कोई पात्र महिला अपने क्षेत्र के सांसद या विधायक को नहीं जानती है, तो क्या केवल इस वजह से वह सरकारी योजना के लाभ से वंचित हो सकती है?

MLA-MP की मंजूरी पर कोर्ट ने उठाया सवाल

दिल्ली सरकार ने लक्ष्मी योजना को डायरेक्ट बेनिफिट स्कीम के तौर पर शुरू किया है। इसके तहत पात्र महिलाओं को हर महीने ₹2,500 की आर्थिक सहायता देने का प्रावधान है।

हालांकि, योजना की प्रक्रिया में एक ऐसी शर्त शामिल है, जिस पर अब अदालत ने सवाल उठाया है। लाभार्थी महिला के आवेदन को आगे बढ़ाने के लिए उसके स्थानीय सांसद या विधायक से मंजूरी लेने की जरूरत बताई गई है।

हाई कोर्ट ने इस व्यवस्था पर सवाल करते हुए कहा कि लाभार्थियों की पहचान और पात्रता जांचने के कई अन्य तरीके हो सकते हैं। अदालत का मुख्य सवाल यह है कि चुने हुए जनप्रतिनिधि की मंजूरी को योजना का अनिवार्य हिस्सा बनाने के पीछे सरकार का उद्देश्य क्या है।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि किसी पात्र व्यक्ति को केवल इस शर्त की वजह से योजना का लाभ नहीं मिल पाता, तो इस व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठ सकता है।

सरकार को 10 दिन में देना होगा जवाब

अदालत ने दिल्ली सरकार को इस शर्त के पीछे का उद्देश्य स्पष्ट करने के लिए 10 दिन का समय दिया है। सरकार को एक संक्षिप्त हलफनामा दाखिल कर बताना होगा कि योजना में सांसद या विधायक की मंजूरी वाली व्यवस्था क्यों रखी गई है।

सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने अदालत को बताया कि सरकार इस प्रावधान को लेकर अपना पक्ष रिकॉर्ड पर रखना चाहती है। उन्होंने कहा कि सरकार यह बताएगी कि कैबिनेट ने इस व्यवस्था को किस नजरिए से देखा और दूसरे राज्यों में ऐसी योजनाओं के लिए किस तरह की प्रक्रिया अपनाई जाती है।

अब अगली सुनवाई में सरकार का जवाब इस मामले में महत्वपूर्ण होगा।

कांग्रेस नेताओं ने दाखिल की PIL

यह मामला कांग्रेस के पूर्व पार्षद अभिषेक दत्त और आया नगर वार्ड के मौजूदा कांग्रेस पार्षद वेदपाल चौधरी की ओर से दायर जनहित याचिका के जरिए हाई कोर्ट पहुंचा है।

याचिकाकर्ताओं ने लक्ष्मी योजना में सांसद या विधायक से मंजूरी लेने की अनिवार्यता को हटाने की मांग की है। उनका तर्क है कि इस प्रक्रिया से उन महिलाओं को परेशानी हो सकती है जिन्हें अपने क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों तक पहुंचने में मुश्किल होती है।

याचिका में खास तौर पर दिल्ली की कच्ची कॉलोनियों और अपेक्षाकृत कमजोर वर्ग की महिलाओं की व्यावहारिक दिक्कतों का जिक्र किया गया है।

महिलाओं के लिए क्या है लक्ष्मी योजना?

लक्ष्मी योजना की शुरुआत 1 अगस्त से की गई है। योजना के तहत पात्र महिलाओं को हर महीने ₹2,500 की सहायता देने का प्रावधान है।

हालांकि, आर्थिक सहायता पाने के लिए कई पात्रता शर्तें भी निर्धारित की गई हैं। इनमें दिल्ली में कम से कम 10 साल तक लगातार रहने या दिल्ली का डोमिसाइल होना शामिल है।

इसके अलावा ऐसी महिलाओं को योजना से बाहर रखा गया है जिनके तीन से ज्यादा बच्चे जीवित हैं। आपराधिक रिकॉर्ड से जुड़ी शर्तों के आधार पर भी किसी आवेदक को अयोग्य माना जा सकता है।

इन शर्तों के अलावा स्थानीय सांसद या विधायक की मंजूरी वाली प्रक्रिया ही इस समय अदालत के सामने मुख्य विवाद का विषय है।

याचिकाकर्ताओं ने बताई जमीनी परेशानी

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि दिल्ली की कच्ची कॉलोनियों में रहने वाली कई महिलाओं के लिए स्थानीय सांसद या विधायक के कार्यालय तक पहुंचना आसान नहीं है। कई जगहों पर इन कार्यालयों तक सार्वजनिक परिवहन की सुविधा भी पर्याप्त नहीं होने का दावा किया गया है।

उनका कहना है कि मंजूरी लेने के लिए बार-बार कार्यालय जाने से महिलाओं का समय और पैसा खर्च हो सकता है। घरेलू जिम्मेदारियों और रोजमर्रा की आजीविका के बीच ऐसी अतिरिक्त प्रक्रिया उनके लिए परेशानी पैदा कर सकती है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि जिस योजना का उद्देश्य आर्थिक रूप से जरूरतमंद महिलाओं को सहायता देना है, उसकी आवेदन प्रक्रिया ऐसी नहीं होनी चाहिए जो सबसे कमजोर लाभार्थियों के लिए अतिरिक्त बाधा बन जाए।

अब सरकार के जवाब पर टिकी नजर

फिलहाल हाई कोर्ट ने योजना को रद्द करने या ₹2,500 की सहायता पर रोक लगाने जैसा कोई आदेश नहीं दिया है। अदालत का सवाल मुख्य रूप से सांसद-विधायक की मंजूरी वाली शर्त के औचित्य को लेकर है।

अब दिल्ली सरकार को 10 दिनों के भीतर अपना हलफनामा दाखिल करना है। इसके बाद अदालत यह देखेगी कि सरकार इस प्रावधान के पीछे क्या प्रशासनिक या नीतिगत कारण बताती है।

इस मामले का असर केवल लक्ष्मी योजना की आवेदन प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह सकता। यदि अदालत इस शर्त पर गंभीर सवाल उठाती है, तो भविष्य में सरकारी कल्याणकारी योजनाओं में लाभार्थियों की पहचान और जनप्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर भी व्यापक बहस हो सकती है।

© Copyright Galactic Television & Communications Pvt. Ltd. 2026. All rights reserved.