बिजली कंपनियों के ऑडिट पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश, 15 जुलाई को होगी अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद 5 मार्च 2026 को दिल्ली के उपराज्यपाल ने सीएजी से ऑडिट कराने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। इस निर्णय को एपीटीईएल में चुनौती दी गई, जिसने प्रस्ताव रद्द करते हुए डीईआरसी को स्वतंत्र चार्टर्ड अकाउंटेंट नियुक्त करने का निर्देश दिया था।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को दिल्ली की बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) के भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) द्वारा प्रस्तावित ऑडिट पर अंतरिम रोक लगा दी। अदालत ने 15 जुलाई तक यथास्थिति (स्टेटस क्वो) बनाए रखने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई भी 15 जुलाई को होगी।
न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने दिल्ली विद्युत विनियामक आयोग (डीईआरसी) द्वारा दायर अपील पर नोटिस भी जारी किया। इस अपील में अप्रैल 2026 में विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण (एपीटीईएल) द्वारा दिए गए उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें कहा गया था कि डीईआरसी बिजली वितरण कंपनियों के ऑडिट की जिम्मेदारी सीएजी को नहीं सौंप सकता। सुप्रीम कोर्ट ने एपीटीईएल के आदेश के प्रभाव पर फिलहाल रोक लगा दी। एपीटीईएल ने अपने आदेश में डीईआरसी को निर्देश दिया था कि वह ऑडिट के लिए किसी स्वतंत्र चार्टर्ड अकाउंटेंट की नियुक्ति करे।
रेगुलेटरी एसेट्स की वसूली से पहले ऑडिट कराना अनिवार्य
डीईआरसी की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में दलील दी कि 6 अगस्त 2025 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार बिजली उपभोक्ताओं से नियामकीय परिसंपत्तियों (रेगुलेटरी एसेट्स) की वसूली से पहले ऑडिट कराना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि यह ऑडिट शीर्ष अदालत द्वारा तय की गई प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा है।
वहीं, बिजली वितरण कंपनियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने तर्क दिया कि ऑडिट और रेगुलेटरी एसेट्स की वसूली दो अलग-अलग मुद्दे हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान विवाद केवल इस बात तक सीमित है कि ऑडिट किस संस्था से कराया जाए।
6 अगस्त 2025 के अपने फैसले की व्याख्या करना आवश्यक- सुप्रीम कोर्ट
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में 6 अगस्त 2025 के अपने फैसले की व्याख्या करना आवश्यक है। अदालत ने मामले को 15 जुलाई के लिए सूचीबद्ध करते हुए इसे उचित पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश के पास भेजने का निर्देश दिया।
गौरतलब है कि अगस्त 2025 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला 2011 से 2014 के बीच डीईआरसी द्वारा जारी बिजली टैरिफ आदेशों से जुड़े मामलों पर आया था। उस फैसले में अदालत ने कहा था कि लंबे समय तक रेगुलेटरी एसेट्स का बोझ टालने से बिजली दर निर्धारण की प्रक्रिया प्रभावित होती है और इसका भार भविष्य के उपभोक्ताओं पर पड़ता है।
5 मार्च 2026 को सीएजी से ऑडिट कराने के प्रस्ताव को मिली मंजूरी
इसके बाद अदालत ने बिजली नियामकों को लागत आधारित टैरिफ लागू करने, तय समयसीमा में रेगुलेटरी एसेट्स का निपटान करने और उनके बढ़ने के कारणों की सख्त ऑडिट कराने का निर्देश दिया था। हालांकि, उस फैसले में यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि ऑडिट किस संस्था द्वारा कराया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद 5 मार्च 2026 को दिल्ली के उपराज्यपाल ने सीएजी से ऑडिट कराने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। इस निर्णय को एपीटीईएल में चुनौती दी गई, जिसने प्रस्ताव रद्द करते हुए डीईआरसी को स्वतंत्र चार्टर्ड अकाउंटेंट नियुक्त करने का निर्देश दिया था।