दुर्गा पूजा में मछली-मांस पर क्यों छिड़ी बहस? धीरेंद्र शास्त्री की अपील से बंगाल में सियासत गरम, BJP-TMC ने दिया जवाब

Durga Puja 2026: धीरेंद्र शास्त्री की दुर्गा पूजा के दौरान मछली-मांस न खाने की अपील के बाद बंगाल में विवाद छिड़ गया है। Bengal BJP अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने भी कहा कि बंगालियों के खान-पान का फैसला कोई बाहरी व्यक्ति नहीं कर सकता।

By  Laxman September 8th 2026 12:49 PM

कोलकाता: पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा से पहले खान-पान और धार्मिक परंपराओं को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। विवाद की शुरुआत बागेश्वर धाम के धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की उस अपील से हुई, जिसमें उन्होंने बंगाल के लोगों से दुर्गा पूजा के दौरान मछली और मांस जैसे मांसाहारी भोजन से दूरी बनाने को कहा। उन्होंने त्योहार के समय मांसाहारी भोजन करने वालों को लेकर भी टिप्पणी की।

धीरेंद्र शास्त्री की इस अपील के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। खास बात यह है कि बीजेपी की बंगाल इकाई ने भी इस मुद्दे पर शास्त्री की बात से दूरी बना ली है। प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने साफ कहा कि बाहर से आया कोई धार्मिक व्यक्ति बंगाल के लोगों के खान-पान और पहनावे का फैसला नहीं कर सकता।

क्या कहा था धीरेंद्र शास्त्री ने?

पश्चिम बंगाल दौरे के दौरान धीरेंद्र शास्त्री ने लोगों से दुर्गा पूजा जैसे धार्मिक पर्व के समय मांसाहारी भोजन से बचने की अपील की। उन्होंने त्योहार के दौरान मांसाहार करने वालों को लेकर आपत्ति जताई और लोगों से अपनी खान-पान की आदत बदलने की बात कही।

उनकी इस टिप्पणी के बाद बंगाल में बहस शुरू हो गई। सवाल सिर्फ मछली या मांस खाने का नहीं रहा, बल्कि यह चर्चा बंगाल की स्थानीय संस्कृति, धार्मिक परंपराओं और व्यक्तिगत खान-पान की स्वतंत्रता तक पहुंच गई।

बंगाल की संस्कृति में मछली का विशेष स्थान माना जाता है। ऐसे में किसी धार्मिक पर्व के दौरान मांसाहार को लेकर बाहर से आई सलाह को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक तौर पर बड़ा मुद्दा बन गया।

बंगाल BJP ने ही शास्त्री को दी नसीहत

धीरेंद्र शास्त्री के बयान पर पश्चिम बंगाल बीजेपी अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने पार्टी का रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि किसी बाहरी धार्मिक गुरु को यह तय करने का अधिकार नहीं है कि बंगाल के लोग क्या खाएंगे और क्या पहनेंगे।

उन्होंने कहा कि बंगाली समाज अपनी परंपराओं और जीवनशैली के अनुसार जीता है और उसे बाहर से किसी के निर्देश की जरूरत नहीं है। समिक भट्टाचार्य ने सवाल उठाया कि क्या बंगाली मछली और मांस नहीं खा सकते?

उन्होंने बंगाल की धार्मिक परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य में कई स्थानों पर देवी काली की पूजा से जुड़ी पशु बलि की परंपरा भी रही है। उन्होंने दावा किया कि बंगाल में अष्टमी पर लुची और नवमी के दिन मांस खाने की परंपरा रही है और इसमें किसी बाहरी व्यक्ति के कहने पर बदलाव नहीं किया जा सकता।

हालांकि, समिक भट्टाचार्य ने धीरेंद्र शास्त्री के धार्मिक व्यक्तित्व का सम्मान करने की बात भी कही। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी संत या चिकित्सक को लोगों को शाकाहारी जीवन अपनाने की सलाह देने का अधिकार हो सकता है, लेकिन ऐसी व्यक्तिगत मान्यता को पूरे बंगाली समाज पर लागू नहीं किया जा सकता।

BJP के लिए क्यों असहज हुआ मामला?

धीरेंद्र शास्त्री के पश्चिम बंगाल दौरे को लेकर पहले से राजनीतिक चर्चा रही है। ऐसे में उनके बयान का सीधे बीजेपी की राज्य इकाई की राजनीति से जुड़ना पार्टी के लिए संवेदनशील विषय बन सकता था।

बीजेपी बंगाल में तृणमूल कांग्रेस सरकार के खिलाफ राजनीतिक आधार मजबूत करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में पार्टी के सामने एक तरफ धार्मिक मुद्दों पर अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ बंगाल की स्थानीय संस्कृति और खान-पान की परंपराओं से दूरी न बनने देने की जरूरत है।

यही वजह है कि समिक भट्टाचार्य ने शास्त्री के व्यक्तिगत विचारों और बीजेपी की राजनीतिक स्थिति के बीच अंतर स्पष्ट करने की कोशिश की।

TMC सांसद सौगत राय ने भी साधा निशाना

इस विवाद में तृणमूल कांग्रेस के सांसद सौगत राय भी सामने आए। उन्होंने धीरेंद्र शास्त्री की टिप्पणी पर आपत्ति जताते हुए कहा कि उन्हें बंगालियों की खान-पान की आदतों पर बोलने का अधिकार नहीं है।

सौगत राय ने स्वामी विवेकानंद का उदाहरण देते हुए कहा कि विवेकानंद खुद मांस खाते थे और बंगाल के सबसे प्रमुख संतों में उनकी गिनती होती है। उन्होंने धीरेंद्र शास्त्री की टिप्पणी की आलोचना करते हुए कहा कि बंगाल की अपनी सांस्कृतिक और खान-पान की परंपराएं हैं।

इस तरह इस विवाद में सत्ता पक्ष और बीजेपी की बंगाल इकाई, दोनों की प्रतिक्रिया धीरेंद्र शास्त्री के बयान के खिलाफ दिखाई दी, हालांकि दोनों की राजनीतिक वजहें अलग हो सकती हैं।

कांग्रेस ने भी बोला हमला

कांग्रेस नेता राकेश सिन्हा ने भी धीरेंद्र शास्त्री पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि शास्त्री को सुर्खियों में रहना पसंद है और वह चर्चा में बने रहने के लिए इस तरह के बयान देते हैं।

कांग्रेस नेता ने कहा कि अलग-अलग राज्यों में पूजा और धार्मिक परंपराओं के तरीके अलग होते हैं। उनके मुताबिक बंगाल में मछली खाने की परंपरा गहरी है, इसलिए वहां मांसाहार को पूरी तरह समाप्त करने की बात व्यावहारिक नहीं है।

यह बयान भी कांग्रेस की ओर से इस विवाद को बंगाल की स्थानीय संस्कृति और धार्मिक विविधता के सवाल से जोड़ने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

बंगाल में दुर्गा पूजा और मांसाहार का सवाल

पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां पूजा से जुड़े खान-पान के नियम हर परिवार, समुदाय और परंपरा में एक जैसे नहीं होते।

यही वजह है कि मछली या मांस खाने को लेकर कोई एक नियम पूरे बंगाल के लोगों पर लागू नहीं किया जा सकता। कुछ परिवार धार्मिक अवसरों पर शाकाहारी भोजन करते हैं, जबकि कुछ समुदायों और परिवारों में अलग तरह की परंपराएं देखने को मिलती हैं।

बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष ने इसी विविधता को आधार बनाते हुए कहा कि बंगाली समाज अपने तरीके से जीने और अपनी खान-पान की परंपराओं को बनाए रखने के लिए स्वतंत्र है।

नीले और भगवा नहीं, अब ‘मछली-मांस’ पर सियासत

पश्चिम बंगाल में चुनावी राजनीति के दौरान संस्कृति और पहचान से जुड़े मुद्दे अक्सर राजनीतिक बहस का हिस्सा बनते रहे हैं। इस बार दुर्गा पूजा के दौरान खान-पान का सवाल उसी बहस को नया मोड़ देता दिखाई दे रहा है।

धीरेंद्र शास्त्री की अपील धार्मिक दृष्टिकोण से की गई सलाह थी, लेकिन बंगाल में इसे स्थानीय सांस्कृतिक पहचान के संदर्भ में देखा गया। बीजेपी ने इस मुद्दे पर अपने प्रदेश नेतृत्व के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की है कि पार्टी बंगाल की पारंपरिक जीवनशैली में बाहरी हस्तक्षेप का समर्थन नहीं करती।

दूसरी ओर, TMC और कांग्रेस को बीजेपी पर हमला करने का मौका मिल गया है। विपक्षी दल इस मुद्दे को बंगाली अस्मिता और स्थानीय परंपराओं से जोड़ रहे हैं।

आगे क्या होगा?

फिलहाल यह विवाद किसी सरकारी प्रतिबंध या आधिकारिक आदेश से जुड़ा मामला नहीं है। यह मुख्य रूप से एक धार्मिक अपील और उसके बाद सामने आई राजनीतिक प्रतिक्रियाओं से पैदा हुई बहस है।

लेकिन 2026 की दुर्गा पूजा से पहले इस मुद्दे ने बंगाल की राजनीति में एक दिलचस्प सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—क्या धार्मिक आस्था के नाम पर खान-पान की परंपराओं को बदला जा सकता है, या हर समुदाय को अपनी स्थानीय संस्कृति और व्यक्तिगत पसंद के अनुसार जीने की स्वतंत्रता होनी चाहिए?

समिक भट्टाचार्य का बयान बताता है कि बंगाल बीजेपी फिलहाल इस बहस को धार्मिक बनाम अधार्मिक के बजाय स्थानीय संस्कृति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मुद्दे के रूप में देखना चाहती है। वहीं TMC और कांग्रेस इसे बीजेपी से जुड़े धार्मिक प्रभाव के खिलाफ राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

इस विवाद का चुनावी असर कितना होगा, यह अलग सवाल है, लेकिन दुर्गा पूजा से पहले मछली-मांस को लेकर छिड़ी बहस ने बंगाल की राजनीति में संस्कृति और पहचान के मुद्दे को जरूर फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

© Copyright Galactic Television & Communications Pvt. Ltd. 2026. All rights reserved.