नई दिल्ली: दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के सत्य निकेतन में PG की बहुमंजिला इमारत ढहने की घटना को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकार और संबंधित एजेंसियों को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने कहा कि राजधानी में बार-बार इस तरह की घटनाएं होना गंभीर चिंता का विषय है और सरकार अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकती। कोर्ट ने बचाव अभियान को पूरी गंभीरता और तेजी से चलाने के साथ-साथ इमारत के निर्माण की वैधता और अधिकारियों की भूमिका की उच्चस्तरीय जांच के निर्देश दिए हैं।

मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान हादसे में जान गंवाने वालों के प्रति संवेदना व्यक्त की। अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि करीब 50 युवा छात्र ऐसे आवास में रह रहे थे और हादसे के बाद कुछ लोगों के मलबे में फंसे होने की आशंका थी। कोर्ट ने संबंधित एजेंसियों से राहत एवं बचाव अभियान में किसी तरह की ढिलाई नहीं बरतने को कहा।

सरकार की जिम्मेदारी पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सवाल उठाया कि राजधानी में ऐसी घटनाएं पहले भी सामने आती रही हैं, इसके बावजूद इन्हें रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जा सकी। अदालत ने कहा कि ऐसी त्रासदियां कुछ वर्षों के अंतराल पर दोहराती हैं और इस स्थिति को सामान्य नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि बचाव अभियान प्राथमिकता के साथ चलाया जाए। अदालत का जोर केवल मौजूदा हादसे में राहत कार्य पर नहीं रहा, बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए प्रशासनिक व्यवस्था की समीक्षा पर भी रहा।

MCD से पूछा- इमारत को निर्माण की अनुमति मिली थी या नहीं?

हाईकोर्ट ने नगर निगम दिल्ली यानी MCD को मामले की उच्चस्तरीय जांच करने का निर्देश दिया। अदालत यह जानना चाहती है कि जिस इमारत में हादसा हुआ, उसका निर्माण स्वीकृत नियमों और अनुमतियों के तहत किया गया था या नहीं।

इसके साथ ही MCD को संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने को कहा गया है। यदि जांच में किसी अधिकारी की लापरवाही सामने आती है तो उसके खिलाफ प्रस्तावित कार्रवाई की जानकारी भी अदालत को देने के निर्देश दिए गए हैं।

इससे जांच का दायरा केवल भवन मालिक या निर्माण कार्य तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उन सरकारी अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है जिनकी जिम्मेदारी भवन नियमों के पालन और निरीक्षण से जुड़ी थी।

PG और छात्र आवास की व्यवस्था पर भी सवाल

सत्य निकेतन हादसे ने दिल्ली में छात्रों के लिए सुरक्षित आवास की उपलब्धता को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि विश्वविद्यालयों और सरकारी संस्थानों में पर्याप्त हॉस्टल नहीं होने के कारण बड़ी संख्या में छात्र निजी PG और अन्य किराये के आवासों पर निर्भर हैं।

अदालत ने इस बात पर भी चिंता जताई कि कई जगह भवन को सीमित मंजिलों के लिए अनुमति दी जाती है, लेकिन बाद में कथित तौर पर उससे ज्यादा निर्माण कर दिया जाता है। कोर्ट ने आशंका जताई कि सत्य निकेतन की घटना में भी भवन नियमों के उल्लंघन की भूमिका हो सकती है। हालांकि इसका अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही सामने आएगा।

अदालत ने PG और छात्र आवासों के लिए प्रभावी नियामक व्यवस्था की जरूरत पर भी जोर दिया है।

Structural Safety Audit की मांग

मामला अनिकेत कुमार गुप्ता की ओर से दायर जनहित याचिका (PIL) के जरिए हाईकोर्ट पहुंचा है। याचिका में हादसे में जान गंवाने वालों के परिवारों को 1 करोड़ रुपये मुआवजा देने की मांग की गई है।

इसके अलावा सत्य निकेतन सहित दिल्ली के प्रमुख छात्र आवास क्षेत्रों में चल रहे PG, हॉस्टल और अन्य छात्र आवासों का व्यापक Structural Safety Audit कराने की मांग की गई है। याचिका में इमारत गिरने की स्वतंत्र और विस्तृत जांच की भी मांग की गई है।

याचिकाकर्ता ने भवन मालिक, बिल्डर, ठेकेदार, आर्किटेक्ट, स्ट्रक्चरल इंजीनियर और निर्माण या मरम्मत से जुड़े अन्य लोगों की भूमिका की जांच की मांग की है। साथ ही उन सरकारी अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने की मांग भी की गई है जो भवन सुरक्षा और नियमों के अनुपालन की निगरानी करते हैं।

मरम्मत के काम की भी होगी जांच

PIL में शुरुआती जानकारी के आधार पर दावा किया गया है कि हादसे से पहले इमारत में मरम्मत, नवीनीकरण या निर्माण से संबंधित काम चल रहा था। ऐसे में यह भी जांच का विषय है कि संबंधित कार्य के लिए आवश्यक अनुमति ली गई थी या नहीं।

जांच में भवन का स्वीकृत नक्शा, संरचनात्मक स्थिरता से संबंधित प्रमाणपत्र, अग्नि सुरक्षा मानकों और इमारत को PG या हॉस्टल के तौर पर इस्तेमाल करने की वैधता जैसे पहलुओं को शामिल करने की मांग की गई है।

इन पहलुओं की जांच से यह स्पष्ट करने में मदद मिलेगी कि हादसा केवल संरचनात्मक कमजोरी का नतीजा था या निर्माण और प्रशासनिक स्तर पर नियमों के उल्लंघन ने भी इसमें भूमिका निभाई।

केंद्र, MCD और DU से मांगा जवाब

हाईकोर्ट ने मामले में केंद्र सरकार, MCD और दिल्ली विश्वविद्यालय से जवाब मांगा है। अदालत ने यह जानकारी भी मांगी है कि दिल्ली में ऐसे PG में कितने छात्र रह रहे हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय से पूछा गया है कि हर साल कितने विद्यार्थियों को दाखिला मिलता है और उनमें से कितने छात्रों को विश्वविद्यालय की ओर से हॉस्टल की सुविधा मिल पाती है। इसका उद्देश्य निजी PG पर छात्रों की निर्भरता और सरकारी/विश्वविद्यालयी हॉस्टल की उपलब्धता के बीच अंतर को समझना भी है।

MCD को यह स्पष्ट करने को कहा गया है कि PG और हॉस्टल जैसी संपत्तियों को नियंत्रित करने के लिए दिल्ली में कौन से वैधानिक या प्रशासनिक नियम लागू हैं।

सरकार को बतानी होगी भविष्य की योजना

अदालत ने दिल्ली सरकार से भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए उठाए जाने वाले कदमों की जानकारी देने को कहा है। कोर्ट ने छात्रों के लिए पर्याप्त और सुरक्षित हॉस्टल उपलब्ध कराने की जरूरत पर भी जोर दिया।

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार, MCD और दिल्ली पुलिस की ओर से पक्ष रखते हुए अदालत को बताया कि बचाव अभियान तेजी से चलाया जा रहा है और सभी उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

उन्होंने सोशल मीडिया पर हादसे से जुड़े ऐसे वीडियो प्रसारित होने पर भी चिंता जताई जिनमें घायल या मलबे में फंसे लोगों को दिखाया जा रहा था। उनका कहना था कि ऐसी त्रासदी को सनसनीखेज तरीके से प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए। अदालत ने इस पहलू पर भी उचित निर्देश देने की संभावना जताई।

हादसे में कम से कम छह लोगों की मौत

रिपोर्ट के अनुसार, सत्य निकेतन इमारत हादसे में कम से कम छह लोगों की मौत हुई है। घटना के बाद PG संचालक के खिलाफ FIR दर्ज किए जाने की जानकारी भी सामने आई है।

अब हाईकोर्ट की अगली सुनवाई 25 सितंबर को होगी। तब तक संबंधित सरकारी और नागरिक एजेंसियों को अदालत के निर्देशों के मुताबिक अपने जवाब और रिपोर्ट दाखिल करनी होंगी।

सत्य निकेतन हादसे पर अदालत की सख्ती ने दिल्ली में भवन सुरक्षा, अनधिकृत निर्माण, निजी PG में रहने वाले छात्रों की सुरक्षा और सरकारी निगरानी व्यवस्था को एक साथ सवालों के घेरे में ला दिया है। अब जांच और अदालत के अगले आदेशों से यह स्पष्ट होगा कि इस हादसे के लिए जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होती है और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।