संसद में ‘ब्लैक डे’, PM हाउस के बाहर धरना और हिरासत! 3 दिनों में कैसे बदल गई राजनीति?
संसद की कार्यवाही चलाने पर हर मिनट करीब ढाई लाख रुपये का खर्च आता है, यानी एक घंटे का करीब डेढ़ करोड़ और तय छह घंटे की बैठक का लगभग नौ करोड़ रुपये। ये आंकड़े रिपोर्ट या अनुमानित आँकड़े हैं और स्रोत के अनुसार इनमें अंतर हो सकता है। यह खर्च सांसदों के वेतन-भत्तों, संसद भवन के रखरखाव, सुरक्षा और तकनीकी स्टाफ को मिलाकर निकाला जाता है, और यह तब भी उतना ही होता है जब सदन कानून पास करता है और तब भी जब कार्यवाही कुछ मिनटों में स्थगित हो जाती है।
नई दिल्ली: मानसून सत्र का तीसरा दिन बुधवार को एक बार फिर हंगामे के नाम रहा। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा, मल्लिकार्जुन खड़गे और अखिलेश यादव समेत इंडिया गठबंधन के कई सांसद काले कपड़े पहनकर संसद पहुंचे और इसे ‘ब्लैक डे’ का नाम दिया। विपक्ष का कहना है कि यह नीट-यूजी पेपर लीक और उसके खिलाफ चल रहे छात्र आंदोलन पर सरकार को घेरने तथा प्रदर्शनकारी छात्रों के साथ हुई पुलिस कार्रवाई के विरोध का प्रतीक है। लोकसभा और राज्यसभा, दोनों की कार्यवाही बार-बार बाधित हुई और स्थगित करनी पड़ी।
यह टकराव सत्र के पहले दिन, सोमवार बीस जुलाई से ही बना हुआ है। इसकी पृष्ठभूमि में जंतर-मंतर पर छह जून से चल रहा कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी का आंदोलन है। व्यंग्यात्मक राजनीतिक मंच के रूप में शुरू हुए इस आंदोलन ने नीट-यूजी 2026 पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली में गड़बड़ियों को लेकर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की मांग उठाई है। इसे और बल तब मिला जब आंदोलन में सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी भूख हड़ताल पर बैठे। इसी आंदोलन को बीस जुलाई को दिल्ली में हुई पुलिस कार्रवाई के बाद मामला संसद तक पहुंच गया।
बीस जुलाई: दिल्ली में छात्र आंदोलन और पुलिस कार्रवाई
सीजेपी और छात्र संगठनों के आंदोलन ने बीस जुलाई को बड़ा रूप लिया। विपक्ष का आरोप है कि प्रदर्शनकारी छात्रों के साथ सख्ती बरती गई। सरकार का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्रवाई की गई। इसी घटनाक्रम के अगले दिन विपक्ष सड़क पर उतर आया।
इक्कीस जुलाई: प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरना और हिरासत
मंगलवार, इक्कीस जुलाई की दोपहर करीब साढ़े तीन बजे राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और मल्लिकार्जुन खड़गे कुछ अन्य कांग्रेस नेताओं के साथ पैदल ही प्रधानमंत्री आवास, लोक कल्याण मार्ग की ओर बढ़ गए और वहीं धरने पर बैठ गए। रिपोर्टों के मुताबिक यह योजना गोपनीय तरीके से बनाई गई थी। जल्द ही समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, एनसीपी (शरदचंद्र पवार) सांसद सुप्रिया सुले, कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार और केरल में नेता प्रतिपक्ष वी.डी. सतीशन भी इस प्रदर्शन में शामिल हो गए।
सरकार की ओर से प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह और केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन धरना स्थल पर पहुंचे और राहुल गांधी से प्रदर्शन समाप्त करने का आग्रह किया। जितेंद्र सिंह ने बाद में जारी बयान में कहा कि सरकार नीट और उससे जुड़े मुद्दों पर संसद में चर्चा को तैयार थी, लेकिन राहुल गांधी ने पहले चर्चा की शर्त मानने के बाद शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की नई मांग जोड़ दी, जिससे बातचीत बेनतीजा रही। कांग्रेस का पक्ष इससे अलग है। पार्टी का कहना है कि सरकार ने संसद में चर्चा की अनुमति देने से इनकार किया, इसीलिए नेताओं को प्रधानमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन का रास्ता चुनना पड़ा।
बातचीत विफल रहने के बाद दिल्ली पुलिस ने शाम को राहुल गांधी और प्रियंका गांधी समेत कई नेताओं को बलपूर्वक उठाकर हिरासत में ले लिया। रिपोर्टों के मुताबिक राहुल गांधी को हिरासत में लेते समय उनको मामूली चोट आई। हिरासत में लिए गए नेताओं को अलग-अलग स्थानों पर रखा गया, राहुल गांधी को मॉडल टाउन के छत्रसाल स्टेडियम, जबकि प्रियंका गांधी और कुछ अन्य सांसदों को मंदिर मार्ग थाने ले जाया गया। कुछ घंटों बाद सभी को रिहा कर दिया गया। कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी थाने पहुंचकर प्रियंका और हिरासत में लिए गए सांसदों से मिलीं।
हिरासत में लिए जाते समय प्रियंका गांधी ने कहा कि वे डरपोक हैं, वे डरे हुए हैं, हम उनसे नहीं डरते। रात को राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो पोस्ट करते हुए प्रधानमंत्री मोदी को देश के इतिहास का सबसे युवा-विरोधी प्रधानमंत्री बताया और प्रधानमंत्री तथा गृह मंत्री, दोनों से इस्तीफे की मांग दोहराई। इससे पहले राहुल और प्रियंका घायल छात्रों से मिलने अस्पताल भी पहुंचे थे।
संसद में आज क्या हुआ?
बुधवार को काले कपड़ों में सांसद संसद परिसर पहुंचे। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और तृणमूल समेत इंडिया गठबंधन के नेताओं ने मकर द्वार के बाहर नारेबाजी की और पुलिस कार्रवाई को ‘अघोषित आपातकाल’ बताया। राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने छात्रों के मुद्दे पर चर्चा की मांग उठाई। कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी, केसी वेणुगोपाल और सैयद नासिर हुसैन समेत कई विपक्षी सांसदों ने अलग-अलग नोटिस देकर तत्काल चर्चा की मांग की। रेणुका चौधरी ने नियम 267 के तहत स्थगन प्रस्ताव देते हुए यह भी आरोप लगाया कि संसद के कई द्वार सील किए गए और प्रदर्शन के दौरान इंटरनेट सेवाएं बाधित रहीं।
जैसे ही दोनों सदनों की कार्यवाही शुरू हुई, हंगामा भी शुरू हो गया। कार्यवाही कई बार स्थगित करनी पड़ी। पीठासीन अधिकारियों ने सदस्यों से मर्यादा बनाए रखने और बैनर, पोस्टर व काला कपड़ा न लाने की अपील की, लेकिन विरोध थमता नहीं दिखा। राज्यसभा में उपसभापति हरिवंश और लोकसभा में पीठासीन अधिकारियों की बार-बार अपील के बावजूद गतिरोध जारी रहा।
सरकार की ओर से संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि सरकार नीट पेपर लीक के मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है और इसके लिए एक व्यवस्थित प्रक्रिया मौजूद है। भाजपा की ओर से यह भी कहा गया कि सरकार ने छात्रों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए तुरंत कदम उठाए हैं। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की, जिसे सरकार की ओर से सदन में विस्तृत चर्चा की तैयारी के संकेत के रूप में देखा गया।
लेकिन विपक्ष की मांग सिर्फ चर्चा तक सीमित नहीं रही। कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल समेत कई नेताओं ने शिक्षा मंत्री की जवाबदेही तय करने और उनके इस्तीफे की मांग उठाई। विपक्ष का तर्क है कि जब लाखों छात्रों के भविष्य पर सवाल हों, तो सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि राजनीतिक जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
लगातार हंगामे का सीधा असर सरकार के विधायी एजेंडे पर पड़ा है। सरकार सत्र में कई विधेयक लाने की तैयारी में है, लेकिन बार-बार के स्थगन के कारण सदन का कामकाज अपेक्षित रूप से आगे नहीं बढ़ सका।
दो नैरेटिव, आमने-सामने
अब यह लड़ाई केवल एक परीक्षा, एक पेपर लीक या एक मंत्री तक सीमित नहीं रह गई है। एक तरफ विपक्ष यह संदेश देना चाहता है कि वह युवाओं और छात्रों की आवाज बनकर खड़ा है और सरकार को सीधे जवाबदेह ठहराना चाहता है। दूसरी तरफ सरकार का कहना है कि कार्रवाई शुरू हो चुकी है, जांच एजेंसियां काम कर रही हैं, सुधारों पर चर्चा हो रही है, और वह संसद में हर मुद्दे पर चर्चा को तैयार है, लेकिन लगातार हंगामे के कारण सदन चल नहीं पा रहा।
संसद ठप होने की आर्थिक कीमत
जब संसद बार-बार बाधित होती है, तो उसका असर सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रहता, आर्थिक असर भी पड़ता है। विभिन्न संसदीय व्यय अनुमानों के मुताबिक संसद की कार्यवाही चलाने पर हर मिनट करीब ढाई लाख रुपये का खर्च आता है, यानी एक घंटे का करीब डेढ़ करोड़ और तय छह घंटे की बैठक का लगभग नौ करोड़ रुपये। ये आंकड़े रिपोर्ट या अनुमानित आँकड़े हैं और स्रोत के अनुसार इनमें अंतर हो सकता है। यह खर्च सांसदों के वेतन-भत्तों, संसद भवन के रखरखाव, सुरक्षा और तकनीकी स्टाफ को मिलाकर निकाला जाता है, और यह तब भी उतना ही होता है जब सदन कानून पास करता है और तब भी जब कार्यवाही कुछ मिनटों में स्थगित हो जाती है।
एक अनुमान के मुताबिक बीते एक दशक में हंगामों और स्थगनों की वजह से देश को करीब साढ़े तीन हजार करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है, यह भी एक अनुमानित आँकड़ा है। तीन दिनों में बर्बाद हुए घंटों का अनुमानित नुकसान करोड़ों रुपये में बैठता है, और इस दौरान न नीट पेपर लीक जैसे अहम मुद्दे पर कोई ठोस चर्चा हो पाई, न जनहित के अन्य विधेयक आगे बढ़ सके।
यहां निष्पक्ष रहकर यह समझना भी ज़रूरी है कि इस नुकसान की ज़िम्मेदारी किसी एक पक्ष की नहीं होती। विपक्ष का तर्क है कि जब सरकार गंभीर मुद्दे पर तुरंत खुली चर्चा से बचती है, तो हंगामा और वॉकआउट विरोध का आखिरी औज़ार बन जाता है। सरकार का तर्क है कि हर बात पर सदन ठप करना बहस से भागने जैसा है। लेकिन आंकड़े साफ बताते हैं कि इस टकराव की कीमत अंततः उसी आम करदाता को चुकानी पड़ती है, जिसके पैसे से संसद का हर मिनट चलता है।
अब आगे क्या?
मानसून सत्र इक्कीस अगस्त तक चलना है। फिलहाल संसद के भीतर गतिरोध और संसद के बाहर सड़क पर टकराव, दोनों जारी हैं। सबसे बड़ा सवाल वही है, अगर देश की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक संस्था में संवाद नहीं होगा, तो लाखों छात्रों और युवाओं के सवालों का समाधान आखिर कैसे और कब निकलेगा।