देशभर में रंगों की धूम: अलग-अलग राज्यों में अनोखे अंदाज़ में मनाई जा रही है होली...

By  Preeti Kamal March 4th 2026 10:30 AM -- Updated: March 4th 2026 10:53 AM

GTC Bharat: भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, परंपरा और आध्यात्मिक विश्वास का प्रतीक है। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व सर्दियों की विदाई और वसंत ऋतु के आगमन का संदेश भी देता है। गांव से लेकर महानगर तक, हर जगह होली का रंग अलग अंदाज़ में दिखाई देता है, लेकिन उत्साह समान रहता है।

देशभर में होली का पर्व पारंपरिक उत्साह और सांस्कृतिक विविधता के साथ मनाया जा रहा है।  कहीं, लठमार होली की धूम है, तो कहीं बसंत उत्सव की रंगीन छटा देखने को मिल रही है। अलग-अलग राज्यों में होली के अनूठे रूप भारत की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाते हैं।

उत्तर प्रदेश में ब्रज, मथुरा और वृंदावन की प्रसिद्ध होली

उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र, मथुरा, वृंदावन और बरसाने में होली का उत्सव कई दिनों तक चलता है। बरसाने की लठमार होली और वृंदावन की फूलों वाली होली देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करती है। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।


पंजाब में होली है 'शौर्य' का प्रतीक

पंजाब के आनंदपुर साहिब में होली के अवसर पर ‘होला मोहल्ला’ का आयोजन विशेष उत्साह और गरिमा के साथ किया जाता है। यह पर्व सिख परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है और रंगों की होली से अलग शौर्य, अनुशासन और सामुदायिक एकता का प्रतीक माना जाता है। 'होला मोहल्ला' की शुरुआत दसवें सिख गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी ने की थी। इसका उद्देश्य सिखों को युद्धकला और आत्मरक्षा के लिए तैयार करना था।


पश्चिम बंगाल में रवींद्रनाथ टैगोर ने होली पर शुरू की थी 'एक परंपरा'

पूर्वी भारत में पश्चिम बंगाल में होली को ‘डोल उत्सव’ और ‘बसंत उत्सव’ के रूप में मनाया जाता है। विश्व-भारती विश्वविद्यालय में रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिनकी परंपरा की शुरुआत रवींद्रनाथ टैगोर ने की थी।

यहाँ यह त्योहार रंगों के साथ-साथ संस्कृति, संगीत और भक्ति से भी जुड़ा होता है। शांतिनिकेतन में बसंत उत्सव विशेष रूप से प्रसिद्ध है। छात्र-छात्राएँ पीले (बसंती) वस्त्र पहनकर गीत-नृत्य प्रस्तुत करते हैं। टैगोर की रचनाओं पर आधारित सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं।


बिहार और झारखंड में होली जीवन की जीवंत अभिव्यक्ति है होली

बिहार और झारखंड में होली को पारंपरिक रूप से ‘फगुआ’ कहा जाता है। यह केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति और ग्रामीण जीवन की जीवंत अभिव्यक्ति है। फगुआ के दौरान गांव-शहरों में ढोलक, मंजीरा और झाल की थाप पर पारंपरिक फगुआ गीत गाए जाते हैं। लोग एक-दूसरे के घर जाकर अबीर-गुलाल लगाते हैं और गले मिलकर शुभकामनाएं देते हैं।

कई स्थानों पर लोकनृत्य और सामूहिक गायन की परंपरा आज भी कायम है। इस अवसर पर गुजिया, पूआ, दही-बड़ा और ठंडाई जैसे पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। ग्रामीण इलाकों में फगुआ का उत्साह कई दिनों तक देखने को मिलता है, जहां यह पर्व सामाजिक एकता, आपसी प्रेम और मेल-मिलाप का प्रतीक बन जाता है।


महाराष्ट्र में नकारात्मकता को दूर कर सकारात्मकता का स्वागत है होली 

पश्चिम भारत के महाराष्ट्र में होली के बाद आने वाली ‘रंग पंचमी’ का विशेष महत्व है। धुलेंडी के पांचवें दिन मनाया जाने वाला यह उत्सव खास तौर पर इंदौर और मालवा क्षेत्र से प्रभावित परंपराओं के साथ राज्य के कई शहरों में उत्साह से मनाया जाता है। इस दिन लोग एक-दूसरे पर सूखे और गीले रंग डालते हैं, गुलाल उड़ाते हैं और सामूहिक जुलूस निकालते हैं।

कई स्थानों पर डीजे, ढोल-ताशों और पारंपरिक नृत्य के साथ रंगों की बारिश की जाती है। मान्यता है कि रंग पंचमी नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर सकारात्मकता और खुशहाली लाने का प्रतीक है। यही कारण है कि महाराष्ट्र में यह दिन सामाजिक मेल-मिलाप और उत्साह का खास अवसर माना जाता है।


गुजरात में लोकनृत्य व संगीत से मनाया जाता है होली का जश्न

गुजरात में होली के अगले दिन ‘धुलेटी’ के रूप में रंगों का त्योहार बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन लोग एक-दूसरे को गुलाल और रंग लगाकर शुभकामनाएं देते हैं और पारंपरिक लोकनृत्य व संगीत के साथ जश्न मनाते हैं। 

अहमदाबाद, सूरत और वडोदरा जैसे शहरों में सामूहिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है, जहां युवा वर्ग खास तौर पर रंगों और पानी की फुहारों के बीच त्योहार का आनंद लेते हैं। कई जगहों पर मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना भी की जाती है। धुलेटी का यह पर्व सामाजिक एकता और आपसी भाईचारे का प्रतीक माना जाता है, जहां लोग पुराने मतभेद भुलाकर नए सिरे से रिश्तों की शुरुआत करते हैं।


उत्तराखंड में होली मनाने का अंदाज़ ही निराला है

उत्तराखंड में होली का उत्सव अपने अनूठे और शास्त्रीय रंग के लिए जाना जाता है। यहां ‘खड़ी होली’ और ‘बैठकी होली’ की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है, जो खासकर कुमाऊं क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान मानी जाती है।

‘खड़ी होली’ में लोग पारंपरिक वेशभूषा पहनकर खुले स्थानों या मंदिर प्रांगण में गोल घेरा बनाकर खड़े होकर होली गीत गाते हैं। ढोलक और मंजीरे की थाप पर समूह गायन किया जाता है। इसमें लोकधुनों के साथ शास्त्रीय रागों की झलक भी मिलती है।


उत्तराखंड में 'बैठकी होली' अपेक्षाकृत गंभीर और शास्त्रीय शैली में गाई जाती है। इसमें गायक बैठकर राग-रागिनियों पर आधारित होली गीत प्रस्तुत करते हैं। यह परंपरा संगीत प्रेमियों के बीच खास महत्व रखती है और कई बार घरों या सामुदायिक स्थलों पर आयोजित की जाती है। उत्तराखंड की यह होली रंगों के साथ-साथ सुरों की भी होली मानी जाती है, जहां उत्सव में भक्ति, संगीत और सांस्कृतिक विरासत का सुंदर संगम देखने को मिलता है।


राजस्थान में शाही परंपराएं और शोभायात्राएं होती हैं होली की पहचान

राजस्थान में होली का उत्सव शाही परंपराओं और भव्य शोभायात्राओं के लिए खास पहचान रखता है। यहां कई शहरों में राजघरानों और स्थानीय प्रशासन की ओर से पारंपरिक अंदाज़ में जुलूस निकाले जाते हैं, जो पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनते हैं।

दिलों को जोड़ने वाले रंगों का उत्सव

आज के समय में लोग प्राकृतिक रंगों का उपयोग कर पर्यावरण-अनुकूल होली मनाने पर जोर दे रहे हैं। पानी की बचत और सुरक्षित तरीके से त्योहार मनाने की अपील भी की जाती है। होली का यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन में प्रेम, विश्वास और सकारात्मकता ही सबसे बड़ा रंग है।

प्रशासन ने की शांतिपूर्ण होली मनाने की अपील

पर्व के मद्देनज़र विभिन्न राज्यों में सुरक्षा के व्यापक इंतज़ाम किए गए हैं। प्रशासन ने लोगों से शांतिपूर्ण और पर्यावरण अनुकूल होली मनाने की अपील की है। रंगों का यह पर्व एक बार फिर देश की विविधता में एकता की मिसाल पेश कर रहा है, जहां अलग-अलग परंपराओं के बावजूद उत्सव का मूल संदेश प्रेम और भाईचारा ही है।

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