Neha Bora Case: दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला रखा सुरक्षित, 10 हजार रुपये के Peace Bond नोटिस पर कल शाम 6 बजे आएगा निर्णय
AISA अध्यक्ष नेहा बोरा की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। मामला दिल्ली पुलिस के 10,000 रुपये के Peace Bond नोटिस से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने नोटिस की वैधता पर सवाल उठाए, जबकि पुलिस ने कथित उल्लंघनों का हवाला देकर अपनी कार्रवाई का बचाव किया।
नई दिल्ली: ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा से जुड़े मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अदालत ने कहा है कि वह शुक्रवार शाम 6 बजे अपना निर्णय सुनाएगी। यह मामला दिल्ली पुलिस की ओर से जारी उस नोटिस को चुनौती देने से जुड़ा है, जिसमें नेहा बोरा को जांच के दौरान शांति बनाए रखने के लिए 10,000 रुपये का व्यक्तिगत बॉन्ड और एक जमानतदार प्रस्तुत करने को कहा गया था।
नेहा बोरा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर इस नोटिस और इसके आधार पर होने वाली कार्रवाई को रद्द करने की मांग की है। सुनवाई के दौरान उनकी ओर से पेश वकील ने नोटिस जारी करने की प्रक्रिया और उसकी कानूनी वैधता पर सवाल उठाए। वहीं, दिल्ली पुलिस की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा ने कार्रवाई का बचाव करते हुए कथित उल्लंघनों और शांति व्यवस्था से जुड़े पहलुओं का उल्लेख किया।
दोनों पक्षों के बीच ढाई घंटे से अधिक समय तक बहस हुई। सुनवाई में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, पुलिस की निवारक कार्रवाई और मजिस्ट्रेट की प्रक्रिया से जुड़े कई महत्वपूर्ण कानूनी सवाल उठे।
क्या है नेहा बोरा से जुड़ा पूरा मामला?
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, नेहा बोरा ने 16 अक्टूबर को मंडी हाउस में आयोजित ‘लहरा दो तिरंगा’ प्रदर्शन में हिस्सा लिया था। इसके बाद जांच के दौरान शांति बनाए रखने के लिए उन्हें नोटिस जारी किया गया। 17 अक्टूबर को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की ओर से जारी नोटिस में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 और 130 तथा धारा 135(3) का उल्लेख किया गया था।
नोटिस के अनुसार, नेहा बोरा को 10,000 रुपये का व्यक्तिगत बॉन्ड भरने और एक जमानतदार उपलब्ध कराने के लिए कहा गया। इस कार्रवाई का उद्देश्य जांच के दौरान शांति बनाए रखने से संबंधित था।
नेहा बोरा ने अदालत में इस कदम को चुनौती देते हुए कहा कि उनके खिलाफ जारी नोटिस कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है। उन्होंने अदालत से इसे रद्द करने के साथ संबंधित अधिकारियों को इसके आधार पर आगे की कार्रवाई नहीं करने का निर्देश देने की मांग की है।
नेहा बोरा के वकील ने क्या दलील दी?
नेहा बोरा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत में कहा कि 16 अक्टूबर को आयोजित प्रदर्शन शांतिपूर्ण था और उनकी मुवक्किल ने हिंसा के लिए कोई आह्वान नहीं किया था। उन्होंने दलील दी कि नेहा बोरा को मंडी हाउस पहुंचने के लगभग 10 से 15 मिनट के भीतर हिरासत में ले लिया गया था।
वकील के मुताबिक, हिरासत में लिए जाने के समय नेहा बोरा पर शांति भंग करने से संबंधित कोई आरोप नहीं लगाया गया था। उन्होंने हिरासत की वैधता पर सवाल उठाते हुए यह भी कहा कि नेहा को तत्काल अपने परिवार या वकीलों से बात करने की अनुमति नहीं दी गई।
बचाव पक्ष ने यह दलील भी दी कि नेहा बोरा उस दूसरे विरोध प्रदर्शन का हिस्सा नहीं थीं, जिसका आयोजन एक अन्य संगठन की ओर से सेंट्रल पार्क में तिरंगा फहराने के लिए किया गया था। वकील ने कहा कि दोनों प्रदर्शनों को एक ही संदर्भ में देखना उचित नहीं होगा।
उनकी ओर से यह भी सवाल उठाया गया कि जिस स्थान से नेहा बोरा को हिरासत में लिया गया, वहां भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 लागू होने की स्थिति स्पष्ट नहीं थी। बचाव पक्ष के अनुसार, मौके पर लाउडस्पीकर से इस धारा के लागू होने की घोषणा की जा रही थी, लेकिन इसकी वैधानिक स्थिति को लेकर सवाल मौजूद थे।
Peace Bond नोटिस की प्रक्रिया पर अदालत में सवाल
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने नोटिस जारी करने की प्रक्रिया को चुनौती देते हुए कहा कि व्यक्तिगत बॉन्ड भरने की मांग करने से पहले कानून के अनुसार आवश्यक प्रारंभिक जांच और प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए था।
वकील ने दलील दी कि नोटिस में कानून की निर्धारित शर्तों का पर्याप्त पालन नहीं किया गया और कार्रवाई यांत्रिक तरीके से की गई। उनके अनुसार, संबंधित व्यक्ति को कारण बताने का अवसर देने से पहले प्रक्रिया के आधार और उपलब्ध जानकारी की उचित जांच जरूरी है।
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि नोटिस जारी करने वाले अधिकारी की भूमिका और अधिकारों की कानूनी समीक्षा होनी चाहिए। अदालत के सामने मुख्य प्रश्न यह था कि निवारक कार्रवाई शुरू करने के लिए मजिस्ट्रेट को किस तरह की जानकारी पर भरोसा करना चाहिए और क्या उसे उस जानकारी की विश्वसनीयता के संबंध में स्वतंत्र रूप से संतुष्ट होना आवश्यक है।
कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जांच प्रक्रिया पर क्या पूछा?
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने पुलिस की ओर से पेश दलीलों के संदर्भ में कई सवाल उठाए। अदालत ने यह जानना चाहा कि यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ मिली जानकारी के आधार पर नोटिस जारी किया जाता है, तो क्या मजिस्ट्रेट को पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जानकारी विश्वसनीय है और संबंधित व्यक्ति के मामले से जुड़ी है।
अदालत ने यह सवाल भी किया कि जांच के दौरान और कारण बताओ नोटिस पर सुनवाई के समय संबंधित व्यक्ति को अपने बचाव में दस्तावेज पेश करने का पर्याप्त अवसर मिलता है या नहीं।
सुनवाई में संविधान के अनुच्छेद 21 का भी उल्लेख हुआ। यह अनुच्छेद जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षण से संबंधित है। अदालत ने इस संदर्भ में प्रक्रिया की निष्पक्षता और निवारक कार्रवाई के दौरान व्यक्ति के अधिकारों से जुड़े पहलुओं पर विचार किया।
यह सवाल महत्वपूर्ण है क्योंकि निवारक कार्रवाई का उद्देश्य संभावित रूप से शांति भंग होने की आशंका को रोकना होता है, लेकिन ऐसी कार्रवाई भी कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही की जानी चाहिए।
दिल्ली पुलिस ने अदालत में क्या कहा?
दिल्ली पुलिस की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि नेहा बोरा ने कथित तौर पर एक के बाद एक 12 उल्लंघन किए हैं और मजिस्ट्रेट ने मामले की जांच शुरू की है। उन्होंने दलील दी कि BNSS की धारा 126 और धारा 130 को शांति बनाए रखने से संबंधित कार्रवाई के संदर्भ में साथ पढ़ा जाना चाहिए।
एएसजी ने नेहा बोरा के एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए गए बयान का भी उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने राजनीतिक बदलाव को लेकर अपनी बात रखी थी। पुलिस की ओर से उनके बयानों, विरोध प्रदर्शन की परिस्थितियों और मौके पर लागू प्रतिबंधों से संबंधित तथ्यों का हवाला दिया गया।
एएसजी ने यह भी कहा कि संबंधित स्थान पर धारा 163 लागू थी और वहां बैरिकेडिंग की गई थी। उन्होंने नेहा बोरा के इस तर्क पर भी आपत्ति जताई कि वह दूसरे संगठन के प्रदर्शन से अलग थीं। पुलिस पक्ष ने मामले से जुड़े अन्य रिकॉर्ड और एफआईआर का उल्लेख करते हुए अपनी कार्रवाई को उचित ठहराने की कोशिश की।
हालांकि, ये दोनों पक्षों की अदालत में पेश की गई दलीलें हैं। इन आरोपों और तर्कों पर अंतिम निष्कर्ष अदालत के निर्णय से ही स्पष्ट होगा।
अब फैसले पर टिकी सभी की नजर
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। अदालत ने शुक्रवार शाम 6 बजे निर्णय सुनाने की बात कही है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अदालत नेहा बोरा की याचिका स्वीकार करती है, नोटिस को बरकरार रखती है या मामले में कोई अन्य निर्देश जारी करती है।
इस मामले का परिणाम केवल नेहा बोरा की याचिका तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि निवारक कार्रवाई, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और शांति बनाए रखने के लिए जारी किए जाने वाले नोटिस की प्रक्रिया पर भी महत्वपूर्ण कानूनी सवालों को स्पष्ट कर सकता है।
फिलहाल, अदालत का अंतिम आदेश आने तक किसी भी पक्ष की दलील को अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।