पटना: बिहार विधान परिषद की आठ सीटों के लिए होने वाला चुनाव सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA), विपक्षी महागठबंधन और प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी के लिए अहम राजनीतिक परीक्षा बन गया है। बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में हार के बाद एनडीए के सामने इन चुनावों के जरिए अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने का अवसर है। दूसरी ओर, जन सुराज सभी आठ सीटों पर उम्मीदवार उतारकर अपनी चुनावी ताकत का प्रदर्शन करना चाहती है।
विपक्षी दलों के बीच अलग-अलग उम्मीदवारों को समर्थन देने की रणनीति के कारण मुकाबला कई सीटों पर त्रिकोणीय हो सकता है। एनडीए को उम्मीद है कि विपक्ष के बंटे हुए वोटों का लाभ उसे मिलेगा। हालांकि, पटना ग्रेजुएट निर्वाचन क्षेत्र में जनता दल यूनाइटेड (JDU) के भीतर सामने आई असहमति गठबंधन की राह मुश्किल बना सकती है।
आठ सीटों पर किसकी नजर?
इन चुनावों में चार स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों और चार शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की सीटें शामिल हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, एनडीए के पास फिलहाल कोसी ग्रेजुएट्स, पटना ग्रेजुएट्स और पटना टीचर्स जैसी तीन सीटें हैं। वहीं, तिरहुत ग्रेजुएट्स, दरभंगा ग्रेजुएट्स और सारण टीचर्स सीटों पर निर्दलीय प्रतिनिधियों का कब्जा बताया गया है। तिरहुत टीचर्स सीट सीपीआई और दरभंगा टीचर्स सीट कांग्रेस के पास है।
इन आठ सीटों के लिए 30 जिलों में पांच लाख से अधिक मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। चुनाव में करीब 150 उम्मीदवारों के मैदान में होने से मुकाबला व्यापक हो गया है। स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के मतदाताओं की प्राथमिकताएं सामान्य विधानसभा चुनावों से अलग हो सकती हैं। इसलिए उम्मीदवारों के व्यक्तिगत संपर्क, स्थानीय मुद्दे और शिक्षा से जुड़े सवाल परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं।
हालांकि, इन सीटों के परिणामों से विधान परिषद में एनडीए के कुल बहुमत पर तत्काल बड़ा असर पड़ने की संभावना सीमित बताई जा रही है। इसके बावजूद चुनाव के नतीजे यह संकेत दे सकते हैं कि शिक्षित मतदाताओं, शिक्षकों और वेतनभोगी पेशेवरों के बीच किस दल या उम्मीदवार की पकड़ मजबूत है।
पटना ग्रेजुएट सीट पर JDU की मुश्किल
एनडीए के लिए सबसे बड़ी चुनौती पटना ग्रेजुएट निर्वाचन क्षेत्र में दिखाई दे रही है। यहां जेडीयू के मौजूदा उम्मीदवार नीरज कुमार को अपनी ही पार्टी के मोकामा विधायक अनंत कुमार सिंह के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। दी गई जानकारी के मुताबिक, अनंत कुमार सिंह जन सुराज के उम्मीदवार अनुज सिंह का समर्थन कर रहे हैं।
यह स्थिति जेडीयू के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि पार्टी के भीतर मतभेद का असर समर्थकों और स्थानीय चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है। यदि असहमति मतदान के दौरान प्रभाव डालती है, तो एनडीए को इस सीट पर अपेक्षित बढ़त हासिल करने में कठिनाई हो सकती है। हालांकि, इसका वास्तविक असर चुनाव परिणाम आने के बाद ही स्पष्ट होगा।
महागठबंधन ने अलग-अलग उम्मीदवारों का किया समर्थन
विपक्षी महागठबंधन ने सभी सीटों पर संयुक्त उम्मीदवार उतारने के बजाय अलग-अलग प्रत्याशियों को समर्थन देने का रास्ता अपनाया है। आरजेडी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुबोध कुमार मेहता के अनुसार, विधान परिषद चुनावों का सामाजिक और राजनीतिक दायरा विधानसभा तथा लोकसभा चुनावों से अलग होता है। पार्टी का मानना है कि अलग-अलग उम्मीदवार होने से मतदाताओं को अधिक विकल्प मिलते हैं।
कांग्रेस ने भी इस रणनीति के समर्थन में कहा है कि विधान परिषद के ऐसे चुनावों में उम्मीदवारों को समर्थन देने की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। राज्य कांग्रेस के मीडिया प्रभारी असित नाथ तिवारी के मुताबिक, पिछले परिषद चुनावों में भी दलों के बीच औपचारिक गठबंधन की व्यवस्था नहीं थी और पार्टी ने योग्य उम्मीदवारों का समर्थन किया था।
हालांकि, विपक्ष की यह रणनीति कुछ सीटों पर अलग-अलग दलों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ा सकती है। इसका फायदा एनडीए को मिलता है या मतदाता किसी खास उम्मीदवार के पक्ष में एकजुट होते हैं, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।
NDA को जीत का भरोसा, जन सुराज को बड़े प्रदर्शन की उम्मीद
जेडीयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद ने दावा किया है कि सत्ताधारी गठबंधन सभी आठ सीटें जीतने की स्थिति में है। उन्होंने महागठबंधन के बंटे होने का हवाला देते हुए कहा कि विपक्ष से उन्हें बड़ी चुनौती नहीं दिख रही है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी इस चुनाव में प्रभावी चुनौती नहीं है।
बीजेपी के राज्य मीडिया प्रभारी दानिश इकबाल ने भी एनडीए की संभावनाओं को लेकर भरोसा जताया। उन्होंने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा शिक्षा क्षेत्र, शिक्षकों, स्कूलों और विश्वविद्यालयों के कल्याण के लिए उठाए गए कदमों का उल्लेख किया। उनके अनुसार, जन सुराज के राजनीतिक बदलाव और सुशासन संबंधी दावों पर सवाल हैं।
दूसरी ओर, जन सुराज पार्टी चुनाव को अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ाने के अवसर के रूप में देख रही है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मनोज भारती ने कहा कि पार्टी के मैदान में उतरने से राजनीतिक दलों का उसके प्रति रवैया बदला है। उन्होंने चार से पांच सीटें जीतने की संभावना भी जताई, हालांकि उन्होंने माना कि चुनाव में किसी नतीजे की गारंटी नहीं दी जा सकती।
बिहार की राजनीति के लिए क्यों अहम हैं ये चुनाव?
एमएलसी चुनाव भले ही विधानसभा चुनावों जितना व्यापक जनादेश न देते हों, लेकिन इनके नतीजे राजनीतिक दलों के संगठन, स्थानीय प्रभाव और शिक्षित मतदाताओं के बीच समर्थन का संकेत दे सकते हैं। एनडीए के लिए यह अपनी पकड़ मजबूत करने का मौका है, जबकि महागठबंधन के लिए सरकार के खिलाफ असंतोष को चुनावी समर्थन में बदलना चुनौती होगी।
जन सुराज के लिए इन आठ सीटों पर मुकाबला अपनी राजनीतिक मौजूदगी साबित करने की परीक्षा है। वहीं, पटना ग्रेजुएट सीट पर जेडीयू की अंदरूनी खींचतान परिणामों को और दिलचस्प बना सकती है। अब सभी की नजर मतदान और मतगणना के नतीजों पर है, जो बिहार की राजनीति में इन दलों की वास्तविक स्थिति का आकलन करने में मदद करेंगे।
Add GTC Bharat on Google