नई दिल्ली:  राजधानी दिल्ली में बढ़ते ट्रैफिक जाम और सड़कों पर ई-रिक्शा की भीड़ को नियंत्रित करने के लिए सरकार इन वाहनों की संख्या सीमित करने की तैयारी कर रही है। प्रस्तावित नीति के तहत दिल्ली में ई-रिक्शा की अधिकतम संख्या 2.5 लाख तय करने की योजना है, जबकि मौजूदा अनुमान के अनुसार राजधानी में 4.5 लाख से 5 लाख तक ई-रिक्शा चल रहे हैं। हालांकि, विशेषज्ञों और ई-रिक्शा संगठनों का मानना है कि केवल वाहनों की संख्या घटाने से यातायात की समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। इससे हजारों चालकों की आजीविका पर भी असर पड़ सकता है।

सरकार ने प्रस्तावित नीति पर आम लोगों से 30 दिनों के भीतर सुझाव मांगे हैं। इसका उद्देश्य सड़क सुरक्षा को बेहतर बनाना, यातायात को व्यवस्थित करना और ई-रिक्शा के संचालन के लिए स्पष्ट नियम लागू करना है। मसौदे में डिजिटल ई-रिक्शा अनुपालन प्रमाणपत्र (ECC) को अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव भी शामिल है।

क्या केवल संख्या घटाने से कम होगा जाम?

ई-रिक्शा यूनियनों और इलेक्ट्रिक वाहन विशेषज्ञों का कहना है कि दिल्ली में इन वाहनों का वितरण समान नहीं है। कुछ प्रमुख सड़कों और बाजारों में इनकी संख्या जरूरत से ज्यादा दिखाई देती है, जबकि कई इलाकों में यात्रियों को छोटी दूरी तय करने के लिए पर्याप्त ई-रिक्शा नहीं मिलते। ऐसे में विशेषज्ञों का सुझाव है कि सरकार को वाहनों की कुल संख्या सीमित करने के साथ-साथ उनके संचालन के लिए क्षेत्रवार व्यवस्था भी बनानी चाहिए।

इलेक्ट्रिक वाहन विशेषज्ञ दिनेश गोयल के मुताबिक, ई-रिक्शा कम लागत में रोजगार उपलब्ध कराने का एक माध्यम है। लगभग 1.5 लाख रुपये की कीमत वाले इन वाहनों के जरिए कई लोग अपनी आजीविका चला रहे हैं। यदि संख्या सीमित कर दी जाती है, तो कुछ चालकों को काम छोड़ना पड़ सकता है या अधिक महंगे व्यावसायिक वाहन खरीदने की जरूरत पड़ सकती है।

गोयल का सुझाव है कि सरकार यह निर्धारित कर सकती है कि किन सड़कों पर कितने ई-रिक्शा चलेंगे। इससे भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में दबाव कम किया जा सकता है और उन इलाकों में बेहतर सेवा उपलब्ध कराई जा सकती है, जहां इसकी अधिक आवश्यकता है। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि जब निजी कारों और दूसरे वाहनों की संख्या बढ़ रही है, तो केवल ई-रिक्शा पर सीमा लगाने से जाम की समस्या किस हद तक हल होगी।

चालकों की रोजी-रोटी पर क्या होगा असर?

ई-रिक्शा व्हीकल्स फेडरेशन के अध्यक्ष और सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की ई-रिक्शा समिति के पूर्व अध्यक्ष अनुज शर्मा ने प्रस्तावित नीति को लेकर रोजगार पर पड़ने वाले प्रभाव की चिंता जताई है। उनका कहना है कि संख्या सीमित करने से पहले सरकार को उन चालकों के लिए वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था पर विचार करना चाहिए, जिनकी कमाई प्रभावित हो सकती है।

शर्मा के अनुसार, सरकार को परिवहन विभाग के अधिकारियों के स्तर पर ही नीति तैयार करने के बजाय चालकों, वाहन मालिकों और संबंधित संगठनों से बातचीत करनी चाहिए। संगठन सरकार के सामने अपनी मांगें रखने की तैयारी कर रहा है, ताकि नियम लागू होने की स्थिति में प्रभावित लोगों के हितों की रक्षा की जा सके।

उन्होंने प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया को पारदर्शी रखने की जरूरत पर भी जोर दिया। उनका आशंका है कि यदि पात्रता और प्रमाणपत्र आवंटन के स्पष्ट मानदंड नहीं बनाए गए, तो पक्षपात या भ्रष्टाचार की शिकायतें सामने आ सकती हैं। इसलिए सरकार को यह बताना होगा कि प्रमाणपत्र किन आधारों पर मिलेगा और पात्रता तय करने की प्रक्रिया क्या होगी।

परमिट और सब्सिडी पर भी उठे सवाल

इलेक्ट्रिक व्हीकल एसोसिएशन के अध्यक्ष और ट्रांसपोर्ट ऑपरेटर्स एंड लेबर वेलफेयर एसोसिएशन के सदस्य संजय बथला ने कहा कि ई-रिक्शा के संचालन को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने के लिए परमिट व्यवस्था पर भी स्पष्टता जरूरी है।

उनके मुताबिक, केवल अनुपालन प्रमाणपत्र जारी करने से यातायात प्रबंधन की सभी समस्याएं हल नहीं होंगी। सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि ई-रिक्शा किन सड़कों और गलियों में चल सकेंगे तथा नियमों का उल्लंघन होने पर कार्रवाई किस आधार पर की जाएगी।

बथला ने ई-रिक्शा खरीदने पर मिलने वाली सब्सिडी को लेकर भी सवाल उठाया। उनका कहना है कि प्रस्तावित नीति में यह स्पष्ट होना चाहिए कि नए नियम लागू होने के बाद खरीदारों को सब्सिडी मिलती रहेगी या नहीं। यह जानकारी वाहन खरीदने की योजना बना रहे लोगों और मौजूदा कारोबारियों, दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।

प्रस्तावित नीति में क्या-क्या बदलाव हो सकते हैं?

सरकार के मसौदे में ई-रिक्शा की अधिकतम संख्या 2.5 लाख निर्धारित करने के अलावा कई अन्य नियम भी शामिल हैं। प्रस्ताव के अनुसार, अधिसूचना जारी होने के बाद पहले से पंजीकृत ई-रिक्शा मालिकों को 90 दिनों के भीतर अनुपालन प्रमाणपत्र लेना होगा। यह प्रमाणपत्र दो साल तक वैध रखने का प्रस्ताव है, हालांकि निर्धारित परिस्थितियों में इसे पहले भी निलंबित या रद्द किया जा सकता है।

प्रमाणपत्र मोटर वाहन अधिनियम की धारा 66 के तहत मिलने वाले परमिट से अलग होगा। मसौदे में एक व्यक्ति के पास अधिकतम पांच ई-रिक्शा और किसी संस्था के पास अधिकतम 100 ई-रिक्शा रखने की सीमा का भी प्रस्ताव है।

बिना पंजीकरण के चलने वाले ई-रिक्शा के खिलाफ कार्रवाई की व्यवस्था भी प्रस्तावित है। अधिसूचना के बाद ऐसे वाहन जब्त किए जा सकेंगे और लागू नियमों के अनुसार उन्हें नष्ट करने या नीलाम करने की कार्रवाई की जा सकती है।

चालकों के लिए वैध ड्राइविंग लाइसेंस और सार्वजनिक सेवा वाहन (PSV) बैज अनिवार्य करने का प्रस्ताव है। वाहनों को बैटरी सुरक्षा संबंधी नियमों का पालन करना होगा। एक ई-रिक्शा में अधिकतम चार यात्रियों और 40 किलोग्राम सामान की अनुमति देने की बात भी मसौदे में कही गई है। इसके अलावा सुरक्षा और पहचान से जुड़ी सुविधाएं सुनिश्चित करने का प्रस्ताव है।

आम जनता से मांगे गए सुझाव

दिल्ली सरकार ने प्रस्तावित योजना लागू करने से पहले लोगों को अपनी राय देने का अवसर दिया है। मसौदे के अनुसार, सुझाव 30 दिनों के भीतर schemeconultation2026@gmail.com पर ईमेल के जरिए भेजे जा सकते हैं। डाक से सुझाव दिल्ली परिवहन विभाग के DTO (Operations) को भी भेजे जा सकते हैं।

फिलहाल यह नीति प्रस्ताव के स्तर पर है। अंतिम नियमों और उनके लागू होने की स्थिति पर सरकार के अगले फैसले का इंतजार है। ई-रिक्शा की संख्या सीमित करने की योजना से यातायात व्यवस्था में सुधार होगा या रोजगार पर दबाव बढ़ेगा, इसका जवाब नीति के अंतिम स्वरूप और उसके क्रियान्वयन से ही स्पष्ट होगा।