BRICS सांस्कृतिक बाजार में भारतीय शिल्पकारों का हुनर, पीएम विश्वकर्मा योजना के लाभार्थियों ने दिखाई पारंपरिक कला
पीएम विश्वकर्मा योजना के आठ कारीगरों ने दिल्ली में ब्रिक्स सांस्कृतिक बाजार के दौरान भारतीय हस्तशिल्प प्रदर्शित किया। डोकरा कला, कोल्हापुरी चप्पल, पारंपरिक खिलौने और पश्मीना शॉल सहित विभिन्न उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों ने सराहा।
नई दिल्ली: भारत की पारंपरिक कला और हस्तशिल्प को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रदर्शित करने के लिए सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय की पीएम विश्वकर्मा योजना के आठ शिल्पकारों ने नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स सांस्कृतिक बाजार में हिस्सा लिया। 26 और 27 अक्टूबर को संसद भवन परिसर में आयोजित इस दो दिवसीय कार्यक्रम में शिल्पकारों ने अपने हस्तनिर्मित उत्पादों और पारंपरिक कारीगरी का प्रदर्शन किया।
इस अवसर पर उपराष्ट्रपति सीपी राधा कृष्णन ने कहा कि ब्रिक्स वैश्विक सहयोग के एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में उभरा है। उन्होंने विश्वास जताया कि 12वां ब्रिक्स संसदीय मंच संवाद को और मजबूत करेगा, नवाचार को बढ़ावा देगा, और एक समावेशी तथा समृद्ध दुनिया के साझा दृष्टिकोण को आगे बढ़ाएगा। ब्रिक्स (BRICS) की भावना पर जोर देते हुए, उपराष्ट्रपति ने साझा वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए अधिक सहयोग, आपसी विश्वास और सामूहिक कार्रवाई का आह्वान किया।
देश के अनेक राज्यों के शिल्पकारों ने भाग लिया
12वें ब्रिक्स संसदीय मंच के दौरान आयोजित सांस्कृतिक बाजार का उद्देश्य भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक शिल्प और स्थानीय कौशल को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों तक पहुंचाना था। मंत्रालय की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर, बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड, नागालैंड, कर्नाटक और महाराष्ट्र के शिल्पकारों ने इसमें भाग लिया।
दर्जी, सुनार, मूर्तिकार, गुड़िया एवं खिलौना निर्माता और मोची जैसे पारंपरिक व्यवसायों से जुड़े कारीगरों ने अपने उत्पाद प्रदर्शित किए। कुछ शिल्पकारों ने मौके पर ही पारंपरिक वस्तुएं बनाने की तकनीकों का प्रदर्शन भी किया, जिससे प्रतिनिधियों को भारतीय हस्तकला की बारीकियों को करीब से देखने का अवसर मिला।
पीएम विश्वकर्मा योजना से कारीगरों को मिल रहे नए बाजार
मंत्रालय के अनुसार, पीएम विश्वकर्मा योजना पारंपरिक कारीगरों को कौशल प्रशिक्षण, आधुनिक उपकरण, ऋण सहायता और डिजिटल बाजारों तक पहुंच उपलब्ध कराने में मदद कर रही है। योजना के लाभार्थियों को प्रदर्शनियों और ई-कॉमर्स मंचों के माध्यम से अपने उत्पादों की पहचान बढ़ाने के अवसर भी मिल रहे हैं।
झारखंड के डोकरा शिल्पकार मकबूल जादू पटिया ने अपनी पारंपरिक धातु कला का प्रदर्शन किया। डोकरा शिल्प में जटिल आकृतियों और प्राचीन ‘लॉस्ट-वैक्स कास्टिंग’ तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। योजना के माध्यम से उन्हें दिल्ली हाट और राज्य व्यापार मेले जैसी प्रदर्शनियों में भाग लेने का अवसर मिला। अमेजन पर जुड़ने से उनके उत्पादों को नए ग्राहकों तक पहुंचाने की संभावनाएं भी बढ़ी हैं।
मध्य प्रदेश के पत्थर के मूर्तिकार अनुराग साहू जबलपुर के न्यू भेड़ाघाट मार्बल से मूर्तियां, पूजा सामग्री, स्मृति चिह्न और सजावटी वस्तुएं बनाते हैं। वह जीआई टैग से जुड़े जबलपुर स्टोन क्राफ्ट में पारंपरिक नक्काशी करते हैं। योजना के तहत अमेजन और फ्लिपकार्ट से जुड़ने के बाद उनके उत्पादों को ऑनलाइन बाजार में पहुंचाने का अवसर मिला है।
कोल्हापुरी चप्पलों से कश्मीर की पश्मीना तक दिखी विविधता
महाराष्ट्र के कारीगर बजराव शामराव सतपुते ने पारंपरिक कोल्हापुरी चप्पलों का प्रदर्शन किया। उनकी कारीगरी में विशिष्ट नाच मौरि पट्टा डिजाइन और चमड़े पर बारीक काम शामिल है। योजना के तहत उन्हें राज्य स्तरीय प्रदर्शनी में हिस्सा लेने और अमेजन पर अपने उत्पादों को प्रदर्शित करने का अवसर मिला। कर्नाटक के दीपु एस ने चन्नपटना और किन्हाल के पारंपरिक खिलौने प्रदर्शित किए। योजना के तहत उन्हें टूलकिट और कौशल प्रशिक्षण मिला तथा मीशो ई-कॉमर्स मंच से जुड़ने का अवसर प्राप्त हुआ।
जम्मू-कश्मीर की दर्जी मसरत फयाज ने पारंपरिक शॉल, स्टोल, कश्मीरी फेरन और पश्मीना शॉल से जुड़े अपने काम को प्रस्तुत किया। प्रशिक्षण और आधुनिक उपकरणों से उन्हें उत्पादों की गुणवत्ता, फिनिशिंग और काम की उत्पादकता बेहतर बनाने में मदद मिली। सरकारी प्रदर्शनियों में भागीदारी से उनके उत्पादों को व्यापक बाजार तक पहुंचाने की संभावनाएं बढ़ीं।
बिहार और नागालैंड के शिल्पकारों ने भी दिखाई कला
बिहार के मूर्तिकार धीरज कुमार भगवान बुद्ध और अन्य देवी-देवताओं की लकड़ी तथा पत्थर की मूर्तियां बनाते हैं। उनकी कलाकृतियां गया की बौद्ध विरासत से जुड़ी हैं और बोधगया सहित बिहार के विभिन्न जिलों में पहुंचाई जाती हैं। मंत्रालय के अनुसार, योजना के तहत ऋण सहायता से उन्हें कच्चा माल खरीदने में मदद मिली, जबकि टूलकिट से मूर्तियों की कटाई, घिसाई और पॉलिश का काम बेहतर हुआ।
नागालैंड की थ्रोंगली संगतम के पास 100 से अधिक गुड़ियों का संग्रह है
नागालैंड की थ्रोंगली संगतम पारंपरिक नागा वेशभूषा, जनजातीय आकृतियों और सांस्कृतिक प्रतीकों से प्रेरित हाथ से बनी क्रोशिया गुड़ियां तैयार करती हैं। उनके पास 100 से अधिक गुड़ियों का संग्रह है। वह दिल्ली हाट में अपने उत्पाद प्रदर्शित कर चुकी हैं और मदर्स क्राफ्ट समूह से जुड़ी हैं। ऋण सहायता से उन्हें बेहतर कच्चा माल खरीदने में मदद मिली, जबकि महिला संसाधन विकास विभाग के साथ समझौता ज्ञापन से उनके उत्पादों को माईकी स्टोर के माध्यम से बेचने के अवसर मिले हैं।
राजस्थान के सुनार मोहम्मद नसीम ने रंगीन सजावटी पत्थरों और बारीक हस्तनिर्मित डिजाइन वाली पारंपरिक लाख की चूड़ियां प्रदर्शित कीं। योजना के तहत कौशल प्रशिक्षण, आधुनिक टूलकिट, ऋण सहायता और अमेजन से जुड़ने के अवसर ने उनके कारोबार के विस्तार में मदद की।
भारतीय सांस्कृतिक विरासत को मिला अंतरराष्ट्रीय मंच
ब्रिक्स सांस्कृतिक बाजार में आठ शिल्पकारों की भागीदारी ने भारत की पारंपरिक कारीगरी की विविधता को सामने रखा। इस आयोजन ने कारीगरों को अपने उत्पादों की पहचान बढ़ाने, नए बाजारों तक पहुंच बनाने और पारंपरिक कौशल को संरक्षित रखने का अवसर दिया।
मंत्रालय की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, ब्रिक्स प्रतिनिधियों ने विश्वकर्माओं द्वारा तैयार उत्पादों की सराहना की। यह पहल पारंपरिक शिल्प को बढ़ावा देने के साथ-साथ कारीगर समुदायों की आजीविका मजबूत करने और भारतीय सांस्कृतिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित करने की दिशा में महत्वपूर्ण रही।