Explained: यूपी-बिहार में बाढ़ का कहर, सरकार ने झोंकी पूरी ताकत! अब मुंबई-कोलकाता पर मंडरा रहा नया खतरा

यूपी-बिहार में बाढ़ का कहर जारी है… लाखों लोग प्रभावित हैं, कई इलाकों में घर, सड़कें और स्कूल पानी में डूबे हैं। दूसरी तरफ हिमाचल में भी मानसून ने भारी तबाही मचाई है। सरकारें राहत और बचाव में जुटी हैं, लेकिन इस बाढ़ ने एक बड़ा सवाल भी खड़ा कर दिया है। क्या बदलता मौसम आने वाले समय में ऐसी आपदाओं का खतरा और बढ़ा सकता है? WMO और UN की रिपोर्ट्स भारत के तटीय इलाकों, खासकर मुंबई और कोलकाता के लिए बढ़ते समुद्री जलस्तर की गंभीर चेतावनी दे रही हैं। मौजूदा बाढ़ से लेकर भविष्य के इस बड़े खतरे तक… पूरी तस्वीर समझिए इस खास रिपोर्ट में।

By  Gurpreet Kaur September 4th 2026 07:04 PM

नई दिल्ली: बारिश और बाढ़ ने उत्तर भारत में हाहाकार मचा रखा है। उत्तर प्रदेश के 26 जिलों में साढ़े तीन लाख से ज्यादा लोग बाढ़ की चपेट में हैं, वहीं बिहार के 16 जिलों में करीब 5 लाख लोग प्रभावित हैं। गंगा समेत आधा दर्जन से ज्यादा नदियां दोनों राज्यों में खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं। घर डूब रहे हैं, बच्चे नाव से स्कूल पहुंच रहे हैं, और प्रशासन दिन-रात राहत-बचाव में जुटा है। सरकारें राहत शिविर, नावें और मेडिकल टीमें तैनात कर चुकी हैं, लेकिन इसी बीच संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट ने भारत के दो बड़े महानगरों… मुंबई और कोलकाता… को लेकर जो चेतावनी दी है, उसने एक बड़ी बहस छेड़ दी है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या आज की यह बाढ़ किसी बड़े जलवायु संकट की शुरुआती दस्तक भर है।


उत्तर प्रदेश में लगातार बारिश के चलते बाढ़ अब 26 जिलों तक फैल चुकी है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक करीब साढ़े तीन लाख लोग सीधे तौर पर प्रभावित हैं, जबकि अब तक 17 हजार 500 से ज्यादा लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा चुका है। प्रदेश में 65 जिलों में बारिश का अलर्ट जारी है और मौसम विभाग ने अगले पांच दिन तक राहत की कोई उम्मीद नहीं जताई है।


काशी में गंगा और वरुणा नदी का पानी बस्तियों तक पहुंच गया है। गंगा का जलस्तर अब घटने लगा है, लेकिन वरुणा किनारे और निचले इलाकों में बाढ़ का असर अब भी बना हुआ है। शहर के सभी 84 घाट पूरी तरह डूब चुके हैं और 407 परिवार अपना घर छोड़कर राहत शिविरों में शरण ले चुके हैं। जिलाधिकारी सत्येंद्र कुमार के मुताबिक जलस्तर अब भी चेतावनी बिंदु से ऊपर है। वरुणा नदी किनारे 17 राहत शिविर सक्रिय किए गए हैं, जहां करीब 1,800 लोग रह रहे हैं। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने, जो वाराणसी से सांसद भी हैं, जिलाधिकारी और महापौर अशोक तिवारी से फोन पर बात कर हालात की जानकारी ली और राहत कार्यों में तेजी लाने के निर्देश दिए।


कानपुर में गंगा किनारे बने एक अपार्टमेंट की बाउंड्री दीवार मिट्टी दरकने से ढह गई। 40 से ज्यादा फ्लैट वाली इस इमारत में दरारें आ गई हैं, जिससे रहने वालों में दहशत का माहौल है। इसके अलावा पांडु नदी का जलस्तर बढ़ने से गोपालपुरम और जरौली फेज-2 जैसे निचले इलाकों में पानी घुस गया। करीब 25 परिवारों के फंसे होने की सूचना पर NDRF की टीमें मौके पर भेजी गईं, साथ ही राहत शिविर और कम्युनिटी किचन की व्यवस्था भी की गई।





गोंडा में घाघरा नदी खतरे के निशान से 23 सेंटीमीटर ऊपर बह रही है, महज 24 घंटे में जलस्तर 11 सेंटीमीटर बढ़ा। तरबगंज और कर्नलगंज इलाके के करीब 15 गांवों पर खतरा मंडरा रहा है। बलिया में गंगा और सरयू के उफान से 36 हजार से ज्यादा लोग प्रभावित हैं। जलस्तर हाई फ्लड लेवल से महज 56 सेंटीमीटर दूर रह गया है। प्रशासन ने यहां 116 नावें राहत-बचाव में लगाई हैं और अब तक 8 हजार राशन किट, 86 हजार से ज्यादा पके भोजन के पैकेट और 34 हजार से ज्यादा दवा किट बांटे जा चुके हैं।


गाजीपुर में रात के अंधेरे में एक बड़ा रेस्क्यू ऑपरेशन करना पड़ा, गंगा के बीच एक टापू पर फंसे 12 चरवाहों और 2 हजार से ज्यादा भेड़ों को नाइट-विजन ड्रोन की मदद से सुरक्षित निकाला गया। यह ऑपरेशन करीब छह घंटे तक चला। महोबा में जैतपुर-कुढई मार्ग पर दूनर नदी के उफान में दो युवक बाइक समेत बह गए, हालांकि गांव वालों की मदद से उनकी जान बच गई। चित्रकूट में मंदाकिनी नदी का पानी अब धीरे-धीरे घट रहा है, लेकिन रामघाट के पास दुकानों और घरों में अब भी पानी भरा है। सोनभद्र में प्रदेश के सबसे बड़े रिहंद बांध का जलस्तर बढ़ने पर एहतियातन चार गेट बंद किए गए, जबकि झांसी में माताटीला बांध ओवरफ्लो होने पर 20 गेट खोलने पड़े।


पीलीभीत टाइगर रिजर्व के निचले इलाकों में भी भारी जलभराव हुआ है। जंगल के कई कच्चे रास्ते पानी और दलदल में बदल गए हैं, जिससे वन विभाग की गश्त तक प्रभावित हुई है। करीब 35 गांव बाढ़ की चपेट में हैं और वन्यजीव बस्तियों की तरफ रुख कर रहे हैं,  गुरुवार को एक बाघ खेत में देखा गया। उत्तर प्रदेश में इस साल अगस्त में 291.3 मिमी बारिश दर्ज की गई, जबकि दीर्घकालिक औसत 235.5 मिमी है, यानी सामान्य से 24% ज्यादा। यह 2018 के बाद अगस्त महीने में हुई सबसे ज्यादा बारिश है। प्रयागराज में 631.6 मिमी और बांदा में 646 मिमी बारिश दर्ज हुई, जो 1901 के बाद से इन दोनों जिलों में अगस्त माह का सर्वाधिक आंकड़ा है। मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक उत्तर-पश्चिमी बंगाल की खाड़ी में बना कम दबाव क्षेत्र और उत्तरी हरियाणा के ऊपर बना चक्रवाती परिसंचरण, दोनों मिलकर यूपी के मानसून को मजबूत बना रहे हैं और अगले पांच दिन भारी बारिश की आशंका है।




बिहार: 5 लाख से ज्यादा प्रभावित, स्कूल-श्मशान घाट तक डूबे


बिहार के 16 जिलों में बाढ़ से करीब 5 लाख लोग प्रभावित हैं। गंगा, गंडक, कोसी, पुनपुन और बूढ़ी गंडक समेत 8 प्रमुख नदियां खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं। पटना में गंगा का जलस्तर लगातार बढ़ने की वजह से सुरक्षा दीवार के सभी 108 रास्ते बंद कर दिए गए हैं, ताकि नालों के जरिए शहर में पानी न घुसे। आपदा प्रबंधन विभाग के मुताबिक पटना के गांधी घाट और हाथीदह में गंगा का जलस्तर अब तक के सर्वाधिक बाढ़ स्तर को पार कर सकता है। वैशाली, खगड़िया, भागलपुर, बक्सर, गोपालगंज और पश्चिमी चंपारण में भी नदियां खतरे के निशान से ऊपर दर्ज की गई हैं। पटना में गंगा का पानी अब घाटों से आगे बढ़कर श्मशान घाटों तक पहुंच गया है, जिससे अंतिम संस्कार जैसे जरूरी काम भी प्रभावित हो रहे हैं। बेगूसराय के मटिहानी में गंगा का पानी 17 सरकारी स्कूलों तक पहुंच गया है, जिससे पढ़ाई ठप है।


कटिहार में गंगा, कोसी और बरंडी नदियों के उतार-चढ़ाव से प्रतापगंज स्थित मध्य विद्यालय चारों तरफ से पानी से घिर गया है। करीब 300 छात्र-छात्राएं रोजाना नाव के जरिए स्कूल पहुंचने को मजबूर हैं क्योंकि स्कूल तक जाने वाली मुख्य सड़क पानी में डूब चुकी है। रोहतास के इंद्रपुरी बैराज के सभी 69 गेट खोलने पड़े, जिससे सोन नदी में भारी मात्रा में पानी छोड़ा गया और निचले इलाकों में खतरा और बढ़ गया। भागलपुर में तटबंधों की सुरक्षा को लेकर लगातार समीक्षा की जा रही है।




हिमाचल में मानसून का कहर, 266 मौतें


इसी बीच हिमाचल प्रदेश में इस मानसून सीजन में बारिश से जुड़ी घटनाओं में अब तक 266 लोगों की जान जा चुकी है। इनमें 158 मौतें सड़क हादसों में, 18 लैंडस्लाइड में, 13 डूबने से और एक फ्लैश फ्लड से हुई। मौसम विभाग ने अगले 48 घंटे के लिए तीन जिलों में भारी बारिश का यलो अलर्ट जारी किया है, इसके बाद 8 सितंबर तक किसी जिले में अलर्ट नहीं है। इस मानसून सीजन (1 जून से 3 सितंबर तक) में राज्य में 1,235 करोड़ रुपये की सरकारी-निजी संपत्ति नष्ट हो चुकी है।




सरकार का रिस्पॉन्स: यूपी-बिहार में युद्धस्तर पर राहत-बचाव


मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 3 सितंबर को फर्रुखाबाद के बाढ़ प्रभावित इलाकों का हवाई सर्वे किया और हालात का जायजा लिया। इसके बाद उन्होंने बाढ़ प्रभावित परिवारों से मुलाकात कर राहत सामग्री बांटी। फर्रुखाबाद में 1,000 परिवारों को राहत किट दी गईं, जबकि बाढ़ में बेघर हुए 31 लोगों को आवासीय भूमि के पट्टे और मकान निर्माण के लिए 1 लाख 20 हजार रुपये की आर्थिक सहायता दी गई। सीएम ने प्रभावित किसानों की फसल के नुकसान का सर्वे कराने के निर्देश भी दिए, ताकि आकलन के बाद मुआवजा दिया जा सके।


सरकार के मुताबिक पूरे प्रदेश में राहत-बचाव के लिए 1,312 राहत शिविर, 1,634 बाढ़ चौकियां, 1,697 नाव-मोटरबोट और 1,068 मेडिकल टीमें तैनात हैं। अब तक 17,544 लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है, जबकि 4,847 लोग राहत शिविरों में रह रहे हैं। राहत सामग्री के आंकड़े भी बड़े हैं — 72,897 से ज्यादा खाद्यान्न पैकेट, 3 लाख 67 हजार से ज्यादा लंच पैकेट, 5 लाख 52 हजार से ज्यादा क्लोरीन टैबलेट, 1 लाख 87 हजार से ज्यादा ORS पैकेट, और प्रभावित पशुओं के लिए 5,000 क्विंटल से ज्यादा भूसा वितरित किया जा चुका है। प्रयागराज में गंगा-यमुना के बढ़ते जलस्तर के बीच NDRF-SDRF की टीमें लगातार निगरानी में जुटी हैं।





बिहार: सीएम सम्राट चौधरी हाई अलर्ट पर, तटबंधों की चौबीसों घंटे निगरानी


बिहार में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने पटना में गंगा के बढ़ते जलस्तर और बाढ़ प्रभावित इलाकों का जायजा लिया और अधिकारियों को लोगों की जान-माल की सुरक्षा के लिए तत्काल कदम उठाने के निर्देश दिए। NDRF और SDRF की टीमें हाई अलर्ट पर हैं, जबकि राहत शिविरों में सुरक्षित आश्रय, भोजन, दवाइयां और जरूरी सामान तैयार रखने को कहा गया है। निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को समय रहते अलर्ट करने के लिए स्थानीय जनप्रतिनिधियों और पब्लिक अनाउंसमेंट सिस्टम का इस्तेमाल किया जा रहा है। संवेदनशील तटबंधों पर चौबीसों घंटे निगरानी के निर्देश दिए गए हैं। सीएम सम्राट चौधरी बाढ़ प्रभावित इलाकों का हवाई सर्वे भी करने वाले हैं, जिसके बाद उच्चस्तरीय बैठक में जलस्तर, तटबंधों की सुरक्षा और राहत-बचाव तैयारियों की समीक्षा होगी।


मौसम विभाग ने आने वाले दिनों में भी भारी बारिश की चेतावनी दी है। ऐसे में सवाल यह है कि अगर बारिश का एक और दौर आता है, तो क्या मौजूदा राहत-बचाव व्यवस्था उस अतिरिक्त दबाव को संभाल पाएगी। प्रशासन के सामने अब दोहरी चुनौती है — पहले से फंसे लोगों को सुरक्षित निकालना, और आने वाली नई बारिश के लिए तैयार रहना।




अब बड़ा सवाल: क्या यह बाढ़ किसी बड़े जलवायु संकट का संकेत है?


बारिश और बाढ़ ने उत्तर भारत में जो तबाही मचाई है, उसके पीछे एक और बड़ा सवाल खड़ा हो गया है — क्या बदलता मौसम आने वाले समय में ऐसी आपदाओं का खतरा और बढ़ा सकता है? यहां एक बात साफ समझनी जरूरी है — उत्तर प्रदेश या बिहार में आई मौजूदा बाढ़ को सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन का नतीजा कहना सही नहीं होगा। भारी बारिश, नदियों का बढ़ता जलस्तर, बांधों से छोड़ा गया पानी और स्थानीय भौगोलिक हालात — बाढ़ के कई कारण हो सकते हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन इन खतरों को और बड़ा बनाने वाला एक अहम कारक जरूर है।




WMO रिपोर्ट: तेजी से गर्म हो रहा है एशिया 


विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की ताजा State of the Climate in Asia 2025 रिपोर्ट के मुताबिक, 1991 से 2025 के बीच एशिया की वार्मिंग की रफ्तार, 1961-1990 की तुलना में करीब दोगुनी रही है। 2025 में समुद्र की गर्मी भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई, और हाई माउंटेन एशिया के सभी 23 निगरानी वाले ग्लेशियरों ने अपना बर्फ का द्रव्यमान खोया है।






संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट: रिकॉर्ड रफ्तार से बढ़ा समुद्र का स्तर


संयुक्त राष्ट्र महासचिव की रिपोर्ट “Challenges related to sea level rise and ways and approaches to address it” के मुताबिक 2014 से 2023 के बीच वैश्विक समुद्र का स्तर औसतन हर साल 4.7 मिलीमीटर बढ़ा, लेकिन 2024 में यह अकेले एक साल में बढ़कर रिकॉर्ड 5.9 मिलीमीटर हो गया — इसकी मुख्य वजह गर्म होता समुद्र और पिघलते ग्लेशियर हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनियाभर में करीब 77 करोड़ लोग, यानी वैश्विक आबादी का करीब 10%, ऐसे तटीय इलाकों में रहते हैं जो हाई-टाइड लाइन से पांच मीटर से भी कम ऊंचाई पर हैं।





मुंबई-कोलकाता पर UN की सीधी चेतावनी


रिपोर्ट में साफ तौर पर मुंबई और कोलकाता का जिक्र किया गया है, साथ ही बांग्लादेश की राजधानी ढाका का भी। इन दक्षिण एशियाई डेल्टा क्षेत्रों में 1.4 करोड़ से ज्यादा लोग अपने घरों को स्थायी रूप से पानी में डूबने (permanent inundation) के “तत्काल खतरे” में हैं। यह रिपोर्ट सोमवार, 1 सितंबर 2026 को जारी हुई थी। रिपोर्ट के मुताबिक समुद्र का बढ़ता जलस्तर शहरी बुनियादी ढांचे, जल व्यवस्था, परिवहन नेटवर्क, ऊर्जा ग्रिड, इमारतों और भूजल संसाधनों को पहले से ही नुकसान पहुंचा रहा है। 


समुद्र का पानी बढ़ने के साथ खारे पानी का जमीन में रिसाव (saltwater intrusion) भी एक बड़ा खतरा है, जो पीने के पानी के स्रोतों और खेती की उपजाऊ जमीन दोनों को प्रभावित कर सकता है। गौरतलब है कि यह कोई तय समय-सीमा वाली भविष्यवाणी नहीं है, रिपोर्ट यह नहीं बताती कि मुंबई या कोलकाता कब तक डूब जाएंगे, बल्कि यह बढ़ते जोखिम और तत्काल खतरे की बात करती है।




2050 तक मुंबई के द्वीपीय हिस्से का 80% डूबने का खतरा

WMO के आंकड़ों के मुताबिक 1999 से 2025 के बीच भारतीय तट पर समुद्र का स्तर करीब 4.9 मिलीमीटर प्रति वर्ष की रफ्तार से बढ़ा है, जबकि वैश्विक औसत करीब 3.6 मिलीमीटर प्रति वर्ष है, यानी भारत के कई तटीय हिस्सों में समुद्र वैश्विक औसत से भी तेज बढ़ रहा है। UN की यह चेतावनी बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) की 2021 में जारी हुई मुंबई क्लाइमेट एक्शन प्लान रिपोर्ट से भी मेल खाती है, जिसमें अनुमान लगाया गया था कि 2050 तक मुंबई के द्वीपीय शहर का 80% हिस्सा डूब सकता है, और अगले तीन दशकों में मुंबई समेत 11 अन्य भारतीय तटीय शहरों में समुद्र का स्तर 0.1 से 0.3 मीटर तक बढ़ सकता है।





रिपोर्ट के मुताबिक समुद्र का बढ़ता स्तर पूरी तरह रोकना आसान नहीं, लेकिन नुकसान को कम करना संभव है। समुद्री दीवारें, बेहतर जल निकासी व्यवस्था और मैंग्रोव जैसे प्राकृतिक कवच इस खतरे को धीमा कर सकते हैं, हालांकि सबसे कमजोर और गरीब बस्तियां अक्सर इन सुरक्षा उपायों से सबसे दूर होती हैं। संयुक्त राष्ट्र ने इस समस्या से निपटने के लिए 18 सिफारिशें दी हैं, जिनमें ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी, मजबूत अर्ली-वार्निंग सिस्टम, बेहतर वैज्ञानिक डेटा, जलवायु अनुकूलन के लिए ज्यादा फंडिंग और सबसे कमजोर समुदायों की सुरक्षा जैसे कदम शामिल हैं।



निष्कर्ष


आज उत्तर प्रदेश और बिहार बाढ़ से जूझ रहे हैं- नदियां उफान पर हैं, हजारों लोग बेघर हैं, बच्चे नाव से स्कूल जा रहे हैं। सरकारें राहत शिविर, नावें और राशन के जरिए मौजूदा संकट से निपटने में जुटी हैं। लेकिन विशेषज्ञों की मानें तो आने वाले वर्षों में मुंबई और कोलकाता जैसे तटीय महानगरों के सामने बढ़ते समुद्र की एक बिल्कुल अलग और दीर्घकालिक चुनौती खड़ी हो सकती है।


आज की बाढ़ को सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन का नतीजा कहना सही नहीं होगा, लेकिन WMO और UN की रिपोर्ट्स साफ इशारा करती हैं कि बढ़ती चरम मौसमी घटनाओं और बढ़ते समुद्र के खतरे को नजरअंदाज करना अब भारी पड़ सकता है। सवाल अब सिर्फ यह नहीं कि अगली बारिश कब आएगी, बल्कि यह है कि अगली बड़ी आपदा से पहले क्या हमारी तैयारी पूरी होगी।


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