कौन हैं जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा, जिन्हें पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बनाया गया? नियुक्ति पर क्यों नाराज है मान सरकार?
Justice Ashwini Kumar Mishra: पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस पद पर जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा की नियुक्ति को लेकर पंजाब सरकार ने आपत्ति जताई है। जानिए कौन हैं जस्टिस मिश्रा और आखिर नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर मान सरकार और केंद्र के बीच विवाद क्यों हुआ।
पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पद पर जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा की नियुक्ति को लेकर पंजाब की भगवंत मान सरकार और केंद्र के बीच विवाद खड़ा हो गया है। पंजाब कैबिनेट ने उनकी नियुक्ति पर आपत्ति जताते हुए आरोप लगाया है कि राज्य सरकार की राय का इंतजार किए बिना नियुक्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। राज्य सरकार ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और पंजाब के राज्यपाल से इस प्रक्रिया को रोकने और पहले पंजाब का पक्ष लेने की मांग भी की थी।
कौन हैं जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा?
जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा का न्यायिक करियर तीन दशक से अधिक लंबा है। उन्होंने 8 मई 1993 को अधिवक्ता के रूप में पंजीकरण कराया था। वर्ष 2013 में उन्हें सीनियर एडवोकेट का दर्जा मिला।
इसके बाद 3 फरवरी 2014 को इलाहाबाद हाई कोर्ट में अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में उनकी नियुक्ति हुई। करीब दो साल बाद, 1 फरवरी 2016 को उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट का स्थायी न्यायाधीश बनाया गया।
बाद में उनका तबादला पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट किया गया। उन्होंने 21 जुलाई 2025 को चंडीगढ़ स्थित हाई कोर्ट में कार्यभार संभाला। जस्टिस शील नागू के सुप्रीम कोर्ट जाने के बाद जस्टिस मिश्रा यहां कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की भूमिका भी निभा रहे थे।
अब सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश के बाद उन्हें इसी हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी है।
पंजाब सरकार ने जताई थी आपत्ति
जस्टिस मिश्रा की नियुक्ति को लेकर पंजाब सरकार की मुख्य आपत्ति प्रक्रिया को लेकर है। मुख्यमंत्री भगवंत मान की अध्यक्षता में हुई पंजाब कैबिनेट की बैठक में नियुक्ति के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया गया।
राज्य सरकार का दावा है कि Memorandum of Procedure (MoP) के तहत पंजाब सरकार के विचार लिए जाने चाहिए थे। सरकार का आरोप है कि उसकी प्रतिक्रिया का इंतजार किए बिना केंद्र ने नियुक्ति की अधिसूचना जारी कर दी।
पंजाब कैबिनेट ने मांग की कि राज्य की राय लेने और उस पर विचार करने तक नियुक्ति और शपथ ग्रहण की प्रक्रिया को रोका जाए।
आखिर न्यायिक नियुक्तियों पर विवाद क्या है?
यह विवाद सिर्फ जस्टिस मिश्रा की नियुक्ति तक सीमित नहीं है। असल सवाल यह है कि हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में राज्य सरकार की भूमिका कितनी है और उसकी राय का क्या महत्व है?
पंजाब सरकार का कहना है कि MoP के तहत संबंधित राज्य सरकार के विचार लिए जाने की प्रक्रिया का पालन होना चाहिए था। इसी आधार पर मान सरकार ने इसे राज्य के संवैधानिक अधिकारों और संघीय ढांचे से जोड़ते हुए विरोध दर्ज कराया है।
हालांकि, इस मुद्दे पर कानूनी विशेषज्ञों की व्याख्या अलग है। कुछ विशेषज्ञों के मुताबिक राज्य सरकार से राय लेना प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन राज्य की सहमति को नियुक्ति पर वीटो के तौर पर नहीं देखा जाता। यानी पंजाब सरकार की आपत्ति और नियुक्ति को रोकने की उसकी मांग—दोनों अलग-अलग कानूनी सवाल हैं।
मान सरकार ने केंद्र पर और क्या आरोप लगाए?
पंजाब सरकार ने इस विवाद को केंद्र और राज्य के बीच पहले से चले आ रहे कई मुद्दों से भी जोड़ा है। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने ग्रामीण विकास फंड, बाढ़ राहत राशि और भाखड़ा-ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड से जुड़े मामलों का उल्लेख करते हुए केंद्र पर पंजाब के अधिकारों की अनदेखी का आरोप लगाया है। हालांकि, ये अलग-अलग राजनीतिक और प्रशासनिक मुद्दे हैं और इन्हें जस्टिस मिश्रा की नियुक्ति की कानूनी प्रक्रिया से अलग समझना जरूरी है।
अब विवाद का केंद्र क्या है?
फिलहाल पूरे मामले में दो बातें सबसे अहम हैं। पहली, जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा को पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश और नियुक्ति प्रक्रिया। दूसरी, पंजाब सरकार का यह दावा कि उसकी राय लिए बिना प्रक्रिया पूरी की गई।
यानी विवाद जस्टिस मिश्रा के न्यायिक अनुभव या योग्यता पर नहीं, बल्कि नियुक्ति की प्रक्रिया और राज्य सरकार की भूमिका पर केंद्रित है। यही वजह है कि यह मामला पंजाब सरकार और केंद्र के बीच संवैधानिक अधिकारों तथा संघीय ढांचे को लेकर नई बहस का कारण बन गया है।