Chitta Ravan Politics: अमित शाह के ‘चिट्टा रावण’ दहन से लौटी 2016 की यादें, रवनीत बिट्टू की बदली पार्टी, लेकिन नशे का मुद्दा बरकरार

लुधियाना के दरेसी ग्राउंड में अमित शाह के ‘चिट्टा रावण’ दहन ने पंजाब की राजनीति में 2016 के उस विरोध प्रदर्शन की यादें ताजा कर दीं, जब रवनीत सिंह बिट्टू कांग्रेस में रहते हुए अकाली दल-भाजपा सरकार के खिलाफ खड़े थे। एक दशक बाद बिट्टू भाजपा के साथ हैं और नशे के मुद्दे पर अब AAP सरकार को घेरा जा रहा है।

By  Laxman October 21st 2026 11:30 AM

पंजाब में नशे का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के लुधियाना दौरे और दरेसी ग्राउंड में ‘चिट्टा रावण’ दहन ने करीब दस साल पुराने राजनीतिक घटनाक्रम की यादें ताजा कर दीं। इस कार्यक्रम में भाजपा नेता रवनीत सिंह बिट्टू की मौजूदगी ने खास तौर पर ध्यान खींचा, क्योंकि 2016 में वह कांग्रेस में रहते हुए इसी मुद्दे पर तत्कालीन अकाली दल-भाजपा सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर चुके थे।

समय के साथ पंजाब की राजनीति में कई बड़े बदलाव हुए हैं। सरकारें बदलीं, राजनीतिक गठबंधन टूटे और नेताओं ने पार्टियां बदलीं, लेकिन नशे की समस्या अब भी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का अहम विषय बनी हुई है। इस बार भाजपा नशे के मुद्दे पर आम आदमी पार्टी सरकार को घेर रही है, जबकि 2016 में कांग्रेस ने इसी तरह के विरोध के जरिए तत्कालीन सरकार पर निशाना साधा था।

अमित शाह के दौरे में ‘चिट्टा रावण’ बना चर्चा का विषय

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मंगलवार को पंजाब के दौरे पर पहुंचे। इस दौरान उन्होंने नशा विरोधी कार्यकर्ता परविंदर सिंह झोटा के परिवार से मुलाकात की। झोटा की पिछले सप्ताह गोली मारकर हत्या किए जाने के बाद यह मामला राज्य में चर्चा का विषय बना हुआ है।

इसके बाद शाह लुधियाना के ऐतिहासिक दरेसी ग्राउंड में दशहरा कार्यक्रम में शामिल हुए, जहां ‘चिट्टा रावण’ का दहन किया गया। पंजाब में ‘चिट्टा’ शब्द का इस्तेमाल आम तौर पर एक खतरनाक नशीले पदार्थ के संदर्भ में किया जाता है। ऐसे में रावण के प्रतीक के जरिए नशे के खिलाफ संदेश देने की कोशिश को राजनीतिक और सामाजिक, दोनों नजरियों से देखा गया।

कार्यक्रम में रवनीत सिंह बिट्टू की मौजूदगी ने इसे और राजनीतिक महत्व दे दिया। भाजपा नेताओं का कहना है कि इस आयोजन के पीछे नशे के खिलाफ जागरूकता और राज्य सरकार को जवाबदेह ठहराने का उद्देश्य है।

2016 में कांग्रेस ने SAD-BJP सरकार को घेरा था

करीब दस साल पहले पंजाब में नशे का मुद्दा कांग्रेस के राजनीतिक अभियान का प्रमुख हिस्सा था। 18 अक्टूबर 2016 को रवनीत सिंह बिट्टू और कैप्टन अमरिंदर सिंह ने तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल और मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया की तस्वीरों वाले पुतले जलाने के विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया था।

यह प्रदर्शन पहले दशहरे के आसपास आयोजित करने की योजना थी, लेकिन कांग्रेस और युवा अकाली दल के कार्यकर्ताओं के बीच झड़प में कई लोगों के घायल होने के बाद कार्यक्रम टाल दिया गया था। इसके बाद कांग्रेस नेताओं ने एक सप्ताह बाद दोबारा प्रदर्शन किया। उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी लुधियाना पहुंचे थे।

कांग्रेस ने तत्कालीन अकाली दल-भाजपा सरकार पर नशे की समस्या को नियंत्रित करने में विफल रहने के आरोप लगाए थे। इस तरह ‘चिट्टा रावण’ उस समय केवल एक प्रतीकात्मक पुतला नहीं, बल्कि चुनावी राजनीति में नशे के मुद्दे को प्रमुखता से उठाने का माध्यम बन गया था।

रवनीत बिट्टू की राजनीतिक यात्रा में बड़ा बदलाव

2016 और 2026 के घटनाक्रम में सबसे उल्लेखनीय अंतर रवनीत सिंह बिट्टू की राजनीतिक भूमिका का है। उस समय वह कांग्रेस के सांसद थे और पार्टी की ओर से अकाली दल-भाजपा सरकार के खिलाफ आवाज उठा रहे थे। अब वह भाजपा में हैं और पंजाब की मौजूदा आम आदमी पार्टी सरकार पर नशे के मुद्दे को लेकर सवाल उठाने वाली राजनीति का हिस्सा हैं।

2024 के लोकसभा चुनाव से पहले बिट्टू ने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था। वह लुधियाना सीट से चुनाव लड़े, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। उनके राजनीतिक बदलाव के साथ पंजाब में विरोध के मंच और निशाने पर रहने वाली पार्टी भी बदल गई है।

इसी वजह से दरेसी ग्राउंड का हालिया कार्यक्रम 2016 के प्रदर्शन से तुलना का विषय बन गया है। हालांकि, दोनों आयोजनों की परिस्थितियां और राजनीतिक संदर्भ पूरी तरह एक जैसे नहीं हैं, लेकिन दोनों में नशे के मुद्दे को प्रतीकात्मक विरोध के जरिए सामने लाने की समानता दिखाई देती है।

पंजाब की राजनीति में बदले कई समीकरण

2016 के बाद पंजाब की राजनीति में बड़े बदलाव आए। 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जीत दर्ज की और कैप्टन अमरिंदर सिंह मुख्यमंत्री बने। इसके बाद 2020 में भाजपा और अकाली दल का पुराना गठबंधन टूट गया। आगे चलकर कैप्टन अमरिंदर सिंह भाजपा में शामिल हुए और 2022 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने राज्य में सरकार बनाई।

इन बदलावों ने पंजाब की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को नए रूप में ढाला। अब भाजपा नशे के खिलाफ कार्रवाई को लेकर AAP सरकार पर सवाल उठाती है, जबकि विपक्षी दल समय-समय पर राज्य में नशे की उपलब्धता और उसके सामाजिक प्रभावों को मुद्दा बनाते रहे हैं।

नशे की समस्या पर जवाबदेही का सवाल

‘चिट्टा रावण’ दहन ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि राजनीतिक दल नशे के मुद्दे को सत्ता और विपक्ष में रहते हुए किस तरह उठाते हैं। 2016 में कांग्रेस तत्कालीन सरकार को घेर रही थी, जबकि अब भाजपा उसी समस्या को लेकर मौजूदा सरकार पर निशाना साध रही है।

राजनीतिक प्रतीकों और आयोजनों से जनजागरूकता पैदा हो सकती है, लेकिन नशे की समस्या से निपटने के लिए लगातार कार्रवाई, तस्करी पर नियंत्रण, नशे की लत से जूझ रहे लोगों के उपचार और पुनर्वास जैसी पहल भी जरूरी हैं। पंजाब में नशे के खिलाफ अभियान की वास्तविक सफलता का आकलन केवल राजनीतिक बयानों से नहीं, बल्कि जमीन पर होने वाले बदलावों से किया जाएगा।

एक दशक में पंजाब की राजनीति की तस्वीर बदल गई है। रवनीत बिट्टू की पार्टी बदल गई, सरकारें बदल गईं और राजनीतिक विरोधी भी बदल गए, लेकिन नशे का मुद्दा आज भी राज्य की सियासत में उतना ही महत्वपूर्ण बना हुआ है।

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