AAP में बगावत से केजरीवाल का बड़ा सबक, बोले- राज्यसभा भेजने से पहले 100 बार ठोक-बजाकर देखेंगे
Arvind Kejriwal News: राघव चड्ढा समेत सात राज्यसभा सांसदों के AAP छोड़कर बीजेपी में जाने के बाद अरविंद केजरीवाल ने कहा कि अब पार्टी राज्यसभा उम्मीदवारों का चयन बेहद सावधानी से करेगी। उन्होंने इसे AAP के लिए बड़ा सबक बताया।
आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों के बीजेपी में जाने पर पहली बार भविष्य की रणनीति को लेकर बड़ा संकेत दिया है। गोवा में एक कार्यक्रम के दौरान केजरीवाल ने कहा कि राज्यसभा के लिए उम्मीदवार चुनते समय अब पार्टी पहले से कहीं ज्यादा सावधानी बरतेगी। उन्होंने कहा कि भविष्य में किसी व्यक्ति को राज्यसभा भेजने से पहले उसकी राजनीतिक प्रतिबद्धता को “100 बार ठोक-बजाकर” परखा जाएगा।
केजरीवाल ने राघव चड्ढा समेत सात राज्यसभा सांसदों के पार्टी छोड़ने को AAP के लिए दुखद घटना बताया। हालांकि, उन्होंने साथ ही यह भी दावा किया कि पार्टी के दूसरे चुने हुए प्रतिनिधियों ने अब तक जनता का भरोसा नहीं तोड़ा है।
‘राज्यसभा में हमारे लिए सीख है’
अरविंद केजरीवाल ने कहा कि आम आदमी पार्टी के गठन के बाद से पार्टी ने कई राजनीतिक चुनौतियों का सामना किया है। उन्होंने दिल्ली का उदाहरण देते हुए कहा कि शुरुआती दौर में बीजेपी के पास सरकार बनाने के लिए कुछ और विधायकों की जरूरत थी, लेकिन AAP के विधायक नहीं टूटे।
उन्होंने गोवा का भी जिक्र किया। केजरीवाल के मुताबिक, 2022 के विधानसभा चुनाव में गोवा की जनता ने AAP को दो विधायक दिए थे और दोनों को पार्टी से अलग करने की कोशिशों के बावजूद वे साथ बने रहे। उन्होंने जम्मू-कश्मीर के AAP विधायक का भी उल्लेख करते हुए कहा कि वहां भी पार्टी के एकमात्र विधायक को तोड़ने की कोशिश सफल नहीं हुई।
गुजरात का उदाहरण देते हुए केजरीवाल ने कहा कि वहां पार्टी के पांच विधायक थे, जिनमें से एक ने इस्तीफा दिया और उसके बाद हुए उपचुनाव में AAP ने बीजेपी को हरा दिया।
केजरीवाल का दावा था कि पार्टी के अधिकांश निर्वाचित प्रतिनिधियों ने जनता के साथ विश्वासघात नहीं किया है।
सात सांसदों के जाने से AAP को बड़ा झटका
इस साल अप्रैल में राघव चड्ढा, अशोक मित्तल, संदीप पाठक, हरभजन सिंह, स्वाति मालीवाल, राजिंदर गुप्ता और विक्रम साहनी ने AAP छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया था। इन सात सांसदों के जाने के बाद राज्यसभा में AAP की संख्या घटकर तीन रह गई।
इन सात सांसदों का पार्टी छोड़ना इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि वे राज्यसभा में AAP के 10 सदस्यीय दल के दो-तिहाई से अधिक हिस्से का प्रतिनिधित्व करते थे। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इसी वजह से वे दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता से बच गए।
इस घटनाक्रम ने AAP के सामने राज्यसभा में अपने प्रतिनिधित्व और पार्टी के भीतर नेतृत्व एवं उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए।
‘उन्होंने पार्टी को धोखा दिया’
केजरीवाल ने पार्टी छोड़ने वाले सांसदों पर सीधा हमला करते हुए कहा कि उन्हें राज्यसभा भेजने का फैसला पार्टी ने किया था, जनता ने सीधे तौर पर उन्हें नहीं चुना था। उन्होंने इसे AAP के लिए बेहद दुखद घटना बताया।
हालांकि, केजरीवाल ने यह भी कहा कि पार्टी ने अपने किसी नेता के साथ धोखा नहीं किया है। उनके मुताबिक, राज्यसभा में हुए घटनाक्रम से AAP को भविष्य के लिए सबक लेना चाहिए।
उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि आगे से राज्यसभा के उम्मीदवारों का चयन करते समय पार्टी व्यक्ति की राजनीतिक निष्ठा और विश्वसनीयता को ज्यादा गंभीरता से परखेगी।
उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया पर फोकस
केजरीवाल के बयान से संकेत मिलता है कि AAP अब राज्यसभा उम्मीदवारों को लेकर अपनी रणनीति में बदलाव कर सकती है। पार्टी के लिए यह अनुभव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्यसभा के सदस्य लंबे समय तक उच्च सदन में पार्टी का प्रतिनिधित्व करते हैं और कई महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दों पर पार्टी की आवाज बनते हैं।
सात सांसदों के एक साथ बीजेपी में जाने के बाद पार्टी को न सिर्फ संख्यात्मक नुकसान हुआ, बल्कि उसके राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर भी असर पड़ा। ऐसे में केजरीवाल का “100 बार ठोक-बजाकर” उम्मीदवार चुनने वाला बयान भविष्य में राज्यसभा टिकट वितरण में ज्यादा कड़े मानदंड अपनाने की ओर इशारा करता है।
क्या बदल सकती है AAP की रणनीति?
केजरीवाल के बयान को AAP के लिए संगठनात्मक आत्ममंथन के संकेत के तौर पर भी देखा जा सकता है। पार्टी ने जहां अपने पुराने निर्वाचित प्रतिनिधियों की निष्ठा को उदाहरण के तौर पर सामने रखा, वहीं राज्यसभा सांसदों के पार्टी छोड़ने को चयन प्रक्रिया से जुड़ी कमजोरी के रूप में स्वीकार किया।
अब देखने वाली बात होगी कि आने वाले समय में AAP राज्यसभा उम्मीदवारों के चयन के लिए कौन से मानदंड तय करती है और क्या पार्टी के भीतर जिम्मेदारियां देने से पहले नेताओं की राजनीतिक पृष्ठभूमि, विचारधारा और संगठन के प्रति प्रतिबद्धता को लेकर नई व्यवस्था बनाई जाती है।
फिलहाल केजरीवाल का संदेश साफ है—राज्यसभा में दोबारा ऐसा झटका न लगे, इसके लिए उम्मीदवार चुनने में पार्टी पहले से ज्यादा सतर्क रहेगी।