Punjab Polls 2027: पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी ने अपनी चुनावी रणनीति को लेकर तैयारियां तेज कर दी हैं। पार्टी की योजना राज्य में अपराध, भ्रष्टाचार और नशे को प्रमुख मुद्दा बनाने की है। इसके साथ ही बीजेपी अनुसूचित जाति (SC) मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाने और युवाओं से जुड़े सवालों को अभियान के केंद्र में रखने की तैयारी में है।

पार्टी की रणनीति को मोटे तौर पर ‘3C’ यानी Crime, Corruption और Chitta के इर्द-गिर्द देखा जा रहा है। इसके साथ जातीय समीकरण को भी महत्व दिया जा रहा है। पंजाब में 30 फीसदी से ज्यादा SC आबादी होने के कारण बीजेपी इसे चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा मान रही है।

‘3C’ के साथ जातीय समीकरण पर बीजेपी का फोकस

बीजेपी से जुड़े एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक, पंजाब में चुनावी अभियान के दौरान अपराध, भ्रष्टाचार और चिट्टा यानी ड्रग्स के मुद्दे प्रमुख रहेंगे। पार्टी का मानना है कि इन मुद्दों को उठाकर वह सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के साथ कांग्रेस को भी घेर सकती है।

पार्टी का तर्क है कि पंजाब में नशे की समस्या केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर युवाओं और परिवारों पर पड़ता है। इसी तरह भ्रष्टाचार और अपराध को लेकर भी बीजेपी सरकार पर सवाल खड़े करने की तैयारी में है।

लेकिन इस बार बीजेपी अपने अभियान को केवल इन मुद्दों तक सीमित नहीं रखना चाहती। राज्य की सामाजिक संरचना को देखते हुए पार्टी जाति के मुद्दे पर भी ज्यादा ध्यान दे सकती है। SC समुदाय पंजाब के कुल मतदाताओं का बड़ा हिस्सा है और ऐसे में बीजेपी इस वर्ग के बीच अपना आधार मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

युवाओं को अभियान के केंद्र में लाने की तैयारी

पंजाब की राजनीति में युवा मतदाता बीजेपी की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकते हैं। पार्टी नशे के साथ बेरोजगारी और रोजगार के सीमित अवसरों को भी चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में है।

इसके अलावा कानून-व्यवस्था को लेकर भी बीजेपी सरकार पर निशाना साध सकती है। पार्टी से जुड़े सूत्रों के अनुसार, जबरन वसूली की कथित घटनाओं को भी अभियान में प्रमुखता दी जा सकती है।

बीजेपी का प्रयास यह संदेश देने का है कि नशे और अपराध की समस्या का असर पंजाब के सामाजिक और आर्थिक भविष्य पर पड़ रहा है। हालांकि, इन मुद्दों पर पार्टी द्वारा लगाए जाने वाले आरोपों को चुनावी राजनीतिक दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

संत रविदास की विरासत के जरिए दलित संपर्क

बीजेपी पंजाब में अनुसूचित जाति समुदाय तक पहुंच बनाने के लिए संत रविदास की विरासत को भी अपने जनसंपर्क अभियान से जोड़ने की तैयारी में है।

पार्टी नेताओं के अनुसार, संत रविदास से जुड़ा राष्ट्रीय स्तर का जनसंपर्क अभियान पंजाब की चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है। बीजेपी का प्रयास सामाजिक और धार्मिक प्रतीकों के जरिए अलग-अलग समुदायों तक अपनी राजनीतिक पहुंच बढ़ाने का है।

पार्टी को उम्मीद है कि नशे, भ्रष्टाचार और रोजगार जैसे मुद्दों के साथ सामाजिक प्रतिनिधित्व का सवाल जोड़कर वह अपने चुनावी आधार का विस्तार कर सकती है।

1984 के सिख विरोधी दंगों का मुद्दा फिर उठाने की तैयारी

पंजाब चुनाव में बीजेपी कांग्रेस के खिलाफ 1984 के सिख विरोधी दंगों का मुद्दा भी फिर से उठा सकती है। पार्टी के नेताओं का कहना है कि इस मुद्दे से जुड़े पुराने सवालों को चुनावी बहस में लाया जाएगा।

बीजेपी विशेष रूप से कांग्रेस के पूर्व नेता सज्जन कुमार से जुड़े राजनीतिक संदर्भों का इस्तेमाल कांग्रेस को घेरने के लिए कर सकती है। पार्टी का मानना है कि 1984 के दंगों से जुड़ा मुद्दा पंजाब की राजनीति में अब भी संवेदनशील है और इसके जरिए कांग्रेस पर दबाव बनाया जा सकता है।

AAP और खालिस्तान के मुद्दे पर हमला

बीजेपी पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार को खालिस्तान समर्थक तत्वों से कथित संबंध और कानून-व्यवस्था के सवाल पर भी घेरने की तैयारी में है।

बीजेपी के नेताओं का आरोप है कि AAP सरकार को खालिस्तान समर्थक गतिविधियों को लेकर अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए। इसके साथ ही राज्य में जबरन वसूली और अपराध की कथित घटनाओं को लेकर भी पार्टी सरकार पर निशाना साध सकती है।

इन आरोपों के जवाब में AAP की ओर से क्या रणनीति अपनाई जाएगी, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा। फिलहाल बीजेपी अपने संभावित चुनावी मुद्दों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में है।

दिवाली के आसपास शुरू हो सकता है औपचारिक अभियान

पार्टी सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी का औपचारिक पंजाब चुनाव अभियान दिवाली के आसपास शुरू किए जाने की संभावना है। इससे पहले पार्टी राज्य में अलग-अलग मुद्दों पर जनसंपर्क और संगठनात्मक गतिविधियों को बढ़ाने की तैयारी कर रही है।

इसके साथ केंद्र सरकार के ‘नशा मुक्त भारत’ अभियान से जुड़े राज्यव्यापी कार्यक्रमों को भी पंजाब की राजनीतिक रणनीति से जोड़ा जा सकता है। 18 से 30 सितंबर के बीच प्रस्तावित कार्यक्रमों में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

इस तरह बीजेपी नशे के मुद्दे को सिर्फ चुनावी भाषणों तक सीमित रखने के बजाय उसे व्यापक जनसंपर्क अभियान का रूप देने की कोशिश कर रही है।

पंजाब में बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती

बीजेपी की रणनीति जितनी आक्रामक नजर आ रही है, राज्य में पार्टी का मौजूदा चुनावी आधार उतना मजबूत नहीं है। 2022 के विधानसभा चुनाव में AAP ने 117 में से 92 सीटों पर जीत दर्ज की थी। कांग्रेस को 18 सीटें मिली थीं, जबकि SAD के खाते में तीन और बीजेपी के खाते में सिर्फ दो सीटें आई थीं।

2017 में कांग्रेस ने 77 सीटों के साथ सरकार बनाई थी। उस चुनाव में AAP को 20, SAD को 15 और बीजेपी को तीन सीटें मिली थीं।

इस लिहाज से बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने मौजूदा सीमित विधानसभा आधार को बढ़ाना है। पार्टी को इसके लिए नए सामाजिक समूहों और क्षेत्रीय मतदाताओं तक पहुंच बनानी होगी।

SAD के साथ गठबंधन पर टिकी नजर

बीजेपी की चुनावी रणनीति का सबसे दिलचस्प पहलू शिरोमणि अकाली दल के साथ संभावित गठबंधन है। 2022 में दोनों दल अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरे थे। इससे पहले 2020 में कृषि कानूनों को लेकर SAD ने NDA से नाता तोड़ लिया था। बाद में केंद्र ने तीनों कृषि कानून वापस ले लिए थे।

अब दोनों पुराने सहयोगियों के बीच दोबारा नजदीकी की अटकलें तेज हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और SAD अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल की मुलाकात के बाद गठबंधन की चर्चा को और बल मिला है।

बीजेपी सूत्रों के मुताबिक, पार्टी अपनी चुनावी रणनीति तैयार करते समय SAD के साथ संभावित गठबंधन को भी ध्यान में रख रही है। सूत्रों का दावा है कि गठबंधन को लेकर तस्वीर सितंबर के अंत तक स्पष्ट हो सकती है।

SAD के साथ गठबंधन में क्या है बीजेपी का गणित?

पंजाब में SAD का पारंपरिक आधार बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। अकाली दल को पंथिक मतदाताओं के एक हिस्से का समर्थन मिलता रहा है। ऐसे में बीजेपी के लिए SAD के साथ गठबंधन का मतलब उन मतदाताओं तक पहुंच आसान होना हो सकता है, जहां पार्टी का अपना संगठनात्मक आधार सीमित है।

दूसरी तरफ, बीजेपी को गठबंधन की स्थिति में अपनी राजनीतिक पहचान और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर स्पष्ट रुख बनाए रखना होगा। पार्टी के भीतर यह चिंता भी बताई जा रही है कि खालिस्तान समर्थक विचारधारा के प्रति किसी भी तरह की सहानुभूति की धारणा और अमृतपाल सिंह की पार्टी अकाली दल वारिस पंजाब दे की बढ़ती लोकप्रियता के बीच संतुलन बनाना जरूरी होगा।

यानी बीजेपी के सामने दोहरी चुनौती है—एक तरफ उसे पंजाब में अपना आधार बढ़ाना है और दूसरी तरफ संभावित सहयोगी SAD के पारंपरिक वोट बैंक को अपने व्यापक चुनावी गठजोड़ में जोड़ना है।

2027 के चुनाव के लिए बड़ी राजनीतिक लड़ाई

पंजाब में 2027 का विधानसभा चुनाव AAP सरकार के प्रदर्शन के साथ-साथ कांग्रेस, बीजेपी और SAD की रणनीतियों की भी परीक्षा होगा। बीजेपी ने फिलहाल अपराध, भ्रष्टाचार और ड्रग्स को अपने अभियान का आधार बनाने के संकेत दिए हैं। जातीय समीकरण, युवा मतदाता और संत रविदास की विरासत के जरिए सामाजिक पहुंच बढ़ाने की कोशिश भी इसी रणनीति का हिस्सा है।

अगर SAD के साथ गठबंधन पर सहमति बनती है तो बीजेपी की चुनावी रणनीति का स्वरूप और बदल सकता है। ऐसे में सीट बंटवारे से लेकर पंथिक वोटों और शहरी मतदाताओं के बीच संतुलन तक कई सवाल महत्वपूर्ण होंगे।

फिलहाल बीजेपी जिस तरह अपने मुद्दों को तैयार कर रही है, उससे संकेत मिलता है कि पंजाब में 2027 का चुनाव केवल सत्ता के प्रदर्शन पर नहीं, बल्कि नशा, कानून-व्यवस्था, सामाजिक समीकरण और गठबंधन की राजनीति पर भी लड़ा जाएगा।