पंजाब की राजनीति में फिर गर्माया SAD-BJP गठबंधन का मुद्दा, भगवंत मान ने साधा निशाना

By  Laxman June 11th 2026 12:39 PM

पंजाब की राजनीति में एक बार फिर शिरोमणि अकाली दल (SAD) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के संभावित गठबंधन को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। मुख्यमंत्री भगवंत मान के हालिया बयान ने इस बहस को नया आयाम दे दिया है। उन्होंने दोनों दलों के फिर से साथ आने की अटकलों पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे जनता के हित से ज्यादा सत्ता में वापसी की राजनीतिक रणनीति बताया है।

पंजाब के मालेरकोटला जिले में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कहा कि यदि अकाली दल और भाजपा दोबारा गठबंधन करते हैं, तो उसका उद्देश्य राज्य के विकास से अधिक राजनीतिक लाभ हासिल करना होगा। उन्होंने आरोप लगाया कि दोनों दल लंबे समय तक एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी करते रहे हैं और अब अगर वे साथ आते हैं तो यह केवल सत्ता की राजनीति का हिस्सा माना जाएगा।

क्यों तेज हुई गठबंधन की चर्चा?

हाल के दिनों में पंजाब के राजनीतिक गलियारों में अकाली दल और भाजपा के बीच फिर से नजदीकियां बढ़ने की अटकलें लगाई जा रही हैं। हालांकि दोनों दलों ने सार्वजनिक रूप से किसी भी औपचारिक बातचीत से इनकार किया है, लेकिन कुछ नेताओं के बयानों और राजनीतिक गतिविधियों ने इस चर्चा को हवा दी है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंजाब में बदलते चुनावी समीकरणों को देखते हुए दोनों दल भविष्य की संभावनाओं पर विचार कर सकते हैं। अकाली दल का ग्रामीण क्षेत्रों, विशेषकर मालवा बेल्ट में प्रभाव माना जाता है, जबकि भाजपा शहरी और व्यापारी वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

भगवंत मान का तीखा हमला

मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कहा कि पंजाब की जनता अब पुरानी राजनीतिक शैली को समझ चुकी है। उन्होंने दावा किया कि राज्य के लोगों ने पारंपरिक राजनीतिक दलों को कई अवसर दिए, लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं मिले।

मान के अनुसार, यदि भाजपा और अकाली दल फिर से साथ आते हैं तो यह उनकी मजबूरी और राजनीतिक अस्तित्व बचाने की कोशिश के रूप में देखा जाएगा। उन्होंने कहा कि पंजाब के लोग अब विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मुद्दों पर राजनीति चाहते हैं, न कि केवल सत्ता के लिए गठबंधन।

अकाली दल ने क्या कहा?

शिरोमणि अकाली दल के नेताओं ने गठबंधन की अटकलों को ज्यादा महत्व देने से इनकार किया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि फिलहाल उनका पूरा ध्यान संगठन को मजबूत करने और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने पर है।

हालांकि राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि यदि चुनावी परिस्थितियां अनुकूल रहीं तो भविष्य में किसी प्रकार का राजनीतिक समझौता संभव हो सकता है। पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने अनौपचारिक बातचीत में यह संकेत दिया है कि राजनीति में संभावनाओं के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं होते।

भाजपा का रुख

भाजपा नेतृत्व भी फिलहाल सार्वजनिक रूप से अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी की बात कर रहा है। पार्टी नेताओं का कहना है कि संगठन राज्य की सभी सीटों पर अपनी उपस्थिति मजबूत करने में जुटा है। हालांकि उन्होंने भविष्य के राजनीतिक विकल्पों को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया है।

यही वजह है कि गठबंधन को लेकर अटकलें लगातार बनी हुई हैं।

2020 में टूटा था पुराना गठबंधन

अकाली दल और भाजपा का गठबंधन पंजाब की राजनीति में लंबे समय तक प्रभावशाली रहा। दोनों दलों ने कई चुनाव मिलकर लड़े और सरकार भी बनाई। लेकिन 2020 में कृषि कानूनों को लेकर हुए विवाद और किसान आंदोलन के दौरान दोनों दलों के रास्ते अलग हो गए।

इसके बाद हुए चुनावों में दोनों पार्टियों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बदलते हालात में दोनों दल अपने पुराने समीकरणों पर दोबारा विचार कर सकते हैं।

आगे क्या?

फिलहाल गठबंधन को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक बयान और गतिविधियां इस विषय को चर्चा के केंद्र में बनाए हुए हैं। आने वाले महीनों में पंजाब की राजनीति किस दिशा में जाएगी, यह काफी हद तक इसी बात पर निर्भर करेगा कि भाजपा और अकाली दल अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर क्या फैसला लेते हैं।

वहीं मुख्यमंत्री भगवंत मान इस संभावित गठबंधन को विपक्ष की मजबूरी और सत्ता में वापसी की रणनीति बताकर राजनीतिक बढ़त लेने की कोशिश कर रहे हैं।

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