उन्नाव कस्टोडियल डेथ केस: हाई कोर्ट में सेंगर की अपील पर मई में सुनवाई...

By  Preeti Kamal April 27th 2026 03:40 PM -- Updated: April 27th 2026 02:41 PM

नई दिल्ली, भारत: दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार को उन्नाव रेप पीड़िता के पिता की कस्टोडियल डेथ (हिरासत में मौत) मामले में दोषसिद्धि के खिलाफ दायर अपील को अगले महीने के लिए सूचीबद्ध किया। पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर और अन्य ने अपनी सजा को चुनौती दी है। सेंगर इस मामले में 10 साल की सजा काट रहे हैं।

न्यायमूर्ति स्वर्णा कांता शर्मा ने मामले को 15, 18, 19 और 20 मई को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। सेंगर और अन्य ने 4 मार्च 2020 के दोषसिद्धि के फैसले और 13 मार्च 2020 के सजा आदेश को चुनौती दी है, जो तीस हजारी कोर्ट के जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा CBI FIR में पारित किया गया था। यह मामला मूल रूप से उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में दर्ज हुआ था।

कोर्ट ने सजा बढ़ाने की अपील निरस्त की

इससे पहले, 20 अप्रैल को हाई कोर्ट ने उन्नाव रेप पीड़िता द्वारा दायर सजा बढ़ाने की अपील को 1,945 दिनों की देरी के आधार पर खारिज कर दिया था।न्यायमूर्ति नवीन चावला की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच ने देरी माफी (कंडोनेशन ऑफ डिले) की याचिका को खारिज करते हुए सजा बढ़ाने की अपील भी निरस्त कर दी।

अपीलकर्ता देरी के लिए पर्याप्त कारण देने में असमर्थ- कोर्ट

हाई कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता देरी के लिए कोई 'पर्याप्त कारण' स्थापित करने में विफल रही। अदालत ने टिप्पणी की, “देरी अत्यधिक, अस्पष्ट और लापरवाही के कारण है, इसलिए आवेदन खारिज किया जाता है।” बेंच ने यह भी कहा, “यह मामला असमर्थता का नहीं, बल्कि जानबूझकर निष्क्रियता और लापरवाही का है। ऐसे में अपीलकर्ता देरी माफी जैसी राहत पाने की हकदार नहीं है।”

पीड़िता ने दोषियों की सजा बढ़ाने की मांग की थी

अदालत ने कहा कि इस स्थिति में विवेकाधीन शक्ति का उपयोग करना कानून के उद्देश्य को कमजोर करेगा। अदालत ने यह भी नोट किया कि अपीलकर्ता को फैसले की पूरी जानकारी होने के बावजूद उसने निर्धारित समय सीमा में कानूनी उपाय नहीं अपनाया। उन्नाव रेप पीड़िता ने अपनी अपील में इस मामले को हत्या (धारा 302 IPC) में बदलने और सजा बढ़ाने की मांग की थी। उन्होंने दोषियों के लिए मृत्युदंड या कम से कम आजीवन कारावास की मांग की।

पीड़िता लगातार खतरे में है- वकील महमूद प्राचा

अपीलकर्ता की ओर से वकील महमूद प्राचा ने दलील दी कि देरी जानबूझकर नहीं थी और न ही किसी दुर्भावना के कारण हुई। उन्होंने कहा कि पीड़िता लगातार खतरे में है और उसकी स्थिति को देखते हुए इतनी सतर्कता की अपेक्षा नहीं की जा सकती। वहीं, सेंगर की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रमोद कुमार दुबे पेश हुए, जबकि जयदीप सेंगर की ओर से अधिवक्ता SPM त्रिपाठी ने पैरवी की।

पीड़िता को मुआवजे के रूप में दी गई राशि

अधिवक्ता कन्हैया सिंघल ने तर्क दिया कि पीड़िता को मुआवजे के रूप में पहले ही 10 लाख रुपये आरोपियों द्वारा और 25 लाख रुपये उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दिए जा चुके हैं, इसलिए आर्थिक तंगी का तर्क टिकाऊ नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि देरी माफी पर विचार करते समय मामले के गुण-दोष (मेरिट) का कोई महत्व नहीं होता, बल्कि देरी के कारणों की पर्याप्तता ही निर्णायक होती है।

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