नई दिल्ली: देश की सड़कों पर एक बार फिर ट्रैक्टर उतर आए हैं। बाइक रैलियां निकल रही हैं। और पंजाब से हरियाणा, उत्तर प्रदेश से राजस्थान और उत्तराखंड तक एक ही नारा गूंज रहा है- “अमेरिका के साथ होने वाला व्यापार समझौता रद्द करो।”
भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर किसानों का विरोध अब किसी एक राज्य तक सीमित नहीं रहा। यह देशभर में फैल चुका है, और अब इसे एक बड़ी निर्णायक तारीख भी मिल गई है। संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) ने 22 जुलाई 2026 को देशव्यापी विरोध प्रदर्शन का ऐलान किया है। अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) ने 13 जुलाई को जारी बयान में सभी किसान संगठनों से इस प्रदर्शन में शामिल होने की अपील की है। किसान संगठनों का दावा है कि अंतिम समझौता जुलाई के आखिरी हफ्ते में हो सकता है और इसी आशंका ने आंदोलन को नई धार दे दी है।
समझौता अभी कहां तक पहुंचा?
सबसे पहले ताज़ा स्थिति। वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल के मुताबिक, दोनों देशों के बीच व्यापक ढांचा (framework) तय हो चुका है, और अब बातचीत नई शुल्क व्यवस्था (tariff structure) पर केंद्रित है। यानी, फ्रेमवर्क तैयार है, लेकिन समझौता अभी तक हस्ताक्षरित नहीं हुआ है।
सबसे अहम तारीख है 24 जुलाई। अमेरिका द्वारा भारतीय सामानों पर लगाई गई 10 प्रतिशत की अस्थायी शुल्क व्यवस्था इसी दिन समाप्त हो रही है। अग्रवाल का कहना है कि इसके बाद क्या होगा, यह फैसला अमेरिकी सरकार को करना है।
इससे पहले फरवरी में अमेरिका ने भारतीय आयात पर लगे शुल्क को 50 प्रतिशत से घटाकर पहले 25 और फिर 18 प्रतिशत तक ला दिया था। इसे शुरुआत में एक बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक उपलब्धि की तरह पेश किया गया। लेकिन ठीक इसी अनिश्चितता, कि पूरा मसौदा अब तक सार्वजनिक नहीं हुआ, ने किसानों की आशंका को और गहरा कर दिया है।

किसानों का विरोध: कहां-कहां और कितना तेज?
पंजाब में विरोध सबसे तेज दिखाई दे रहा है। 'देश बचाओ मोर्चा' के बैनर तले किसान मज़दूर मोर्चा, संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक), आज़ाद किसान मोर्चा, भारतीय किसान मज़दूर संघर्ष कमेटी और बीकेयू (मानसा) समेत कई संगठनों ने बुधवार को राज्यभर में बाइक रैलियां निकालीं। अमृतसर, दसूहा और कई इलाकों में किसानों ने रैलियां निकालकर प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपे और समझौते को तुरंत रद्द करने की मांग की।
किसान नेताओं का कहना है कि यह समझौता सिर्फ कुछ उत्पादों के आयात-निर्यात तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कृषि, डेयरी, डिजिटल व्यापार, सेवाएं, बौद्धिक संपदा अधिकार, ऊर्जा और निवेश जैसे कई अहम क्षेत्र शामिल हो सकते हैं।
विरोध की आंच उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और उत्तराखंड तक भी पहुंच चुकी है। मुज़फ्फरनगर, मेरठ, बुलंदशहर, बागपत, सिरसा, श्रीगंगानगर और देहरादून जैसे इलाकों में भी किसान संगठनों ने रैलियां और प्रदर्शन किए हैं।
पंजाब में इस विरोध के साथ एक और मुद्दा भी जुड़ता दिख रहा है, लैंड पूलिंग नीति। किसान संगठनों का आरोप है कि एक तरफ व्यापार समझौते के जरिए खेती पर दबाव बढ़ सकता है, वहीं दूसरी तरफ भूमि पूलिंग नीति उनकी जमीन को लेकर नई चिंताएं पैदा कर रही है। किसानों का कहना है कि उनकी लड़ाई अब दो मोर्चों पर है, खेती बचाने की और जमीन बचाने की।

आखिर किसानों का डर क्या है?
किसानों की चिंता साफ है। अगर इस समझौते के तहत कृषि और डेयरी बाज़ार खोले जाते हैं, तो अमेरिका के सस्ते और भारी सब्सिडी वाले कृषि उत्पाद भारतीय बाज़ार में बड़ी मात्रा में आ सकते हैं। भारत में करीब 86 प्रतिशत किसान छोटे और सीमांत हैं, जिनके पास दो हेक्टेयर से भी कम जमीन है। दूसरी तरफ अमेरिका में खेती बड़े पैमाने पर, आधुनिक मशीनों और भारी सरकारी सब्सिडी के सहारे होती है। किसानों को डर है कि इस असमान प्रतिस्पर्धा में भारतीय किसान टिक नहीं पाएंगे।
किसान संगठनों का दावा है कि अगर अमेरिकी मक्का, सोयाबीन, कपास, डेयरी उत्पाद और अन्य कृषि सामान कम कीमत पर भारतीय बाज़ार में आने लगे, तो भारतीय किसानों को उनकी फसलों का उचित दाम मिलना मुश्किल हो जाएगा।
राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने किसानों से संगठित और तैयार रहने की अपील की है। वहीं किसान नेता जोगिंदर सिंह उगराहां और संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक) के संयोजक जगजीत सिंह डल्लेवाल भी चेता चुके हैं कि यह लड़ाई सिर्फ ट्रेड डील तक सीमित नहीं, बल्कि किसानों के अधिकारों और जमीन के भविष्य से जुड़ी है।

सरकार का पक्ष: “कृषि पूरी तरह सुरक्षित”
भारत और अमेरिका पिछले कई महीनों से एक व्यापक व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे हैं। दोनों देशों का लक्ष्य द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाकर लगभग 500 अरब डॉलर तक पहुंचाना है। सरकार इस समझौते के पीछे मुख्य रूप से तीन वजहें गिनाती है। पहला, अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाज़ार है, और भारी शुल्कों से बचना कपड़ा, रत्न-आभूषण, दवा और सी-फूड जैसे उद्योगों के लिए ज़रूरी है, जिनसे लाखों लोगों की आजीविका जुड़ी है।
दूसरा, 24 जुलाई को अस्थायी शुल्क व्यवस्था की समयसीमा खत्म हो रही है, और अगर तब तक ठोस समझौता नहीं होता तो नए शुल्कों का खतरा बना रहेगा। तीसरा, सरकार का मानना है कि एक मज़बूत समझौता भारत को चीन जैसे प्रतिस्पर्धियों पर बढ़त दिला सकता है।
वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल संसद में कह चुके हैं कि चावल, गेहूं, डेयरी, पोल्ट्री और ज़्यादातर फल-सब्ज़ियां इस समझौते के दायरे से बाहर हैं, और भारत ने अपने संवेदनशील क्षेत्रों की पूरी हिफ़ाज़त की है। सरकार का दावा है कि किसानों में फैलाई जा रही आशंकाएं बेबुनियाद हैं। हरियाणा के कृषि मंत्री श्याम सिंह राणा समेत कई नेता इस पक्ष को दोहरा चुके हैं। हालांकि समझौते का पूरा और आधिकारिक मसौदा अब तक सार्वजनिक नहीं हुआ है।

कपास पर विवाद: यहीं से जड़ें गहरी हुईं
सबसे बड़ा विवाद तब खड़ा हुआ जब खुद वाणिज्य मंत्री गोयल ने कहा कि भारत अमेरिका से बिना शुल्क कच्चा कपास आयात कर सकेगा, जिससे उस कपास से बने कपड़ा उत्पादों को अमेरिका में शून्य प्रतिशत शुल्क पर निर्यात की सुविधा मिलेगी। किसान संगठनों ने इसे तुरंत इस बात का सबूत बताया कि कृषि क्षेत्र वाकई इस समझौते से अछूता नहीं है।
अखिल भारतीय किसान सभा के मुताबिक, अमेरिका में कपास किसानों को भारी सब्सिडी मिलती है, और सस्ता अमेरिकी कपास पहले से आर्थिक तंगी से जूझ रहे महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना और मध्य प्रदेश के कपास किसानों की हालत और बिगाड़ सकता है, जहां किसान आत्महत्या के मामले पहले से चिंताजनक हैं।
आंकड़े भी इस चिंता को बल देते हैं। भारत ने 30 सितंबर से 31 दिसंबर 2025 तक कपास पर आयात शुल्क शून्य कर दिया था। इसी अवधि में अमेरिका से भारत को होने वाला कपास निर्यात करीब 95 प्रतिशत बढ़ गया।
यूके एफटीए और दूसरे समझौते भी निशाने पर
किसान संगठनों का विरोध सिर्फ भारत-अमेरिका डील तक सीमित नहीं है। भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौता (FTA) 15 जुलाई से प्रभावी हो चुका है, और किसान संगठन भारत-यूरोपीय संघ, भारत-न्यूज़ीलैंड और भारत-ऑस्ट्रेलिया जैसे समझौतों को भी किसान-विरोधी बता रहे हैं। उनकी मांग में स्वामीनाथन फॉर्मूले (C2 50%) पर आधारित एमएसपी की कानूनी गारंटी और व्यापक कर्ज़ माफी भी शामिल है।

असर किस पर पड़ेगा?
किसी भी बड़े व्यापार समझौते का असर सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं रहता, वह सीधे खेतों, बाज़ारों और आम लोगों की जेब तक पहुंचता है। सरकार का मानना है कि इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को नई गति मिल सकती है, निर्यात बढ़ सकता है, निवेश आ सकता है और भारत वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी स्थिति मज़बूत कर सकता है। कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि आयात बढ़ने पर कुछ कृषि उत्पाद उपभोक्ताओं को सस्ते मिल सकते हैं।
लेकिन किसानों का तर्क है कि अगर घरेलू खेती कमजोर होती है, तो लंबे समय में इसका असर खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। यही वजह है कि किसान संगठन इसे सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि अपनी आजीविका, जमीन और भविष्य का सवाल मान रहे हैं।
असली मुद्दा - व्यापार नहीं, भरोसा
इस पूरी बहस का एक और गहरा पहलू है। आखिर ऐसा क्यों है कि जब भी खेती से जुड़ा कोई बड़ा फैसला होता है, किसानों में सबसे पहले अविश्वास पैदा होता है? इसका जवाब पिछले कुछ वर्षों की घटनाओं में छिपा है।
साल 2020 में जब तीन कृषि कानून लाए गए थे, तब भी सरकार ने कहा था कि ये किसानों के हित में हैं। लेकिन बड़ी संख्या में किसानों को डर था कि इससे मंडी व्यवस्था कमजोर होगी, एमएसपी पर असर पड़ेगा और बड़ी कंपनियों का प्रभाव बढ़ेगा। एक साल से ज्यादा चले आंदोलन के बाद नवंबर 2021 में सरकार को तीनों कानून वापस लेने पड़े।

किसानों का कहना है कि उस आंदोलन के दौरान किए गए कई वादे, खासकर एमएसपी की कानूनी गारंटी, आज भी पूरी तरह हल नहीं हुए। यही वजह है कि आज जब सरकार कहती है कि कृषि और डेयरी क्षेत्र पूरी तरह सुरक्षित हैं, तो किसान केवल मौखिक आश्वासन पर भरोसा करने को तैयार नहीं हैं। किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी समेत कई नेता यही मांग दोहरा रहे हैं, अगर कृषि क्षेत्र सुरक्षित है, तो इसे लिखित रूप में सार्वजनिक किया जाए और समझौते का पूरा मसौदा सामने लाया जाए।
आगे क्या?
फिलहाल यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि अंतिम समझौते में क्या शामिल होगा और क्या नहीं। लेकिन इतना तय है कि 24 जुलाई की समयसीमा और 22 जुलाई का देशव्यापी प्रदर्शन, दोनों मिलकर आने वाले दिनों को निर्णायक बना रहे हैं।
यह बहस अब सिर्फ भारत-अमेरिका ट्रेड डील की नहीं रह गई है। यह सवाल अब भारत के विकास मॉडल, किसानों की सुरक्षा और आर्थिक वैश्वीकरण के बीच संतुलन का बन चुका है। और शायद आने वाले दिनों का सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा, क्या भारत दुनिया के लिए अपने बाज़ार खोलते हुए अपने किसानों का भरोसा भी बनाए रख पाएगा?
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