महिलाओं के सम्मान से लेकर वर्ण व्यवस्था तक, NCERT की किताब में क्या है नया?
NCERT की पुस्तक के अनुसार, चार वर्णों की अवधारणा प्रारंभ में कार्य और मूल्यों पर आधारित थी, न कि कठोर सामाजिक विभाजन पर। इसमें ज्ञान को सर्वोच्च स्थान दिया गया, उसके बाद राजनीतिक शक्ति और फिर संपत्ति को महत्व दिया गया। पुस्तक में बौद्ध ग्रंथ सुत्त निपात का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें कहा गया है कि व्यक्ति की पहचान जन्म से नहीं बल्कि उसके कर्मों से होती है।
नई दिल्ली: राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की नई कक्षा 9 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में वैदिक काल में महिलाओं के सम्मान और उनकी सामाजिक स्थिति का उल्लेख करते हुए मनुस्मृति के एक श्लोक को शामिल किया गया है। हालांकि पुस्तक में यह भी स्पष्ट किया गया है कि समय के साथ महिलाओं की स्थिति में उतार-चढ़ाव आया और कई चरणों में उसमें गिरावट भी दर्ज की गई।
'1000 ईस्वी तक राज्य और समाज' शीर्षक वाले अध्याय में कहा गया है कि वैदिक काल को अक्सर ऐसा समय माना जाता है, जब महिलाओं को समाज में सम्मानजनक और महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। पुस्तक के अनुसार, उस समय महिलाएं विद्या अध्ययन करती थीं, कुछ धार्मिक अनुष्ठानों में पुरुषों के साथ भाग लेती थीं, सार्वजनिक सभाओं में शामिल होती थीं तथा ऋग्वेद के कई सूक्तों की रचना अपाला, विश्ववारा, घोषा और लोपामुद्रा जैसी महिला ऋषियों द्वारा की गई मानी जाती है।
'जहाँ महिलाओं का सम्मान होता है, वहाँ देवता प्रसन्न होते हैं'
इसके बाद पुस्तक में मनुस्मृति का उल्लेख करते हुए लिखा गया है कि वैदिक काल के बाद भी महिलाओं के सम्मान की परंपरा विभिन्न ग्रंथों में दिखाई देती है। इसी संदर्भ में मनुस्मृति (अध्याय 3, श्लोक 56) का उल्लेख किया गया है, जिसमें कहा गया है— "जहाँ महिलाओं का सम्मान होता है, वहाँ देवता प्रसन्न होते हैं और जहाँ उनका सम्मान नहीं होता, वहाँ सभी धार्मिक कर्म निष्फल हो जाते हैं।"
हालांकि, इस उद्धरण के तुरंत बाद पाठ्यपुस्तक यह भी स्पष्ट करती है कि महिलाओं की स्थिति हमेशा समान नहीं रही। पुस्तक में कहा गया है कि समय के साथ सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव के कारण महिलाओं की भूमिका और सामाजिक स्थिति में परिवर्तन आया तथा कई मामलों में उसमें गिरावट भी देखी गई। इसके बावजूद महिलाओं ने गृह प्रबंधन, कृषि, हस्तशिल्प और धार्मिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण योगदान देना जारी रखा।
साहित्य में शिक्षित और कला में दक्ष महिलाओं का वर्णन है
अध्याय में गुप्त-वाकाटक काल का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि उस समय साहित्य में शिक्षित और कला में दक्ष महिलाओं का वर्णन मिलता है। वहीं, वाकाटक साम्राज्य की शासक प्रभावती गुप्ता जैसी महिलाओं के प्रशासनिक योगदान का भी उल्लेख किया गया है। इसके अलावा संगम साहित्य में भी महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक भागीदारी का जिक्र किया गया है।
इसी अध्याय में वर्ण और जाति व्यवस्था पर भी चर्चा की गई है। पुस्तक के अनुसार, प्रारंभिक वैदिक समाज में सामाजिक पहचान केवल जन्म के आधार पर तय नहीं होती थी, बल्कि भाषा, क्षेत्र, व्यवसाय, सांस्कृतिक संबंध और समुदाय जैसे कई कारकों से निर्धारित होती थी। इस संदर्भ में ऋग्वेद का उदाहरण देते हुए पुस्तक में उल्लेख है कि एक ही परिवार में अलग-अलग व्यवसाय होते थे। एक सूक्त में कहा गया है— "मैं कवि हूँ, मेरे पिता वैद्य हैं और मेरी माता अनाज पीसने का कार्य करती हैं।"
बौद्ध ग्रंथ सुत्त निपात का भी उल्लेख है
NCERT की पुस्तक के अनुसार, चार वर्णों की अवधारणा प्रारंभ में कार्य और मूल्यों पर आधारित थी, न कि कठोर सामाजिक विभाजन पर। इसमें ज्ञान को सर्वोच्च स्थान दिया गया, उसके बाद राजनीतिक शक्ति और फिर संपत्ति को महत्व दिया गया। पुस्तक में बौद्ध ग्रंथ सुत्त निपात का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें कहा गया है कि व्यक्ति की पहचान जन्म से नहीं बल्कि उसके कर्मों से होती है। उद्धृत कथन के अनुसार, "कोई व्यक्ति जन्म से अछूत नहीं होता, बल्कि अपने कर्मों से होता है। इसी प्रकार ब्राह्मण भी जन्म से नहीं, बल्कि अपने कर्मों से बनता है।"
वर्ण और जाति हमेशा कठोर सामाजिक श्रेणियां नहीं थीं
अध्याय में आगे बताया गया है कि समय के साथ अंतर्विवाह, भौगोलिक विस्तार और नए व्यवसायों के विकास के कारण जातियों की संख्या बढ़ती गई, जबकि वर्णों की संख्या चार ही रही। पुस्तक यह भी स्पष्ट करती है कि वर्ण और जाति हमेशा कठोर सामाजिक श्रेणियां नहीं थीं तथा इतिहास में विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमि के शासकों और व्यवसाय बदलने के अनेक उदाहरण मिलते हैं।