GBU छात्र को ₹5 लाख के नोटिस पर सुप्रीम कोर्ट नाराज, CJI सूर्यकांत ने गौतम बुद्ध नगर DM से मांगा जवाब
GBU छात्र अक्षय त्रिपाठी को जंतर-मंतर प्रदर्शन में शामिल होने पर जारी ₹5 लाख के नोटिस का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। CJI सूर्यकांत ने 1 सितंबर के आदेश का हवाला देते हुए नाराजगी जताई और गौतम बुद्ध नगर DM से जवाब मांगने की बात कही।
नई दिल्ली: ग्रेटर नोएडा स्थित गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी (GBU) के छात्र अक्षय त्रिपाठी को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन में शामिल होने के मामले में जारी ₹5 लाख के शांति बंधपत्र वाले नोटिस ने अब सुप्रीम कोर्ट का रुख कर लिया है। मामले का उल्लेख CJI सूर्यकांत के सामने किया गया, जिस पर उन्होंने अदालत के पहले के निर्देश का हवाला देते हुए नाराजगी जताई। कोर्ट ने गौतम बुद्ध नगर के जिलाधिकारी से इस मामले में जवाब मांगने की बात कही है।
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि छात्र की ओर से पेश वकील ने दावा किया कि 1 सितंबर के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद अक्षय के खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई। वकील ने इसे अदालत के निर्देशों की अवहेलना बताते हुए कहा कि इसका असर दूसरे छात्रों पर भी पड़ सकता है।
CJI सूर्यकांत ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान छात्र के वकील ने ₹5 लाख के नोटिस का मुद्दा उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट को बताया कि पहले के आदेश में प्रदर्शन में शामिल छात्रों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने की बात कही गई थी। इसके बावजूद अक्षय त्रिपाठी को नोटिस जारी किया गया।
इस पर CJI सूर्यकांत ने नाराजगी जताई और कहा कि अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया था कि प्रदर्शन में शामिल छात्रों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। उन्होंने कहा कि वह इस मामले में गौतम बुद्ध नगर के जिलाधिकारी से जवाब मांगेंगे।
अब प्रशासन की ओर से दिया जाने वाला स्पष्टीकरण इस मामले में महत्वपूर्ण होगा।
आखिर ₹5 लाख का नोटिस क्यों जारी हुआ था?
पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर 4 सितंबर को ग्रेटर नोएडा के तृतीय कार्यकारी मजिस्ट्रेट कार्यालय से अक्षय त्रिपाठी को नोटिस जारी किया गया था। इसमें उनसे ₹5 लाख का निजी मुचलका और इतनी ही रकम की दो जमानतें देने को कहा गया था।
यह कार्यवाही भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 130 के तहत बताई गई थी। इससे पहले सहायक पुलिस आयुक्त की ओर से BNSS की धारा 126 और 135 के तहत प्रक्रिया शुरू की गई थी।
नोटिस में आरोप लगाया गया था कि अक्षय छात्रों को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रस्तावित प्रदर्शन में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे। पुलिस ने यह भी दावा किया था कि उनके जरिए ऐसी जानकारी प्रसारित की जा रही थी, जिससे तनाव पैदा होने या सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका थी।
अक्षय से यह बताने को कहा गया था कि क्यों न उन्हें छह महीने तक शांति बनाए रखने के लिए पाबंद किया जाए। इसी के लिए ₹5 लाख का निजी मुचलका और समान राशि के दो जमानतदारों की शर्त रखी गई थी। मामले की सुनवाई के लिए 5 सितंबर की तारीख तय की गई थी।
शांति बंधपत्र का मतलब क्या है?
यहां यह समझना जरूरी है कि इस तरह का शांति बंधपत्र एक एहतियाती कानूनी प्रक्रिया होती है। इसे अपने आप में किसी व्यक्ति को अपराध का दोषी ठहराने या सजा देने के तौर पर नहीं देखा जाता। प्रशासन ऐसी प्रक्रिया का इस्तेमाल संभावित कानून-व्यवस्था की स्थिति को रोकने के लिए कर सकता है।
अक्षय ने पुलिस के आरोपों को नकारा
अक्षय त्रिपाठी ने पुलिस की ओर से लगाए गए आरोपों से इनकार किया है। उनका कहना है कि उन्होंने प्रदर्शन में शांतिपूर्वक हिस्सा लिया था और किसी तरह की हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था फैलाने में उनकी भूमिका नहीं थी।
सोशल मीडिया पर सामने आए एक वीडियो में अक्षय ने दावा किया कि 20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों के संसद की ओर बढ़ने के दौरान दिल्ली पुलिस की कार्रवाई में वह घायल हुए थे।
उन्होंने यह भी कहा कि उस समय वह विश्वविद्यालय की कक्षाओं में नहीं जा रहे थे क्योंकि संस्थान करीब तीन महीने से बंद था।
पुलिस रिपोर्ट के मुताबिक, अक्षय मूल रूप से प्रयागराज के झूंसी के रहने वाले हैं और वर्तमान में ईकोटेक-1 क्षेत्र में रहते हैं। पुलिस का दावा था कि उनकी गतिविधियों से विश्वविद्यालय परिसर में तनाव की स्थिति पैदा हुई और कानून-व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका थी।
इन आरोपों और छात्र के जवाब के बीच अब अदालत के सामने प्रशासन का पक्ष महत्वपूर्ण होगा।
पुलिस ने बाद में नोटिस वापस लिया
मामला सामने आने के बाद पुलिस के मुताबिक 4 सितंबर को ही नोटिस वापस ले लिया गया था। हालांकि, छात्र की ओर से सुप्रीम कोर्ट में यह सवाल उठाया गया कि यदि अदालत ने प्रदर्शन में शामिल छात्रों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया था, तो अक्षय को इस तरह का नोटिस जारी करने की जरूरत क्यों पड़ी।
यही बिंदु अब सुप्रीम कोर्ट की चिंता का केंद्र बन गया है।
अदालत के सामने सवाल केवल वापस लिए गए नोटिस का नहीं, बल्कि इस बात का भी है कि प्रशासनिक स्तर पर यह कार्रवाई किस आधार पर शुरू की गई और क्या यह सुप्रीम कोर्ट के पहले के निर्देश के अनुरूप थी।
CJP और SFI ने भी उठाए सवाल
मामले को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के सह-संयोजक सौरव दास ने भी सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि अक्षय त्रिपाठी को ₹5 लाख का बॉन्ड देने की आवश्यकता नहीं है और छात्रों को निशाना बनाए जाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
दास ने सुप्रीम कोर्ट के 1 सितंबर के आदेश का हवाला देते हुए प्रशासनिक कार्रवाई पर सवाल उठाया। उन्होंने केंद्र सरकार से अदालत के आदेश की प्रति संबंधित जिलाधिकारी तक पहुंचाने और मामले में जरूरी कदम उठाने की मांग भी की।
वहीं स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) ने भी छात्र के खिलाफ हुई कार्रवाई को ‘दमनकारी’ बताया और उत्तर प्रदेश सरकार तथा पुलिस की आलोचना की।
हालांकि, CJP और SFI के ये राजनीतिक/संगठनात्मक आरोप उनके अपने दावे हैं और इन पर प्रशासन का अंतिम पक्ष सामने आना बाकी है।
अब DM के जवाब पर टिकी नजर
सुप्रीम कोर्ट में मामले का उल्लेख होने के बाद अब गौतम बुद्ध नगर के जिलाधिकारी का जवाब अहम हो गया है। कोर्ट यह जानना चाहता है कि छात्र के खिलाफ जारी नोटिस की पृष्ठभूमि क्या थी और इसे किस आधार पर जारी किया गया।
मामले का व्यापक असर छात्रों के प्रदर्शन और प्रशासनिक कार्रवाई के बीच संतुलन पर भी पड़ सकता है। खासतौर पर तब, जब किसी अदालत के आदेश के दायरे को लेकर प्रशासन और याचिकाकर्ता के बीच अलग-अलग दावे सामने आ रहे हों।
फिलहाल नोटिस वापस लिए जाने की बात कही गई है, लेकिन उसके जारी होने को लेकर उठे सवाल खत्म नहीं हुए हैं। अब सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रशासन का जवाब यह स्पष्ट कर सकता है कि कार्रवाई क्यों शुरू की गई और अदालत के पहले के निर्देश को किस तरह समझा गया था।