एंटी पेपर लीक बिल पास, जानें नए कानून में क्या बदला और मुख्यमंत्रियों की दौलत का पूरा हिसाब
संसद परिसर में समाजवादी पार्टी के सांसद मकर द्वार पर दानपेटी लेकर पहुंच गए और प्रदर्शन किया। यह प्रदर्शन राम मंदिर में चढ़ावे और चंदे से जुड़े एक विवाद को लेकर भाजपा पर निशाना साधने के इरादे से किया गया था।
नई दिल्ली: लोकसभा में बुधवार को भारी हंगामे के बीच 'लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026' पास हो गया। यह विधेयक करोड़ों छात्रों के भविष्य से जुड़े एक ऐसे मुद्दे पर है, जिसने पिछले कुछ वर्षों में देशभर में कई बार आंदोलन खड़े किए हैं। सदन में बहस के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू के बीच तीखी नोकझोंक हुई, कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी के एक बयान पर सत्ता पक्ष ने माफी की मांग कर दी, और संसद परिसर में समाजवादी पार्टी के सांसदों ने दानपेटी लेकर प्रदर्शन किया।
इसी बीच एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानी ADR की एक रिपोर्ट ने देश के मुख्यमंत्रियों की संपत्ति को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। इस रिपोर्ट में सामने आया कि देश के सबसे अमीर और सबसे कम संपत्ति वाले मुख्यमंत्री के बीच का फासला हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा का है।
आइए पूरी घटना को सिलसिलेवार, विस्तार से समझते हैं।
अचानक नहीं आया पेपर लीक का मुद्दा
पिछले कुछ वर्षों में देश में कई बड़ी भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं के पेपर लीक होने के मामले सामने आए हैं। NEET और UGC NET जैसी परीक्षाओं को लेकर छात्रों ने कई बार सड़कों पर उतरकर विरोध जताया। इन आंदोलनों के दबाव में ही जून 2024 में केंद्र सरकार पहला 'लोक परीक्षा अधिनियम' लेकर आई थी, ताकि पेपर लीक करने वालों पर सख्त कार्रवाई हो सके।
लेकिन उस कानून के बावजूद पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी की घटनाएं थमी नहीं। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने और सख्त प्रावधानों वाला व्यापक विधेयक लाने की घोषणा की। इससे पहले उन्होंने इंफोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता में परीक्षा सुधारों के लिए एक टास्क फोर्स के गठन का भी ऐलान किया था, जिसकी रिपोर्ट के आधार पर आगे की परीक्षा व्यवस्था तय होनी है।
बिल पास होने तक का पूरा घटनाक्रम
मानसून सत्र के दौरान सोमवार को केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में यह संशोधन विधेयक पेश किया था। पेश किए जाने के दिन ही विपक्षी सांसदों ने छात्रों के आंदोलन के दौरान कथित पुलिस कार्रवाई पर चर्चा की मांग करते हुए हंगामा किया।
विपक्षी सांसद वेल में पहुंचकर नारेबाजी करने लगे, जिसके चलते सदन की कार्यवाही उस दिन बार-बार स्थगित करनी पड़ी थी। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदस्यों से सहयोग की अपील करते हुए कहा था कि यह विधेयक परीक्षा सुधार की दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम है और इस पर व्यापक चर्चा होनी चाहिए।
बुधवार को आखिरकार इस पर विस्तृत बहस हुई। पूरे दिन चली गरमागरम चर्चा, आरोप-प्रत्यारोप और कई बार के हंगामे के बाद शाम तक विधेयक को लोकसभा ने ध्वनि मत से पारित कर दिया।
राहुल गांधी का भाषण और 'इडियट-अंधभक्त' विवाद
बहस के दौरान राहुल गांधी ने अपने भाषण की शुरुआत एक दिलचस्प अंदाज़ में की। उन्होंने बताया कि हाल ही में उनकी एक छात्रा से बातचीत हुई थी, और उस बातचीत के आधार पर वे एक अवधारणा समझाना चाहते थे।
इसी क्रम में उन्होंने 'स्टूडेंट', 'इडियट' और 'अंधभक्त' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने सदन में स्पष्ट किया कि वे सत्ता पक्ष के किसी सदस्य को यह शब्द नहीं कह रहे हैं, बल्कि सिर्फ उस छात्रा के नजरिए को बयान कर रहे हैं जिससे उनकी बातचीत हुई थी।
इसके बावजूद सत्ता पक्ष ने कड़ी आपत्ति जताई। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू कई बार खड़े होकर इसका विरोध करते रहे और माफी की मांग करते रहे। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी इन शब्दों को कार्यवाही से हटाने की मांग की। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने आखिरकार विवादित शब्दों को रिकॉर्ड से हटाने के निर्देश दे दिए।
अपने भाषण में राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि देश की शिक्षा व्यवस्था असल में शिक्षा मंत्रालय नहीं बल्कि RSS चला रहा है, और मंत्री सिर्फ एक चेहरा भर हैं। उन्होंने यह भी कहा कि देश की सभी यूनिवर्सिटी में RSS से जुड़े वाइस चांसलर बैठे हैं।
बहस के दौरान उन्होंने छात्र आंदोलन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर गृह मंत्री अमित शाह पर भी सीधा और गंभीर हमला बोला। इसके जवाब में किरेन रिजिजू ने कहा कि किसी भी छात्र पर गोली नहीं चलाई गई थी, और बिना ठोस आधार के इतने गंभीर आरोप लगाना उचित नहीं है। केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने भी विपक्ष पर एक गंभीर मुद्दे पर राजनीति करने का आरोप लगाया।
प्रियंका गांधी बनाम प्रह्लाद जोशी - विवाद की असली वजह
बहस के दौरान एक और मोर्चा खुला, जो पेपर लीक के मूल मुद्दे से हटकर व्यक्तिगत आरोपों तक जा पहुंचा। हाल ही में शिक्षा मंत्रालय का जिम्मा संभालने वाले केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी को लेकर प्रियंका गांधी वाड्रा ने लोकसभा में एक तीखी टिप्पणी की।
उन्होंने 2009 के मैंगलुरु पब हमला मामले का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि उस हमले से जुड़े एक व्यक्ति को प्रह्लाद जोशी ने भाजपा में शामिल कराया था। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि उस व्यक्ति को कुछ घंटों के भीतर ही पार्टी से निकाल दिया गया था।
इस टिप्पणी पर सदन में जबरदस्त हंगामा हुआ। किरेन रिजिजू ने इसे चरित्र हनन बताते हुए स्पीकर से माफी की मांग की। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने भी प्रियंका गांधी के इस बयान पर कड़ा एतराज जताया। प्रह्लाद जोशी ने खुद आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि प्रियंका गांधी को अपने बयान प्रमाणित करने चाहिए थे, और गलत सूचना फैलाने पर कार्रवाई होनी चाहिए।
संसद परिसर में बाद में मीडिया से बातचीत में प्रियंका गांधी ने अपने बयान का बचाव किया। उन्होंने कहा कि उन्होंने सिर्फ सच कहा है, और अगर सच बोलने की सजा मिलेगी तो वे सजा भुगतने को तैयार हैं, लेकिन सच बोलना जारी रखेंगी।
दानपेटी लेकर संसद पहुंचे सपा सांसद
इसी बीच संसद परिसर में समाजवादी पार्टी के सांसद मकर द्वार पर दानपेटी लेकर पहुंच गए और प्रदर्शन किया। यह प्रदर्शन राम मंदिर में चढ़ावे और चंदे से जुड़े एक विवाद को लेकर भाजपा पर निशाना साधने के इरादे से किया गया था।
प्रदर्शन में शामिल सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने तंज कसते हुए कहा कि जो सरकार दानपेटी की सुरक्षा नहीं कर सकी, वह देश के युवाओं का भविष्य भी सुरक्षित नहीं रख सकती। इस तरह एक ही दिन में संसद के भीतर पेपर लीक कानून पर बहस चल रही थी, तो संसद के बाहर सियासी नारेबाजी और प्रतीकात्मक प्रदर्शन भी जारी थे।
नया कानून पुराने से कितना अलग है
2024 के पुराने कानून में सामान्य पेपर लीक अपराध के लिए 3 से 5 साल तक की सजा और 10 लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान था। नए 2026 संशोधन में इसे बढ़ाकर 5 से 10 साल की सजा और 50 लाख रुपये तक जुर्माना कर दिया गया है।
संगठित गिरोहों के लिए पुराने कानून में 5 से 10 साल की सजा और कम से कम 1 करोड़ रुपये जुर्माने का प्रावधान था। नए कानून में यह बढ़ाकर 7 से 10 साल की सजा और अधिकतम 10 करोड़ रुपये जुर्माना कर दिया गया है।
नए कानून में जांच प्रक्रिया को समयबद्ध बनाने की भी बड़ी कोशिश की गई है। नियम के मुताबिक अब दो महीने के भीतर जांच पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है। चार्जशीट दाखिल होने के तीन महीने के भीतर ट्रायल पूरा करने की समयसीमा भी तय की गई है।
राज्य सरकारें और केंद्र शासित प्रदेश अब अपने यहां विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट बना सकेंगे, जहां ऐसे मामलों की रोजाना सुनवाई हो सकेगी। जरूरत पड़ने पर केंद्र सरकार एक स्पेशल टास्क फोर्स भी गठित कर सकेगी।
संशोधन में पहली बार करीब 15 तरह के अपराधों को कानूनी तौर पर स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है। इनमें पेपर लीक, OMR शीट से छेड़छाड़, फर्जी वेबसाइट बनाना, फर्जी एडमिट कार्ड जारी करना, डिजिटल धोखाधड़ी और परीक्षा प्रक्रिया में संगठित हस्तक्षेप जैसी गतिविधियां शामिल हैं।
इसके अलावा परीक्षा केंद्रों में बायोमेट्रिक रजिस्ट्रेशन अनिवार्य करने, परीक्षा से पहले प्री-ऑडिट कराने, प्रश्नपत्रों के सुरक्षित प्रबंधन और परीक्षा के बाद की प्रक्रिया के लिए भी विस्तृत सुरक्षा मानक तय किए गए हैं।
सरकार का दावा है कि नया कानून सिर्फ सजा बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी परीक्षा व्यवस्था को ज्यादा सुरक्षित और जवाबदेह बनाने की कोशिश है। वहीं विपक्ष का कहना है कि सिर्फ कानून सख्त करने से नहीं, बल्कि पूरी परीक्षा व्यवस्था में जवाबदेही तय करने से ही छात्रों का भरोसा वापस लौटेगा।
मुख्यमंत्रियों की संपत्ति का हिसाब - क्या कहती है ADR रिपोर्ट
पेपर लीक बिल पर संसद में जहां बहस चल रही थी, वहीं दूसरी तरफ एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानी ADR की एक रिपोर्ट ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी। ADR एक गैर-सरकारी और गैर-दलीय संस्था है, जो पिछले कई वर्षों से चुनावी पारदर्शिता और राजनीतिक जवाबदेही पर काम कर रही है।
यह रिपोर्ट चुनाव आयोग को जनप्रतिनिधियों द्वारा दिए गए आधिकारिक शपथ-पत्रों के विश्लेषण पर आधारित है। इसमें देश के 31 मुख्यमंत्रियों, यानी 28 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों की घोषित संपत्ति का ब्यौरा दिया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार करीब 1,413 करोड़ रुपये की घोषित संपत्ति के साथ देश के सबसे अमीर मुख्यमंत्री हैं। दूसरे स्थान पर आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू हैं, जिनकी संपत्ति करीब 931 करोड़ रुपये है। तीसरे स्थान पर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय हैं, जिनकी घोषित संपत्ति करीब 648 करोड़ रुपये है।

दिलचस्प बात यह है कि देश के तीनों सबसे अमीर मुख्यमंत्री दक्षिण भारत के राज्यों से आते हैं। इसके अलावा अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू भी 332 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति के साथ इस सूची में ऊपरी पायदान पर हैं।
सूची के दूसरे छोर पर जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला हैं। चुनावी शपथ-पत्र के मुताबिक उनकी घोषित संपत्ति सिर्फ करीब 55 लाख रुपये है, और उनके नाम कोई व्यावसायिक भूमि या अचल संपत्ति दर्ज नहीं है।
उत्तर भारत के राज्यों की बात करें तो हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने करीब 7.8 करोड़ रुपये, हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने करीब 5.8 करोड़ रुपये, जबकि पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने करीब 1.97 करोड़ रुपये की घोषित संपत्ति बताई है।
रिपोर्ट में एक और चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है। देश के 31 मुख्यमंत्रियों में से 14 मुख्यमंत्रियों, यानी करीब 45 प्रतिशत ने अपने हलफनामे में खुद पर आपराधिक मामले दर्ज होने की जानकारी दी है। इनमें से कई पर गंभीर आरोप भी दर्ज हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी नेता की घोषित संपत्ति उसके कामकाज, ईमानदारी या प्रशासनिक क्षमता का पैमाना नहीं होती। इन रिपोर्टों का मकसद सिर्फ इतना है कि जनता को अपने जनप्रतिनिधियों की प्रमाणित आर्थिक स्थिति की जानकारी मिल सके, जो लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में एक अहम कदम मानी जाती है।