Explained: सरकारी नौकरी से पंजाब के मुख्यमंत्री तक: प्रकाश सिंह बादल की वो कहानी, जिसने बदल दी पंजाब की राजनीति
सरकारी नौकरी की चाहत से शुरू हुई प्रकाश सिंह बादल की कहानी पांच बार पंजाब के मुख्यमंत्री बनने तक पहुंची। जानिए कैसे गांव के सरपंच से पंजाब की सियासत के सबसे बड़े चेहरों में शामिल हुए बादल और कैसी रही उनकी राजनीतिक विरासत।
पंजाब की राजनीति में प्रकाश सिंह बादल का नाम एक ऐसे नेता के तौर पर दर्ज है, जिन्होंने करीब सात दशक तक राज्य की सियासत को प्रभावित किया। पांच बार पंजाब के मुख्यमंत्री रहे बादल ने राजनीति की शुरुआत गांव की राजनीति से की थी। दिलचस्प बात यह है कि राजनीति में आने से पहले वह सरकारी नौकरी करना चाहते थे और उन्हें तहसीलदार की नौकरी भी मिली थी। लेकिन एक रिश्तेदार ने उनका नियुक्ति पत्र फाड़ दिया और उनसे कहा कि उन्हें ऐसा व्यक्ति बनना चाहिए जो दूसरों को नौकरी दे।
इसके बाद बादल ने राजनीति को अपना रास्ता बनाया। 1947 में महज 20 साल की उम्र में सरपंच बनने से शुरू हुआ उनका सफर विधानसभा, केंद्र सरकार में मंत्री पद और पंजाब के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा। उनका राजनीतिक जीवन उपलब्धियों, जनसंपर्क, किसान राजनीति, गठबंधन की रणनीति और कई विवादों से भरा रहा।
20 साल की उम्र में बने सरपंच
प्रकाश सिंह बादल का राजनीतिक सफर भारत की आजादी के साथ ही शुरू हो गया था। 1947 में वह सिर्फ 20 साल के थे, जब उन्हें गांव का सरपंच चुना गया। इसके बाद उन्होंने स्थानीय राजनीति से आगे बढ़ते हुए पंजाब की विधानसभा में जगह बनाई।
सिर्फ 25 साल की उम्र में विधायक बनने के बाद उनकी पहचान तेजी से मजबूत हुई। आगे चलकर वह पंजाब के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल हुए और पांच अलग-अलग मौकों पर राज्य के मुख्यमंत्री बने।
उनकी राजनीति का एक महत्वपूर्ण आधार आम लोगों से सीधा संपर्क रहा। वह सत्ता में रहते हुए भी गांवों और कस्बों में जाकर लोगों से मिलते थे और उनकी समस्याएं सुनते थे।
सरकारी नौकरी छोड़कर क्यों चुनी राजनीति?
प्रकाश सिंह बादल की जिंदगी का एक दिलचस्प किस्सा उनकी सरकारी नौकरी से जुड़ा है। राजनीति में आने से पहले वह तहसीलदार की नौकरी करना चाहते थे और उन्हें नियुक्ति भी मिल गई थी।
लेकिन उनके एक रिश्तेदार, जो खुद मंत्री थे, ने उनका नियुक्ति पत्र फाड़ दिया। उन्होंने बादल से कहा कि उन्हें ऐसी भूमिका चुननी चाहिए जिसमें वह दूसरों को रोजगार और अवसर देने की स्थिति में हों।
इसके बाद बादल ने नौकरी के बजाय सार्वजनिक जीवन का रास्ता चुना। यही फैसला आगे चलकर उन्हें पंजाब की सत्ता के सबसे ऊंचे पद तक ले गया।
जनता के बीच रहने को बनाया राजनीति का आधार
प्रकाश सिंह बादल की राजनीतिक शैली का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उनका जनसंपर्क था। उन्होंने ‘संगत दर्शन’ जैसे कार्यक्रमों के जरिए लोगों के बीच जाकर उनकी समस्याएं सुनीं।
वह राज्य के अलग-अलग इलाकों में लगातार दौरे करते थे। कई बार लंबी दूरी तय करके सुबह-सुबह दूरदराज के गांवों में पहुंच जाते और स्थानीय लोगों से बातचीत करते थे।
उनकी कार्यशैली में अधिकारियों से सीधे जवाब मांगना भी शामिल था। अखबारों में किसी गांव, सड़क, किसान या आम नागरिक की समस्या सामने आने पर वह संबंधित अधिकारियों से उस पर कार्रवाई करने को कहते थे।
राज्य का दौरा करते समय वह हमेशा बड़े होटलों या सरकारी गेस्ट हाउसों पर निर्भर रहने के बजाय पार्टी कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों के साथ रहना पसंद करते थे। यही वजह थी कि ग्रामीण पंजाब में उनकी मजबूत पकड़ बनी रही।
हिंदू-सिख भाईचारे और ‘पंजाबियत’ पर जोर
प्रकाश सिंह बादल की राजनीति में पंजाब की सामाजिक एकता एक महत्वपूर्ण विषय रही। वह हिंदू-सिख रिश्ते को बेहद मजबूत मानते थे और इसे नाखून और मांस के रिश्ते जैसा बताते थे।
1996 में मोगा में अकाली दल के चुनावी घोषणा पत्र के दौरान उन्होंने ‘पंजाब, पंजाबी और पंजाबियत’ का नारा दिया। इसके बाद अकाली दल की राजनीति को व्यापक पंजाबी पहचान से जोड़ने की कोशिश हुई।
इसी रणनीति के तहत पार्टी ने कई हिंदू नेताओं को भी चुनावी राजनीति में आगे बढ़ाया। बाद में अकाली दल और भाजपा के बीच मजबूत राजनीतिक गठबंधन बना, जिसने लंबे समय तक पंजाब की सत्ता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मोरारजी देसाई सरकार में भी रहे मंत्री
प्रकाश सिंह बादल की राजनीति सिर्फ पंजाब तक सीमित नहीं रही। 1977 में वह मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता पार्टी सरकार में मंत्री बने।
1997 में अकाली दल और भाजपा के बीच गठबंधन ने पंजाब की राजनीति में नया अध्याय शुरू किया। दोनों दल करीब ढाई दशक तक सहयोगी रहे। 2007 और 2012 के विधानसभा चुनावों में गठबंधन ने लगातार दो बार सरकार बनाई और प्रकाश सिंह बादल मुख्यमंत्री बने।
यह दौर उनके राजनीतिक जीवन के सबसे मजबूत चरणों में गिना जाता है।
हालांकि, 2021 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर अकाली दल और भाजपा का लंबा गठबंधन टूट गया। इसके बाद पंजाब की राजनीति में दोनों दल अलग-अलग रास्तों पर चले गए।
किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर फोकस
प्रकाश सिंह बादल की राजनीति का बड़ा हिस्सा ग्रामीण पंजाब और किसानों के आसपास रहा। उनके कार्यकाल में किसानों के लिए मुफ्त बिजली और पानी जैसी योजनाओं को प्रमुखता मिली।
इसके अलावा कमजोर और गरीब वर्गों के लिए मुफ्त आटा-दाल तथा लड़कियों के लिए शगुन जैसी योजनाएं भी शुरू की गईं।
इन योजनाओं ने ग्रामीण और कमजोर तबकों के बीच अकाली दल के आधार को मजबूत करने में भूमिका निभाई। बादल खुद भी खेती में गहरी दिलचस्पी रखते थे और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पंजाब की राजनीति का महत्वपूर्ण आधार मानते थे।
बादल परिवार की राजनीति का दौर
प्रकाश सिंह बादल ने अपने बेटे सुखबीर सिंह बादल को पंजाब की राजनीति में आगे बढ़ाया और उन्हें अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाया।
समय के साथ बादल परिवार के कई सदस्य पंजाब और केंद्र की राजनीति में महत्वपूर्ण पदों पर पहुंचे। सुखबीर सिंह बादल उपमुख्यमंत्री रहे, जबकि हरसिमरत कौर बादल केंद्र सरकार में मंत्री बनीं। परिवार के अन्य सदस्यों ने भी पंजाब की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं।
इससे अकाली दल के भीतर परिवारवाद को लेकर आलोचना भी हुई। जो पार्टी कभी मजबूत कार्यकर्ता आधारित संगठन के तौर पर जानी जाती थी, उस पर बाद के वर्षों में बादल परिवार के इर्द-गिर्द केंद्रित होने के आरोप लगने लगे।
बेअदबी और कोटकापुरा फायरिंग ने बढ़ाई मुश्किलें
प्रकाश सिंह बादल के राजनीतिक जीवन का सबसे विवादित दौर 2015 की गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की घटनाओं के बाद आया।
बेअदबी की घटनाओं के बाद पंजाब में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। पुलिस फायरिंग में दो लोगों की मौत ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। विपक्षी दलों ने इन घटनाओं को लेकर तत्कालीन बादल सरकार पर तीखे सवाल उठाए।
बाद में कोटकापुरा फायरिंग मामले को लेकर भी प्रकाश सिंह बादल पर कार्रवाई हुई। मार्च 2023 में उन्हें मामले में आरोपी बनाया गया था।
अपने जीवन के अंतिम दौर में बादल ने पंजाबियों के नाम एक खुला पत्र लिखा था। उन्होंने अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि उन्होंने हर धर्म और आस्था का सम्मान करने और पंजाब में शांति तथा सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने की कोशिश की।
उन्होंने अपने जीवन को ‘खुली किताब’ बताया था।
94 साल की उम्र में लड़ा आखिरी चुनाव
प्रकाश सिंह बादल की राजनीतिक सक्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने 2022 में 94 साल की उम्र में विधानसभा चुनाव लड़ा।
इस चुनाव के साथ उन्होंने भारतीय चुनावी राजनीति में उम्र से जुड़ा एक अलग रिकॉर्ड भी बनाया। हालांकि, उन्हें अपने राजनीतिक जीवन के आखिरी चुनाव में हार का सामना करना पड़ा।
लेकिन हार के बाद भी उनका व्यवहार चर्चा में रहा। उन्होंने चुनावी नतीजे को विनम्रता से स्वीकार किया और हाथ जोड़कर लोगों का अभिवादन किया।
सादगी के लिए भी याद किए गए
करीब 19 साल तक पंजाब के मुख्यमंत्री रहने के बावजूद प्रकाश सिंह बादल की व्यक्तिगत जीवनशैली काफी सादगी भरी रही। बताया जाता है कि वह हाथ में घड़ी नहीं पहनते थे और अपनी जेब में पेन भी नहीं रखते थे। इसके बावजूद समय की पाबंदी उनकी खासियत थी।
उनकी राजनीतिक शैली आक्रामक भाषणों के बजाय लोगों से मिलने, संगठन को मजबूत करने और जमीनी स्तर पर संपर्क बनाए रखने पर आधारित रही।
वह जूनियर और सीनियर अधिकारियों के साथ भी सहज तरीके से बातचीत करते थे। यही सहजता उन्हें आम लोगों के बीच एक अलग पहचान देती थी।
पांच बार मुख्यमंत्री बनने की कहानी
प्रकाश सिंह बादल का राजनीतिक सफर एक ऐसे युवक से शुरू हुआ, जो सरकारी नौकरी करना चाहता था, लेकिन परिस्थितियों ने उसे राजनीति की ओर मोड़ दिया। 20 साल की उम्र में सरपंच बनने के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
विधायक से लेकर केंद्र में मंत्री और फिर पांच बार पंजाब के मुख्यमंत्री बनने तक उन्होंने राज्य की राजनीति में लंबी पारी खेली।
उनके राजनीतिक जीवन में किसान कल्याण और पंजाबियत की राजनीति जैसी उपलब्धियां रहीं, तो बेअदबी, पुलिस फायरिंग और परिवारवाद जैसे विवाद भी जुड़े।
फिर भी पंजाब की राजनीति में उनका प्रभाव कई दशकों तक बना रहा। उनकी सबसे बड़ी ताकत आम लोगों के बीच उनकी मौजूदगी और ग्रामीण पंजाब से उनका सीधा जुड़ाव रहा।
प्रकाश सिंह बादल की विरासत इसलिए सिर्फ उनके मुख्यमंत्री पदों या चुनावी जीतों तक सीमित नहीं है। वह उस दौर के राजनेता थे जिन्होंने गांव की राजनीति से शुरुआत कर पंजाब की सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने का सफर तय किया और दशकों तक राज्य की सियासत के केंद्र में बने रहे।