पंजाब की सियासत में शिरोमणि अकाली दल (SAD) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच संभावित गठबंधन को लेकर एक बार फिर चर्चाएं तेज हो गई हैं। अकाली दल की वरिष्ठ नेता और बठिंडा सांसद हरसिमरत कौर बादल के एक बयान ने इन अटकलों को नया आधार दिया है। वहीं अकाली नेता बिक्रम सिंह मजीठिया ने भी कहा है कि दोनों दल पहले लंबे समय तक साथ काम कर चुके हैं और पंजाब में मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए लोगों के बीच फिर साथ आने की मांग है।

हालांकि, अभी तक न तो अकाली दल और न ही भाजपा ने गठबंधन को लेकर कोई औपचारिक घोषणा की है। खास बात यह है कि भाजपा के कई नेता पंजाब में अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी की बात पहले ही कह चुके हैं। ऐसे में सवाल यह है कि क्या दोनों दल वास्तव में पुराने रिश्ते को फिर से जोड़ने की दिशा में बढ़ रहे हैं या फिलहाल यह सिर्फ राजनीतिक संकेतों और अटकलों तक सीमित है?

हरसिमरत कौर के बयान ने बढ़ाई हलचल

संत हरचंद सिंह लोंगोवाल की 41वीं पुण्यतिथि पर आयोजित एक रैली में हरसिमरत कौर बादल ने केंद्र के साथ राजनीतिक समझ और सहयोग की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि पंजाब को पहले भी ऐसे समझौतों से विकास और प्रगति का फायदा मिला है।

हरसिमरत ने कहा कि वह अभी अपनी बात खुलकर नहीं कह सकतीं और लोगों को खुद आगे होने वाली चीजों का पता चल जाएगा। उन्होंने दिल्ली से ऐसे समझौतों की उम्मीद जताई, जिनसे पंजाब में विकास और प्रगति को बढ़ावा मिल सके।

उन्होंने भाजपा का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया, लेकिन उनके बयान को SAD-BJP रिश्तों के संदर्भ में देखा जा रहा है। यही वजह है कि पंजाब के राजनीतिक गलियारों में पुराने गठबंधन की वापसी को लेकर चर्चा अचानक तेज हो गई है।

SAD और BJP का रिश्ता पुराना, लेकिन 2020 में टूट गया था

SAD और BJP का पंजाब में गठबंधन कई दशकों तक चला। दोनों पार्टियों ने एक साथ चुनाव लड़े और राज्य में सरकार भी बनाई। यह गठबंधन पंजाब की राजनीति में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रयोग माना जाता था, जिसमें अकाली दल का ग्रामीण और सिख आधार तथा भाजपा का शहरी समर्थन एक-दूसरे के पूरक रहे।

लेकिन 2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर दोनों दलों के रास्ते अलग हो गए। किसान आंदोलन के बीच अकाली दल ने NDA से बाहर निकलने का फैसला किया। इसके बाद भाजपा ने पंजाब में अपने संगठन को स्वतंत्र रूप से मजबूत करने की रणनीति अपनाई।

तब से दोनों पार्टियां अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरी हैं। इस दौरान भाजपा ने राज्य में अपने संगठन और राजनीतिक आधार को बढ़ाने पर जोर दिया, जबकि अकाली दल अपने पारंपरिक वोट बैंक को दोबारा मजबूत करने की कोशिश करता रहा।

मजीठिया बोले- साथ आने की लोगों में मांग

SAD नेता बिक्रम सिंह मजीठिया ने गठबंधन की संभावनाओं पर बात करते हुए पुराने रिश्ते का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अकाली दल और भाजपा पहले लंबे समय तक गठबंधन में काम कर चुके हैं।

मजीठिया के मुताबिक, अटल बिहारी वाजपेयी और प्रकाश सिंह बादल के दौर में गठबंधन मजबूती से चला और बाद में नरेंद्र मोदी के दौर में भी दोनों दलों ने साथ काम किया। उन्होंने कहा कि कृषि कानूनों के कारण दोनों दल अलग हुए थे।

उन्होंने पंजाब की मौजूदा स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि राज्य एक बॉर्डर स्टेट है और यहां सामाजिक ताने-बाने तथा सांप्रदायिक सद्भाव को बनाए रखना महत्वपूर्ण है। मजीठिया ने कहा कि लोगों के बीच दोनों दलों के फिर साथ आने की मांग है, लेकिन गठबंधन होगा या नहीं, इसका फैसला भाजपा और अकाली दल का केंद्रीय नेतृत्व करेगा।

यह बयान महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि इससे पहली बार अकाली दल की ओर से संभावित गठबंधन को लेकर अपेक्षाकृत खुला राजनीतिक संकेत सामने आया है। हालांकि, इसे गठबंधन की औपचारिक पुष्टि नहीं माना जा सकता।

भाजपा की राह अभी अलग दिख रही है

दूसरी तरफ भाजपा की तरफ से पंजाब में अकेले चुनाव लड़ने की रणनीति के संकेत लगातार मिलते रहे हैं। पंजाब बीजेपी के कई नेता पहले ही कह चुके हैं कि पार्टी राज्य की सभी 117 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है।

हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने भी 10 अगस्त को भाजपा और अकाली दल के बीच संभावित गठबंधन की संभावना से इनकार किया था। उन्होंने कहा था कि भाजपा का गठबंधन पंजाब की जनता के साथ है।

इसके अलावा मार्च में मोगा में आयोजित एक कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी कहा था कि भाजपा पंजाब में अपने दम पर सरकार बनाएगी। ऐसे बयानों से साफ है कि पार्टी संगठनात्मक रूप से अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है।

इसलिए अगर भविष्य में SAD-BJP गठबंधन की कोई पहल होती है, तो यह भाजपा की मौजूदा रणनीति में बड़ा बदलाव माना जाएगा।

दोनों पार्टियों के लिए गठबंधन क्यों महत्वपूर्ण हो सकता है?

पंजाब की राजनीति पिछले कुछ वर्षों में काफी बदल चुकी है। आम आदमी पार्टी सत्ता में है, कांग्रेस भी राज्य में अपना आधार बनाए रखने की कोशिश कर रही है और अकाली दल के सामने अपने पुराने राजनीतिक प्रभाव को वापस हासिल करने की चुनौती है।

भाजपा ने भी पंजाब में अपना आधार बढ़ाने की कोशिश की है। अगर SAD और BJP फिर साथ आते हैं तो अकाली दल को भाजपा के शहरी और राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक नेटवर्क का फायदा मिल सकता है। वहीं भाजपा को अकाली दल के ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूद संगठन और पारंपरिक वोट आधार से लाभ मिलने की संभावना होगी।

लेकिन इसके साथ चुनौतियां भी कम नहीं हैं। दोनों पार्टियों के बीच 2020 में कृषि कानूनों को लेकर जो राजनीतिक दूरी बनी थी, वह पूरी तरह खत्म हुई है या नहीं, यह बड़ा सवाल है। इसके अलावा भाजपा अब पहले की तुलना में पंजाब में अपना स्वतंत्र संगठन काफी मजबूत कर चुकी है। ऐसे में पुराने सीट-बंटवारे के फॉर्मूले पर लौटना दोनों पक्षों के लिए आसान नहीं होगा।

सीट शेयरिंग से लेकर वोट बैंक तक बड़ी चुनौती

अगर गठबंधन की दिशा में बातचीत आगे बढ़ती है तो सबसे बड़ा सवाल सीटों के बंटवारे का होगा। पुराने गठबंधन में दोनों पार्टियों की अपनी-अपनी भूमिका और सीटों का एक स्थापित फॉर्मूला था। अब बदले राजनीतिक समीकरण में भाजपा अपने बढ़े हुए संगठनात्मक आधार को देखते हुए अधिक सीटों की मांग कर सकती है।

दूसरी तरफ अकाली दल के लिए अपने पारंपरिक समर्थकों के बीच यह संदेश देना जरूरी होगा कि भाजपा के साथ किसी भी नए समझौते से पंजाब के हित और उसकी राजनीतिक पहचान प्रभावित नहीं होगी।

इसके अलावा दोनों दलों को आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के खिलाफ साझा रणनीति भी तैयार करनी होगी। पंजाब में सत्ता विरोधी माहौल, किसान मुद्दे, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी और राज्य-केंद्र संबंध जैसे मुद्दे चुनावी राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं।

क्या पुराने साथी फिर एक मंच पर आएंगे?

हरसिमरत कौर बादल का बयान और मजीठिया की टिप्पणी निश्चित रूप से SAD-BJP गठबंधन की संभावनाओं को लेकर राजनीतिक चर्चा बढ़ाने वाली है। लेकिन अभी तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है।

एक तरफ अकाली दल की ओर से साथ आने की जरूरत और लोगों की मांग का जिक्र किया जा रहा है, तो दूसरी तरफ भाजपा के नेता लगातार अपने दम पर चुनाव लड़ने की तैयारी की बात कर रहे हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व के बीच बातचीत सबसे महत्वपूर्ण होगी।

फिलहाल इतना जरूर है कि पंजाब की राजनीति में SAD-BJP गठबंधन का मुद्दा फिर से चर्चा के केंद्र में आ गया है। क्या यह सिर्फ चुनावी माहौल में पैदा हुई सियासी गर्मी है या फिर पुराने साथी वास्तव में एक बार फिर हाथ मिलाने जा रहे हैं, इसका जवाब आने वाले राजनीतिक घटनाक्रम से ही मिलेगा।