भूजल सप्ताह-2026: सहजन के बीज और ज्वालामुखीय पत्थर से बच सकता है लाखों लीटर पानी
उत्तर प्रदेश सरकार भूजल संरक्षण और जल संसाधनों के संवर्धन को जनआंदोलन का स्वरूप देने के उद्देश्य से 'भूजल सप्ताह-2026' के तहत प्रदेशभर में जागरूकता अभियान चला रही है।
लखनऊ: उत्तर प्रदेश सरकार भूजल संरक्षण और जल संसाधनों के संवर्धन को जनआंदोलन का स्वरूप देने के उद्देश्य से 'भूजल सप्ताह-2026' के तहत प्रदेशभर में जागरूकता अभियान चला रही है। इसी क्रम में शुक्रवार को भूगर्भ जल विभाग ने 'जल-संवाद' कार्यक्रम आयोजित किया, जिसमें जल संरक्षण से जुड़े विभिन्न विषयों पर विशेषज्ञों ने विचार साझा किए। चर्चा के दौरान घरेलू आरओ सिस्टम से निकलने वाले अतिरिक्त पानी के बेहतर उपयोग पर विशेष जोर दिया गया।
कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने बताया कि मोरिंगा (सहजन) के बीज और स्कोरिया वॉल्केनिक रॉक (छिद्रयुक्त ज्वालामुखीय पत्थर) जैसी प्राकृतिक सामग्रियां जल शोधन की दिशा में उपयोगी साबित हो सकती हैं। इस तकनीक पर आगे विस्तृत शोध, प्रोटोटाइप तैयार करने और परीक्षण की प्रक्रिया शुरू करने पर भी सहमति बनी।
प्राकृतिक तकनीकों पर हुई चर्चा:
'भूजल सप्ताह-2026' के अंतर्गत आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यक्षता भूगर्भ जल विभाग के निदेशक डॉ. राजेश कुमार प्रजापति ने की। बैठक में कम लागत वाली प्राकृतिक जल शोधन तकनीकों पर विस्तार से चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने सहजन के बीज और स्कोरिया रॉक के माध्यम से पानी को शुद्ध करने की संभावनाएं प्रस्तुत कीं। उनका मानना है कि यदि यह तकनीक सफल रहती है तो घरेलू आरओ सिस्टम से प्रतिदिन व्यर्थ होने वाले बड़ी मात्रा के पानी को बचाने में मदद मिल सकती है। विभाग ने इस अवधारणा को सकारात्मक बताते हुए आगे वैज्ञानिक अध्ययन कराने में रुचि दिखाई।
कैसे काम करते हैं सहजन के बीज और स्कोरिया रॉक:
विशेषज्ञों के अनुसार, सहजन के बीजों का पाउडर पानी में मौजूद गंदगी और सूक्ष्म कणों को आपस में जोड़कर नीचे बैठाने में मदद करता है। वहीं स्कोरिया वॉल्केनिक रॉक अपनी छिद्रयुक्त बनावट के कारण प्राकृतिक फिल्टर की तरह कार्य कर अशुद्धियों को कम करने में सहायक हो सकती है। हालांकि इस तकनीक को बड़े स्तर पर लागू करने से पहले और वैज्ञानिक परीक्षण तथा शोध की आवश्यकता बताई गई।
जल संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहन की मांग:
कार्यक्रम में जल संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों ने सुझाव दिया कि जिन गांवों, नगरों और आवासीय परिसरों में वर्षा जल संचयन, रूफटॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग तथा अपशिष्ट जल के पुनर्चक्रण जैसे कार्य प्रभावी ढंग से किए जा रहे हैं, उन्हें विशेष प्रोत्साहन और पुरस्कार दिए जाएं। उनका मानना था कि इससे जल संरक्षण के क्षेत्र में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और अन्य क्षेत्रों को भी प्रेरणा मिलेगी।
इसके अलावा, रिमोट सेंसिंग और जीआईएस जैसी आधुनिक तकनीकों के माध्यम से भूजल भंडारण और जल संरक्षण की मैपिंग कर उसे अभियान से जोड़ने पर भी जोर दिया गया।
जनभागीदारी से ही संभव होगी जल सुरक्षा:
भूगर्भ जल विभाग के निदेशक डॉ. राजेश कुमार प्रजापति ने कहा कि भविष्य की जल आवश्यकताओं को सुरक्षित रखने के लिए केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। उन्होंने कहा कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है और जल संरक्षण को दैनिक जीवन की आदत बनाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।