UP Election 2027: रायबरेली में कांग्रेस के ‘0’ का संकट खत्म कर पाएंगे राहुल गांधी? सोनिया युग लौटाने की बड़ी चुनौती

UP Election 2027 में रायबरेली कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई है। राहुल गांधी की लोकसभा जीत के बाद पार्टी 2022 के विधानसभा चुनाव का ‘0’ बदलने की कोशिश में है। सवाल है कि क्या रायबरेली में कांग्रेस का ‘सोनिया युग’ फिर लौट पाएगा?

By  Laxman September 9th 2026 01:51 PM

रायबरेली: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर कांग्रेस ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं और रायबरेली इस रणनीति के केंद्र में नजर आ रहा है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और रायबरेली सांसद राहुल गांधी का लगातार अपने संसदीय क्षेत्र का दौरा करना इसी दिशा में देखा जा रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी की बड़ी जीत ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नया उत्साह पैदा किया है, लेकिन विधानसभा चुनाव में पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पारंपरिक गढ़ में खाता खोलने की है।

रायबरेली लंबे समय से गांधी परिवार और कांग्रेस की राजनीति से जुड़ा मजबूत क्षेत्र रहा है। लेकिन विधानसभा स्तर पर तस्वीर लोकसभा चुनाव से बिल्कुल अलग है। 2022 में जिले की किसी भी विधानसभा सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी जीत दर्ज नहीं कर सका था। अब सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी अपनी लोकसभा जीत के प्रभाव को विधानसभा सीटों तक पहुंचाकर कांग्रेस को फिर से मजबूत कर पाएंगे?

राहुल गांधी का लगातार रायबरेली दौरा क्यों अहम?

रायबरेली से सांसद चुने जाने के बाद राहुल गांधी लगातार क्षेत्र का दौरा कर रहे हैं। इस बार भी उन्होंने दो दिवसीय दौरे के दौरान पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ बैठक की और अलग-अलग वर्गों के प्रतिनिधियों से संवाद किया।

उन्होंने व्यापारियों से मुलाकात कर उनके कारोबार से जुड़ी समस्याएं सुनीं। सर्राफा कारोबारियों ने सोने-चांदी के व्यापार में गिरावट, महंगाई और बाजार में कम होती क्रयशक्ति जैसे मुद्दे उठाए। राहुल गांधी ने उनकी समस्याओं को संसद और सड़क दोनों स्तरों पर उठाने का भरोसा दिया।

इसके बाद उन्होंने केमिस्ट प्रतिनिधिमंडल से भी बातचीत की। दवा कारोबारियों ने ऑनलाइन दवा बिक्री और बिना चिकित्सकीय पर्चे के दवाओं की बिक्री से पारंपरिक कारोबार पर पड़ रहे असर की शिकायत की।

राहुल गांधी का यह लगातार जनसंवाद कांग्रेस की स्थानीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पार्टी नेतृत्व रायबरेली को केवल सांसद के क्षेत्र के तौर पर नहीं, बल्कि संगठन को दोबारा खड़ा करने के आधार के रूप में देख रहा है।

‘सोनिया एरा’ की वापसी सबसे बड़ी चुनौती

रायबरेली की राजनीति में सोनिया गांधी के दौर को कांग्रेस के मजबूत संगठन से जोड़कर देखा जाता है। सोनिया गांधी के 2004 में रायबरेली से सांसद बनने के बाद 2007 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जिले में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया था।

उस चुनाव में बछरावां, सलोन, सरेनी, ऊंचाहार और हरचंदपुर सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवार विजयी हुए थे। रायबरेली सदर से अखिलेश सिंह निर्दलीय विधायक बने थे। यानी उस दौर में कांग्रेस का प्रभाव विधानसभा स्तर तक दिखाई देता था।

लेकिन इसके बाद पार्टी की स्थिति लगातार कमजोर होती गई। 2012 में कांग्रेस जिले की किसी सीट पर जीत दर्ज नहीं कर सकी। 2017 में रायबरेली और हरचंदपुर से कांग्रेस के टिकट पर अदिति सिंह और राकेश सिंह चुनाव जीते, लेकिन बाद में दोनों भाजपा में चले गए।

2022 में पार्टी के सामने स्थिति और कठिन हो गई। कांग्रेस ने सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी। बछरावां से राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले सुशील पासी पार्टी के ऐसे उम्मीदवार रहे जिनकी जमानत बची।

छह विधानसभा सीटों का गणित

रायबरेली जिले में छह विधानसभा सीटें हैं—रायबरेली सदर, हरचंदपुर, बछरावां, सरेनी, ऊंचाहार और सलोन। इनमें पांच सीटें रायबरेली लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती हैं।

2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने रायबरेली सदर और सलोन सीट जीती थी, जबकि हरचंदपुर, बछरावां, सरेनी और ऊंचाहार में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार विजयी हुए थे।

हालांकि, ऊंचाहार के सपा विधायक मनोज पांडेय बाद में भाजपा में शामिल हो गए। इससे मौजूदा राजनीतिक समीकरणों में भी बदलाव आया है।

यानी राहुल गांधी लोकसभा में मजबूत स्थिति में हैं, लेकिन विधानसभा स्तर पर कांग्रेस के पास फिलहाल कोई विधायक नहीं है। यही विरोधाभास 2027 के चुनाव में पार्टी की सबसे बड़ी परीक्षा बनने वाला है।

2024 के नतीजों ने बढ़ाई उम्मीद

2024 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी ने रायबरेली सीट पर बड़ी जीत दर्ज की। खास बात यह रही कि रायबरेली लोकसभा क्षेत्र में आने वाली सभी पांच विधानसभा सीटों पर उन्हें बढ़त मिली।

कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए यह परिणाम महत्वपूर्ण संकेत है। उनका मानना है कि लोकसभा चुनाव की जीत से जमीनी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा है और पार्टी के लिए विधानसभा चुनाव में नए सिरे से मुकाबला करने का आधार तैयार हुआ है।

राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा की ओर से स्थानीय मुद्दों और संगठन को लेकर सक्रियता भी कांग्रेस के लिए सकारात्मक संकेत मानी जा रही है।

लेकिन लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव की परिस्थितियां अलग होती हैं। विधानसभा में उम्मीदवार की स्थानीय पकड़, जातीय समीकरण, संगठन की ताकत और बूथ स्तर का नेटवर्क अधिक निर्णायक हो सकता है।

सपा के साथ गठबंधन बना तो सीट शेयरिंग होगी चुनौती

कांग्रेस के लिए 2027 में एक और बड़ा सवाल समाजवादी पार्टी के साथ संभावित गठबंधन को लेकर है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन ने उत्तर प्रदेश में अच्छा प्रदर्शन किया था। यदि दोनों दल विधानसभा चुनाव में भी साथ आते हैं, तो रायबरेली में सीटों का बंटवारा आसान नहीं होगा।

वर्तमान में जिले की अधिकांश विधानसभा सीटों पर सपा का प्रभाव या उसका विधायक रहा है। ऐसे में सवाल उठेगा कि क्या सपा अपनी जीती हुई सीटें कांग्रेस के लिए छोड़ेगी?

2017 में भी सपा-कांग्रेस गठबंधन के दौरान रायबरेली की कुछ सीटों पर दोनों दलों के बीच दोस्ताना मुकाबला देखने को मिला था। इसलिए 2027 में गठबंधन होने की स्थिति में सीट शेयरिंग कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण चुनौती बन सकती है।

दूसरी तरफ भाजपा भी रायबरेली को हल्के में नहीं लेने वाली। पार्टी की ओर से विकास योजनाओं, संगठन और सामाजिक समीकरणों के जरिए अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश होगी।

राहुल के सामने सिर्फ जीत नहीं, संगठन खड़ा करने की चुनौती

राहुल गांधी के लिए रायबरेली का चुनाव सिर्फ विधानसभा सीटें जीतने का सवाल नहीं है। यह कांग्रेस की उस राजनीतिक विरासत को दोबारा मजबूत करने की परीक्षा भी है, जो पिछले कुछ वर्षों में कमजोर हुई है।

राहुल गांधी की लोकसभा जीत ने निश्चित रूप से कांग्रेस को मनोबल दिया है, लेकिन विधानसभा चुनाव में उस लहर को सीटों में बदलने के लिए पार्टी को बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करना होगा। स्थानीय नेताओं की पहचान, मजबूत उम्मीदवारों का चयन और अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच लगातार संवाद इसकी कुंजी हो सकता है।

व्यापारियों से लेकर सामाजिक समूहों और पार्टी कार्यकर्ताओं तक राहुल गांधी की सीधी बातचीत को इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

अब असली परीक्षा 2027 में होगी। अगर कांग्रेस रायबरेली की एक या उससे अधिक विधानसभा सीटों पर वापसी करती है, तो इसे पार्टी के पुनरुत्थान का संकेत माना जा सकता है। लेकिन यदि 2022 की तरह फिर खाता नहीं खुलता, तो यह सवाल और मजबूत होगा कि गांधी परिवार का प्रभाव लोकसभा तक तो कायम है, लेकिन विधानसभा स्तर पर कांग्रेस संगठन अभी भी कमजोर है।

इसलिए रायबरेली में 2027 का मुकाबला राहुल गांधी के लिए सिर्फ ‘सांसद बनाम विधायक’ का चुनाव नहीं, बल्कि कांग्रेस के पुराने राजनीतिक आधार को फिर से खड़ा करने की बड़ी परीक्षा है।

© Copyright Galactic Television & Communications Pvt. Ltd. 2026. All rights reserved.