‘मस्जिद को ऐसे नहीं गिरा सकते’, सहारनपुर कार्रवाई पर ओवैसी का योगी सरकार पर हमला
सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर की मस्जिद ध्वस्तीकरण के बाद राजनीतिक विवाद बढ़ गया है। असदुद्दीन ओवैसी ने धार्मिक स्वतंत्रता और पुराने रिकॉर्ड का हवाला देकर सवाल उठाए। अखिलेश यादव और इमरान मसूद ने भी कार्रवाई की आलोचना की, जबकि प्रशासन ने इसे अदालत के आदेश का पालन बताया।
हैदराबाद, सहारनपुर: उत्तर प्रदेश के सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद को शनिवार सुबह करीब 5 बजे ध्वस्त किए जाने के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। एआईएमआईएम प्रमुख और हैदराबाद सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कार्रवाई की कड़ी आलोचना करते हुए सवाल उठाया कि क्या मुसलमानों की धार्मिक स्वतंत्रता अब संवैधानिक संरक्षण के दायरे में नहीं है।
ओवैसी ने कहा कि सहारनपुर कलेक्ट्रेट की मस्जिद को सुबह करीब 5 बजे गिराया गया। उन्होंने दावा किया कि मस्जिद कमेटी ने वर्ष 1911 तक के रिकॉर्ड पेश किए थे, जिनसे वहां लंबे समय से धार्मिक गतिविधियां होने की बात सामने आती है।
‘धार्मिक स्वतंत्रता किसी की दया पर निर्भर नहीं’
ओवैसी ने कहा कि एक सदी से अधिक समय से वहां लगातार नमाज पढ़े जाने के आधार पर मस्जिद कमेटी ने इसे ‘वक्फ बाय यूजर’ के दायरे में बताया था। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि किसी धार्मिक स्थल का सार्वजनिक और निरंतर उपयोग लंबे समय से होता रहा है, तो उसके भूमि अधिकारों को किस तरह देखा जाना चाहिए।
उन्होंने प्रशासनिक कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता किसी प्रशासनिक कृपा पर निर्भर नहीं हो सकती। ओवैसी ने मस्जिदों को कथित रूप से मामूली आधारों पर बुलडोजर कार्रवाई का निशाना बनाए जाने पर भी आपत्ति जताई।
अदालत के आदेश के बाद हुई कार्रवाई
सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर की मस्जिद को लेकर विवाद का केंद्र सरकारी जमीन पर निर्माण और कथित अतिक्रमण का मुद्दा था। भारतीय एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, 16 जुलाई को सिटी मजिस्ट्रेट ने संरचना को सरकारी जमीन पर अनधिकृत निर्माण माना था। इसके खिलाफ दायर अपील को जिला अदालत ने खारिज कर दिया। इसके बाद शनिवार को प्रशासन ने ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की।
रिपोर्टों के मुताबिक, जिला अदालत का हालिया फैसला स्वयं सीधे तौर पर ध्वस्तीकरण का नया आदेश नहीं था, बल्कि उसने पहले के मजिस्ट्रेट आदेश को बरकरार रखा था। प्रशासन ने इसी न्यायिक प्रक्रिया के अनुपालन में कार्रवाई की। मस्जिद पक्ष की ओर से मामले में करीब 6.41 करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति से जुड़ा आदेश भी चुनौती के दायरे में था। स्थानीय अदालत ने कथित सरकारी भूमि अतिक्रमण और उपयोग से जुड़े मामले में यह राशि निर्धारित की थी।
इकरा हसन ने भी जताया विरोध
समाजवादी पार्टी की कैराना सांसद इकरा हसन ने आरोप लगाया कि उन्हें सहारनपुर जाने से रोकने के लिए उनके आवास पर पुलिस तैनात की गई और उन्हें नजरबंद किया गया। उन्होंने मस्जिद के ध्वस्तीकरण को शर्मनाक बताते हुए कहा कि मामले को कानूनी स्तर पर चुनौती दी जाएगी।
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि दूसरे धर्म की आस्था को ठेस पहुंचाने वाला व्यक्ति सच्चा सनातनी नहीं हो सकता। उन्होंने भाजपा सरकार पर धार्मिक मुद्दों के जरिए राजनीतिक लाभ लेने का आरोप लगाया।
प्रशासन ने बताया अदालत के आदेश का पालन
सहारनपुर के डीआईजी अभिषेक सिंह ने कहा कि कलेक्ट्रेट परिसर में मौजूद मस्जिद को सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने सरकारी जमीन पर अवैध निर्माण माना था। मस्जिद कमेटी की अपील खारिज होने के बाद अदालत के आदेश के अनुपालन में ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की गई।
प्रशासन ने संवेदनशीलता को देखते हुए कलेक्ट्रेट और आसपास के इलाकों में सुरक्षा बढ़ाई। पुलिस बल और पीएसी की तैनाती के साथ सोशल मीडिया पर भी निगरानी रखी गई, ताकि अफवाहों और तनाव को फैलने से रोका जा सके।
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने भी उठाए सवाल
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने भी ध्वस्तीकरण की आलोचना की। उन्होंने मस्जिद के पुराने होने का दावा करते हुए कहा कि मामले की कानूनी प्रक्रिया में वक्फ बोर्ड को पक्षकार बनाया गया था या नहीं, इस पर भी सवाल उठाया जाना चाहिए।
इस पूरे घटनाक्रम ने उत्तर प्रदेश में धार्मिक स्थलों, सरकारी भूमि और न्यायिक आदेशों के अनुपालन को लेकर एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। जहां प्रशासन इसे अदालत के आदेश का पालन बता रहा है, वहीं विपक्षी दल और ओवैसी इस कार्रवाई के तरीके और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े सवाल उठा रहे हैं।