Trump’s U-Turn Explained: ईरान पर हमला क्यों टला? क्या तेल, होर्मुज और सैन्य दबाव बना अमेरिका की मजबूरी?
रविवार को ट्रम्प ने दावा किया कि सऊदी अरब, कतर और संयुक्त अरब अमीरात के अनुरोध पर उन्होंने ईरान पर प्रस्तावित नया हमला फिलहाल टाल दिया है। उनके मुताबिक, अमेरिकी सेना दूसरे विश्व युद्ध के बाद के सबसे बड़े हमले के लिए पूरी तरह तैयार थी, लेकिन आखिरी वक्त पर कूटनीति को मौका देने का फैसला लिया गया।
नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच पिछले कई महीनों से चला आ रहा टकराव एक बार फिर एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। कुछ दिन पहले तक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ईरान के खिलाफ एक बड़े सैन्य हमले की खुली चेतावनी दे रहे थे, लेकिन अब उन्होंने कहा है कि तीन अगस्त यानी सोमवार से दोनों देशों के बीच मध्यस्थों के जरिए नई बातचीत शुरू होगी, और फिलहाल किसी नए हमले की योजना टाल दी गई है।
ट्रम्प के इस ऐलान ने जहां दुनिया भर में राहत की उम्मीद जगाई है, वहीं ईरान की प्रतिक्रिया ने इस पूरी कहानी को उलझा भी दिया है। तेहरान ने ट्रम्प के कई दावों से साफ इनकार किया है, जिससे यह सवाल उठना लाजमी है कि आखिर सच क्या है, और क्या यह शांति सच में टिकाऊ है।
सीजफायर टूटने से हमला टलने तक: पूरी टाइमलाइन
इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए पीछे जाना जरूरी है। आठ जुलाई को ट्रम्प ने ऐलान किया था कि पहले से चला आ रहा सीजफायर खत्म हो गया है, जिसके बाद अमेरिका और ईरान के बीच दोबारा हमले शुरू हो गए थे। इसके जवाब में ईरान ने जॉर्डन, कुवैत, बहरीन, ओमान और कतर में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया, जिनमें जॉर्डन और इराक में हुए हमलों में चार अमेरिकी सैनिकों की जान चली गई। तेरह दिनों तक लगातार चली बमबारी के बाद पच्चीस जुलाई को अमेरिका ने आखिरकार हमले रोके, और ट्रम्प ने खुद कहा था कि ईरान के साथ बातचीत अच्छी दिशा में जा रही है।
केश्म द्वीप पर बड़ा बम हमला: NYT की रिपोर्ट ने खड़ी की नई बहस
इसी बमबारी के दौर से जुड़ा एक बेहद गंभीर आरोप भी सामने आया है, जिसने पूरी दुनिया में नई बहस छेड़ दी है। अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपनी एक जांच रिपोर्ट में दावा किया है कि अमेरिका ने ईरान के केश्म द्वीप पर हुए हमले में 2,000 पाउंड का मार्क-84 बम इस्तेमाल किया, जो अमेरिकी सेना के सबसे बड़े पारंपरिक बमों में गिना जाता है। अखबार के मुताबिक, यह दावा वीडियो, तस्वीरों, सैटेलाइट इमेज और हथियार विशेषज्ञों के विश्लेषण पर आधारित है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यह हमला घनी आबादी वाले इलाके में हुआ, जिसके बाद यह सवाल उठ रहा है कि इतने बड़े बम का इस्तेमाल क्यों किया गया, और असली निशाना क्या था। इस पर ईरानी अधिकारियों का आरोप है कि हमले में एक रिहायशी मकान पूरी तरह तबाह हो गया, जिसमें एक दंपती और उनका दो साल का बच्चा मारा गया।
वहीं अमेरिकी सेंट्रल कमांड की तरफ से इस पर सफाई दी गई है कि अमेरिकी सेना जानबूझकर नागरिकों को निशाना नहीं बनाती। यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह पूरा दावा फिलहाल न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट और ईरानी अधिकारियों के बयान पर टिका है, और इसकी कोई स्वतंत्र या आधिकारिक अमेरिकी पुष्टि अब तक सामने नहीं आई है।
ट्रम्प का यू-टर्न: हमला टला, बातचीत का ऐलान
इसी बीच 31 जुलाई को कैंप डेविड में ट्रम्प का रुख फिर बदल गया था, जब उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर बहुत जोरदार हमला किया जाएगा। लेकिन उसके अगले ही दिनों में स्थिति फिर पलट गई। रविवार को ट्रम्प ने दावा किया कि सऊदी अरब, कतर और संयुक्त अरब अमीरात के अनुरोध पर उन्होंने ईरान पर प्रस्तावित नया हमला फिलहाल टाल दिया है। उनके मुताबिक, अमेरिकी सेना दूसरे विश्व युद्ध के बाद के सबसे बड़े हमले के लिए पूरी तरह तैयार थी, लेकिन आखिरी वक्त पर कूटनीति को मौका देने का फैसला लिया गया।
ट्रम्प ने यह भी दावा किया कि एक समझौते की रूपरेखा पर सहमति बन चुकी है, जिसमें होर्मुज स्ट्रेट को तुरंत खोलना और ईरान के परमाणु खतरे को खत्म करना शामिल है, और इस पूरे फैसले में इजराइल भी अमेरिका के साथ है। एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि हम जब चाहें कार्रवाई कर सकते हैं, लेकिन वे लोगों को मारना नहीं चाहते।
ईरान का पलटवार: ट्रम्प के दावों को सिरे से खारिज
लेकिन ईरान की तरफ से इस पूरी तस्वीर को सिरे से खारिज किया गया है। तेहरान ने ट्रम्प के इस दावे से साफ दूरी बना ली कि ईरान ने हमला रोकने की अपील की थी। ईरानी सरकारी मीडिया ने कहा कि होर्मुज स्ट्रेट को तत्काल और पूरी तरह खोलने की खबरें आधारहीन हैं, और जब तक अमेरिका अपनी शत्रुतापूर्ण कार्रवाई जारी रखेगा, यह रास्ता बंद ही रहेगा। ईरानी सांसद इब्राहिम रेजाई ने यहां तक चेतावनी दी कि अगर हमला हुआ तो जवाब सिर्फ खाड़ी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया में जहां-जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने हैं, उन्हें निशाना बनाया जाएगा।
हालांकि सऊदी अरब, कतर और ओमान जैसे खाड़ी देशों ने तनाव कम करने और बातचीत जारी रखने पर लगातार जोर दिया है। मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलो रॉस हैरिसन के मुताबिक, ईरान इस पूरे घटनाक्रम को अपनी रणनीतिक जीत की तरह भी देख सकता है, और जब तक होर्मुज को लेकर कोई पक्की, दोनों पक्षों से पुष्टि की गई सहमति नहीं बनती, तब तक मौजूदा शांति को स्थायी नहीं माना जा सकता।
होर्मुज स्ट्रेट: सिर्फ 33 किलोमीटर, लेकिन दुनिया की सबसे अहम जलधारा
इस पूरे विवाद के केंद्र में जो एक नाम बार-बार आ रहा है, वह है होर्मुज स्ट्रेट। दुनिया के नक्शे पर यह सिर्फ करीब तैंतीस किलोमीटर चौड़ा एक समुद्री रास्ता दिखता है, लेकिन रणनीतिक और आर्थिक नजरिए से इसकी अहमियत कहीं ज्यादा बड़ी है। यह फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है, और सऊदी अरब, इराक, कुवैत, कतर, संयुक्त अरब अमीरात तथा ईरान जैसे प्रमुख ऊर्जा उत्पादक देशों के लिए यही समुद्री रास्ता उपलब्ध कराता है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसियों के मुताबिक, दुनिया के समुद्री रास्ते से होने वाले कच्चे तेल व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा इसी जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है, और इसके अलावा दुनिया की बड़ी मात्रा में एलएनजी, खासकर कतर की प्राकृतिक गैस की आपूर्ति भी इसी मार्ग से होती है। यही वजह है कि ईरान बार-बार इस स्ट्रेट को एक दबाव के हथियार की तरह इस्तेमाल करता आया है। जब भी अमेरिका या इजराइल की तरफ से सैन्य कार्रवाई की आशंका बढ़ती है, ईरान की तरफ से होर्मुज को रोकने या वहां जहाजों को निशाना बनाने की धमकियां तेज हो जाती हैं।
हाल ही में होर्मुज से गुजर रहे कतर के एक एलएनजी टैंकर पर हमला भी हुआ, सुरक्षा एजेंसियों ने इसकी पहचान गैसलॉग शंघाई के तौर पर की। इससे पहले ओमान तट के पास एक और टैंकर पर हमला हुआ था, जिससे उसका इंजन रूम क्षतिग्रस्त हो गया और वह समंदर में ही फंस गया।
भारत पर असर: नाविकों की जान से लेकर पेट्रोल-डीजल तक
भारत के लिए भी होर्मुज स्ट्रेट की अहमियत बेहद बड़ी है, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल खाड़ी देशों से आयात करता है। अगर इस रास्ते में किसी भी तरह की रुकावट आती है, तो तेल की सप्लाई प्रभावित हो सकती है, समुद्री माल ढुलाई और बीमा का खर्च बढ़ सकता है, और इसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस, हवाई किराए और आम महंगाई तक दिखाई दे सकता है।
बड़ी संख्या में भारतीय नाविक भी इन्हीं जलमार्गों पर काम करते हैं, और सरकार ने संसद में बताया है कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के दौरान अब तक 16 भारतीय नागरिकों की मौत हो चुकी है, जिनमें 10 भारतीय नाविक शामिल हैं, वहीं 75 भारतीय घायल हुए हैं। यही वजह है कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ईरानी विदेश मंत्री से फोन पर बात कर कारोबारी जहाजों और नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की है।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने भी माना है कि दुनिया को सिर्फ होर्मुज पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, और वैकल्पिक समुद्री रास्ते तैयार करने होंगे, हालांकि विशेषज्ञ इसे आसान नहीं मानते, क्योंकि इसके लिए भारी निवेश और वर्षों की तैयारी चाहिए होगी।
अमेरिका की अपनी मजबूरी: क्यों घट रहा है मिसाइल डिफेंस का जखीरा
अगर अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य ताकत है, तो फिर ईरान के खिलाफ हर कदम इतनी सावधानी से क्यों उठाया जा रहा है? इसका एक बड़ा जवाब खुद अमेरिका के भीतर से मिलता है। सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज यानी सीएसआईएस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जंग शुरू होने से पहले अमेरिका के पास करीब 2,300 पैट्रियट इंटरसेप्टर थे, जो अब घटकर 827 से भी कम रह गए हैं, वहीं THAAD इंटरसेप्टर का स्टॉक 452 से घटकर 278 से नीचे पहुंच गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, इस स्टॉक को दोबारा भरने में करीब तीन साल का वक्त लग सकता है, और इसी वजह से पेंटागन ने 2026 के आपातकालीन बजट में इंटरसेप्टर मिसाइलों और अन्य हथियारों की खरीद के लिए 18.2 अरब डॉलर की रकम प्रस्तावित की है। वॉशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि अमेरिकी सेना के एक वरिष्ठ जनरल ने पेंटागन को निजी तौर पर आगाह किया है कि उनके पास इतने नौसैनिक संसाधन नहीं बचे कि इजराइल की लगातार रक्षा की जा सके। यानी अमेरिका की झिझक की एक बड़ी वजह यह भी है कि लंबी जंग लड़ने के लिए उसके अपने सैन्य संसाधन सीमित पड़ते जा रहे हैं।
तेल बाजार पर असर: धमकी बढ़े तो दाम ऊपर, सुलह हो तो दाम नीचे
यही सैन्य अनिश्चितता है, जो सीधे वैश्विक बाजार को हिलाती है। ईरान पर संभावित अमेरिकी कार्रवाई की खबरों के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखा गया था, लेकिन जैसे ही ट्रम्प ने हमला टालने का ऐलान किया, तस्वीर पूरी तरह पलट गई। ब्रेंट क्रूड 4.08 डॉलर यानी 4.64 फीसदी टूटकर 83.85 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया, वहीं WTI क्रूड 4.01 डॉलर यानी 4.74 फीसदी गिरकर 80.66 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। इसके उलट, पिछले महीने जब अमेरिका ने ईरान पर हमला किया था और तेहरान ने ओमान के पास टैंकरों पर जवाबी कार्रवाई की थी, तब यही दोनों बेंचमार्क बीस फीसदी से ज्यादा उछल गए थे। विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल बाजार की सबसे बड़ी चिंता जंग नहीं, बल्कि तेल की सप्लाई को लेकर अनिश्चितता है।
इसी बीच OPEC के सात प्रमुख सदस्य देशों, सऊदी अरब, रूस, इराक, कुवैत, कजाकिस्तान, अल्जीरिया और ओमान ने भी सितंबर से तेल उत्पादन बढ़ाने का फैसला किया है। इन देशों ने रोजाना करीब 1.88 लाख बैरल अतिरिक्त उत्पादन पर सहमति जताई है, और इसके साथ ही 2023 में लागू की गई 16.5 लाख बैरल प्रतिदिन की स्वैच्छिक उत्पादन कटौती भी पूरी तरह खत्म हो जाएगी। लेकिन विश्लेषकों की राय है कि अगर संघर्ष दोबारा भड़कता है, या होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो उत्पादन बढ़ने के बावजूद तेल की कीमतें फिर तेजी से चढ़ सकती हैं।
भारत जैसे देश के लिए, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, यह पूरा उतार-चढ़ाव सीधे पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस, हवाई किराए, माल ढुलाई और अंततः रोजमर्रा की महंगाई से जुड़ जाता है। यानी होर्मुज में एक मिसाइल गिरे, या वॉशिंगटन से ट्रम्प का एक बयान आए, उसका असर सिर्फ अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कुछ ही घंटों में वह असर तेल के दाम, शेयर बाजार और आखिरकार आम आदमी की रसोई तक पहुंच जाता है।
निष्कर्ष: हमले का नहीं, भरोसे का सवाल
फिलहाल तस्वीर यह है कि ट्रम्प ने हमला टाल दिया है, बातचीत शुरू होने का ऐलान भी हो चुका है, लेकिन जमीन पर कोई ठोस, दोनों पक्षों से पुष्टि किया गया समझौता अब तक सामने नहीं आया है। ईरान की तरफ से लगातार आ रहे खंडन और सख्त बयान बताते हैं कि भरोसा अभी पूरी तरह लौटा नहीं है।
ऐसे में असली सवाल यह नहीं रह जाता कि अगला हमला होगा या नहीं, बल्कि यह है कि क्या दुनिया अब ऐसी स्थिति में पहुंच चुकी है, जहां किसी एक देश के एक सैन्य या कूटनीतिक फैसले से पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा बदल सकती है, और अगर ऐसा है, तो इसकी सबसे बड़ी कीमत आखिर कौन चुकाएगा, सरकारें, या हजारों किलोमीटर दूर बैठे आम लोग, जिनका इस जंग से सीधा कोई लेना-देना नहीं है।