नई दिल्ली: ₹370 बिरयानी विवाद को लेकर कॉमेडियन प्रणीत मोरे की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार के साथ महाराष्ट्र और हरियाणा सरकार से जवाब मांगा। मोरे ने विवाद से जुड़े अलग-अलग राज्यों में दर्ज दो एफआईआर को एक साथ क्लब करने की मांग की है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं, ने याचिका पर नोटिस जारी किया। यह मामला Pranit More v. State of Maharashtra and Others, W.P. (Crl.) No. 367/2026 के रूप में दर्ज है।

यह विवाद गुरुग्राम में आयोजित प्रणीत मोरे के स्टैंड-अप शो के दौरान हुई एक बातचीत से शुरू हुआ था। कार्यक्रम में मौजूद दर्शक हिमांशु जांगड़ा ने एक महिला के साथ डेट से जुड़ा अपना अनुभव बताया था। जांगड़ा ने बताया था कि उसने डेट के दौरान करीब 370 रुपये की बिरयानी पर खर्च किए थे। इसके बाद उसने महिला से शारीरिक अंतरंगता की अपेक्षा से जुड़ी टिप्पणी की। कार्यक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद इस बातचीत को लेकर व्यापक आलोचना हुई। विवाद में प्रणीत मोरे की भूमिका को लेकर भी सवाल उठे। आरोप लगाया गया कि उन्होंने बातचीत को रोकने या टिप्पणी पर हस्तक्षेप करने के बजाय उसे जारी रहने दिया। हालांकि, मामले में दर्ज एफआईआर आरोप हैं और इन पर अदालत में अंतिम निष्कर्ष अभी नहीं आया है।

महाराष्ट्र और हरियाणा में दर्ज हुईं एफआईआर

विवाद के बाद महाराष्ट्र साइबर पुलिस ने प्रणीत मोरे, हिमांशु जांगड़ा और अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। इसके बाद हरियाणा के गुरुग्राम में भी अलग मामला दर्ज किया गया। दोनों मामलों का संबंध उसी वायरल घटना से बताया गया है। रिपोर्टों के मुताबिक, मामलों में भारतीय न्याय संहिता (BNS) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की विभिन्न धाराएं लगाई गई हैं। महाराष्ट्र मामले में आपत्तिजनक सामग्री और उसके ऑनलाइन प्रसार से जुड़े प्रावधान भी शामिल हैं।

मोरे ने सुप्रीम कोर्ट से क्या मांग की?

प्रणीत मोरे ने सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए महाराष्ट्र और हरियाणा में दर्ज एफआईआर को क्लब करने की मांग की है। उनका कहना है कि दोनों मामले एक ही घटना से संबंधित हैं और अलग-अलग राज्यों में समान विवाद को लेकर समानांतर कार्रवाई हो रही है। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल एफआईआर रद्द करने का आदेश नहीं दिया है। सोमवार की सुनवाई में अदालत ने केंद्र और दोनों राज्य सरकारों से जवाब मांगा है।

NCW ने भी लिया था संज्ञान

इस विवाद पर राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने स्वतः संज्ञान लिया था। आयोग की ओर से घटना को लेकर कार्रवाई की गई और संबंधित लोगों को नोटिस/समन जारी किए गए थे। गुरुग्राम में दर्ज एफआईआर भी NCW की शिकायत के बाद हुई पुलिस कार्रवाई से जुड़ी बताई गई है। विवाद बढ़ने के बाद प्रणीत मोरे और हिमांशु जांगड़ा की ओर से सार्वजनिक रूप से माफी भी मांगी गई थी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, मोरे ने बाद में कहा था कि उन्हें उस बातचीत के दौरान हस्तक्षेप करना चाहिए था।

अभी सुप्रीम कोर्ट में क्या स्थिति है?

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने केवल संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। एफआईआर में लगाए गए आरोपों की सुनवाई और उनकी कानूनी वैधता पर अंतिम फैसला अभी बाकी है। इसलिए एफआईआर में दर्ज आरोपों को दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता। अदालत के सामने मौजूदा याचिका का प्रमुख मुद्दा अलग-अलग राज्यों में दर्ज मामलों को एक साथ क्लब करने की मांग है। आगे की कार्यवाही केंद्र, महाराष्ट्र और हरियाणा की ओर से दाखिल किए जाने वाले जवाबों के बाद तय होगी।