नई दिल्ली: भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों पुराना सिंधु जल विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार मुद्दा सीमा या सीधे आतंकवाद का नहीं, बल्कि पानी का है। पाकिस्तान के जलवायु परिवर्तन मंत्री मुसादिक मलिक ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारत को सीधी धमकी देते हुए कहा कि जो भी पाकिस्तान के हिस्से के पानी पर हाथ डालेगा, उसके हाथ काट दिए जाएंगे। उनके साथ मौजूद सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार ने भी दावा किया कि सिंधु जल संधि एक कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौता है, जिसे कोई देश एकतरफा समाप्त या निलंबित नहीं कर सकता।
लेकिन सवाल सिर्फ इस बयान का नहीं है। सवाल यह है कि पाकिस्तान को पानी की इतनी चिंता अचानक आज ही क्यों है? क्या भारत ने कोई नया फैसला लिया है? क्या यह सचमुच डर है, या सिर्फ घरेलू राजनीति का दबाव है?
एक तरफ धमकी, दूसरी तरफ नई सैन्य साजिश
दिलचस्प बात यह है कि जिस वक्त पाकिस्तान के मंत्री पानी की दुहाई देकर "विक्टिम कार्ड" खेल रहे हैं, ठीक उसी समय पाकिस्तान के आर्मी चीफ भारत के खिलाफ एक बड़ी और नई सैन्य साजिश रचते हुए बताए जा रहे हैं। यानी एक तरफ आतंकवाद और ड्रोन की साजिश चल रही है, दूसरी तरफ कूटनीतिक मंच पर पानी को लेकर भारत को घेरने की कोशिश हो रही है। पाकिस्तान अब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी सिंधु जल संधि को लेकर भारत के खिलाफ माहौल बनाने में जुटा है। सवाल यही उठता है, आखिर भारत की नई जल रणनीति से पाकिस्तान इतना बेचैन क्यों है?
विवाद की जड़ः पहलगाम हमला
यह तीखी प्रतिक्रिया अचानक नहीं आई है। अप्रैल 2025 में हुए पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने स्पष्ट कर दिया था कि जब तक पाकिस्तान अपनी धरती से संचालित सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ विश्वसनीय और ठोस कार्रवाई नहीं करता, तब तक सिंधु जल संधि पहले की तरह लागू नहीं रहेगी। साथ ही भारत ने अपने हिस्से के जल संसाधनों के अधिकतम उपयोग की दिशा में काम भी तेज कर दिया है। यही फैसला अब पाकिस्तान की बेचैनी की मुख्य वजह माना जा रहा है।
यह पहला मौका भी नहीं है जब पाकिस्तानी नेताओं ने इस मुद्दे पर आक्रामक रुख अपनाया हो। इससे पहले रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ भी पानी के मसले को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ते हुए तीखे बयान दे चुके हैं।
क्या यह सिर्फ पानी की चिंता है, या ध्यान भटकाने की कोशिश?
पाकिस्तान इस समय गंभीर आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है- महंगाई, विदेशी कर्ज, राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा संकट लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे माहौल में भारत-विरोधी बयान वहां की राजनीति का जाना-पहचाना तरीका रहे हैं, कभी कश्मीर, कभी सीमा, और अब पानी। ऐसे में सवाल लाजमी है कि क्या यह वाकई पानी की चिंता है, या आंतरिक आर्थिक संकट और जनता के असंतोष से ध्यान भटकाने की एक रणनीति?
1960 की संधि, जो तीन युद्धों के बाद भी बची रही
सिंधु जल संधि यानी इंडस वॉटर्स ट्रीटी पर वर्ष 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता में भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते के तहत रावी, ब्यास और सतलुज नदियों का जल भारत को मिला, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब के अधिकांश जल का अधिकार पाकिस्तान को दिया गया।
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हालांकि पश्चिमी नदियों पर भी भारत को सीमित सिंचाई, घरेलू उपयोग, जलविद्युत परियोजनाओं और निर्धारित सीमा तक जल भंडारण के अधिकार प्राप्त हैं — यानी भारत के अधिकार केवल पूर्वी नदियों तक सीमित नहीं हैं।

करीब छह दशकों तक यह संधि 1965 और 1971 के युद्धों तथा कारगिल संघर्ष जैसे कठिन दौर में भी औपचारिक रूप से लागू रही। पहलगाम हमले के बाद पहली बार भारत ने इस व्यवस्था को स्थगित रखने का सख्त रुख अपनाया।
पाकिस्तान की 90 फीसदी खेती सिंधु पर निर्भर
पाकिस्तान की बेचैनी की सबसे बड़ी वजह उसकी अर्थव्यवस्था है। पाकिस्तान की लगभग 90 प्रतिशत सिंचित कृषि भूमि सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर मानी जाती है। गेहूं, चावल, कपास और गन्ने जैसी प्रमुख फसलें इन्हीं नदियों के सहारे तैयार होती हैं। कई बड़े शहरों में पीने के पानी और बिजली उत्पादन का बड़ा हिस्सा भी इन्हीं नदियों पर निर्भर है। यही वजह है कि सिंधु को पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा की जीवनरेखा माना जाता है।

दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान की जल समस्या सिर्फ भारत से जुड़ी नहीं है। उसके भीतर पंजाब और सिंध प्रांत के बीच भी पानी के बंटवारे को लेकर लंबे समय से विवाद चलता रहा है। सिंध की ओर से कई बार आरोप लगाए गए हैं कि उसे तय हिस्से से कम पानी मिल रहा है, जबकि पंजाब पर अधिक पानी इस्तेमाल करने के आरोप लगते रहे हैं। यही वजह है कि जब भारत अपने हिस्से के पानी का अधिकतम उपयोग करने की बात करता है, तो पाकिस्तान को आशंका सताती है कि इससे उसके भीतर पहले से मौजूद जल वितरण का दबाव और बढ़ सकता है, खासकर सिंध जैसे निचले प्रांतों में।
क्या भारत वाकई पाकिस्तान का पानी रोक सकता है?
इसका जवाब राजनीतिक बयानों जितना आसान नहीं है। किसी सरकारी आदेश से नदियों का रुख रातोंरात नहीं बदलता- इसके लिए बड़े बांध, जलाशय, नहरें और वर्षों तक चलने वाली परियोजनाएं चाहिए। यानी यह किसी एक फैसले की नहीं, बल्कि लंबे समय की रणनीति का हिस्सा है।
भारत इसी दिशा में जम्मू-कश्मीर और पंजाब में किरू, क्वार, रतले और शाहपुर कंडी जैसी परियोजनाओं पर तेजी से काम कर रहा है। इन परियोजनाओं का मकसद सिर्फ बिजली उत्पादन नहीं, बल्कि संधि के तहत मिले जल अधिकारों का बेहतर उपयोग भी है। लंबे समय तक भारत के हिस्से का काफी पानी बिना उपयोग के पाकिस्तान की ओर बहता रहा; अब बेहतर जल प्रबंधन के जरिए इसे देश के भीतर खेती, पेयजल और विकास कार्यों में लगाने की तैयारी है।
भारत का रुख स्पष्ट है, वह किसी दूसरे देश का वैध हिस्सा नहीं रोक रहा, बल्कि अपने वैध अधिकारों के तहत मिलने वाले संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल अपने किसानों, राज्यों और विकास परियोजनाओं के लिए करना चाहता है। और सवाल भी यही है — अगर भारत अपने वैध अधिकारों का इस्तेमाल कर रहा है, तो उसे किसी दूसरे देश के नजरिए से क्यों देखा जाए?
निष्कर्षः अब सिर्फ पानी का मसला नहीं
विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद अब केवल जल बंटवारे तक सीमित नहीं रहा। इसमें अंतरराष्ट्रीय कानून, राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद, कूटनीति और भविष्य की रणनीतिक योजना- सभी एक साथ जुड़ चुके हैं। आने वाले समय में भारत का हर फैसला न केवल दोनों देशों के रिश्तों, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की सामरिक तस्वीर को प्रभावित कर सकता है।
भारत के सामने चुनौती सिर्फ अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने की नहीं है, बल्कि ऐसा करते हुए अंतरराष्ट्रीय भरोसा, रणनीतिक संतुलन और राष्ट्रीय हित- तीनों को साथ लेकर चलने की भी है। वहीं पाकिस्तान के सामने भी एक सवाल है- क्या हर चुनौती का जवाब धमकी ही होगा, या बातचीत और जिम्मेदार कूटनीति का रास्ता चुना जाएगा?
जैसा कि इतिहास सिखाता है- युद्ध सीमाओं को बदल सकते हैं, लेकिन नदियों को नहीं। सवाल यही है कि क्या आने वाला वक्त बातचीत और जिम्मेदार कूटनीति का रास्ता चुनेगा, या पानी सच में दक्षिण एशिया की अगली बड़ी लड़ाई की वजह बनेगा।
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