नई दिल्ली: दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने कथित ठग सुकेश चंद्रशेखर को भ्रष्टाचार से जुड़े एक मामले में रिहा करने का आदेश दिया है। अदालत ने पाया कि इस मामले में वह अधिकतम सात साल की निर्धारित सजा से भी ज्यादा समय जेल में बिता चुका है। हालांकि, इस आदेश का मतलब सुकेश की जेल से पूरी रिहाई नहीं है। दूसरे आपराधिक मामलों में आरोपी होने के कारण वह हिरासत में बना रहेगा, यदि उन मामलों में उसकी जरूरत है।
विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) विद्या प्रकाश ने निर्देश दिया कि सुकेश चंद्रशेखर को इस मामले में तत्काल रिहा किया जाए, बशर्ते किसी अन्य मामले में उसकी हिरासत जरूरी न हो। अदालत ने उसे अगली सुनवाई की तारीख तक या उससे पहले एक लाख रुपये का व्यक्तिगत मुचलका जमा करने का भी निर्देश दिया है।
Delhi court orders Sukesh Chandrashekhar's release in 2017 PC Act case
report by @prashantjha996
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— Bar and Bench (@barandbench) October 30, 2026
निर्धारित अधिकतम सजा से अधिक समय जेल में रहा सुकेश
सुकेश चंद्रशेखर ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 436A, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 479 और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आवेदन दाखिल किया था। उसके वकील अनंत मलिक ने दलील दी कि आरोपी इस मामले में उन अपराधों के लिए निर्धारित अधिकतम सजा से अधिक समय जेल में बिता चुका है।
अदालत के सामने जेल प्रशासन की ओर से पेश नाममात्र रिकॉर्ड (Nominal Roll) के मुताबिक, 27 अक्टूबर 2026 तक सुकेश कुल 8 साल, 9 महीने और 14 दिन हिरासत में रह चुका था। इसमें अंतरिम जमानत और कस्टडी पैरोल की अवधि को शामिल नहीं किया गया था। इस तरह वह सात साल की अधिकतम निर्धारित सजा से 1 साल, 9 महीने और 14 दिन अधिक समय जेल में बिता चुका था।
सुकेश को इस मामले में 24 अक्टूबर 2017 को गिरफ्तार किया गया था। उसके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 12 और भारतीय दंड संहिता की धारा 120B के साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 12 के तहत 13 अक्टूबर 2022 को आरोप तय किए गए थे।
अदालत ने धारा 436A को अनिवार्य बताया
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि धारा 436A के दूसरे प्रावधान के तहत किसी विचाराधीन कैदी को संबंधित अपराध के लिए निर्धारित अधिकतम सजा की अवधि से अधिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता। न्यायाधीश ने कहा कि कानून में 'शैल' शब्द का इस्तेमाल यह स्पष्ट करता है कि यह प्रावधान अनिवार्य प्रकृति का है।
अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष ने न तो यह आरोप लगाया और न ही यह साबित किया कि सुकेश चंद्रशेखर ने किसी भी स्तर पर सुनवाई में देरी कराई थी। इसलिए धारा 436A के तहत आरोपी की वजह से हुई देरी को हिरासत की अवधि से बाहर रखने वाला अपवाद इस मामले में लागू नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला
अदालत ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का उल्लेख किया। इनमें भीम सिंह बनाम भारत संघ, सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम सीबीआई, हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य के गृह सचिव और सुप्रीम कोर्ट लीगल एड कमेटी बनाम भारत संघ शामिल हैं।
अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने विचाराधीन कैदियों की रिहाई पर जोर दिया है, खासकर उन मामलों में जहां वे संबंधित अपराध के लिए निर्धारित अधिकतम सजा से अधिक समय हिरासत में बिता चुके हों। ऐसी स्थिति में हिरासत जारी रखना गैरकानूनी और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है।
अभियोजन पक्ष ने जताई थी गवाहों को प्रभावित करने की आशंका
अभियोजन पक्ष ने सुकेश की याचिका का विरोध करते हुए कहा था कि उसके खिलाफ अलग-अलग राज्यों में 29 आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (MCOCA) के तहत गंभीर आरोप भी शामिल हैं।
सरकार की ओर से यह आशंका भी जताई गई कि रिहा होने पर सुकेश महत्वपूर्ण गवाहों को प्रभावित या डराने की कोशिश कर सकता है, जिससे मुकदमे की निष्पक्ष सुनवाई प्रभावित हो सकती है। अभियोजन ने यह भी दलील दी कि 21 सितंबर 2022 के पिछले जमानत आदेश में मांगे गए जमानती मुचलके जमा नहीं करने का लाभ उसे नहीं मिलना चाहिए।
हालांकि, अदालत ने माना कि मौजूदा मामले में सुनवाई में देरी के लिए सुकेश को जिम्मेदार ठहराने का कोई आधार नहीं दिखाया गया है। इसलिए निर्धारित अधिकतम सजा से अधिक समय तक उसकी हिरासत जारी रखना उचित नहीं है।
रिहाई के साथ कई शर्तें लागू
अदालत ने स्पष्ट किया कि इस मामले में रिहाई 21 सितंबर 2022 के आदेश में तय शर्तों के अधीन होगी। सुकेश चंद्रशेखर को किसी भी गवाह से सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से संपर्क करने अथवा उसे प्रभावित करने से रोका गया है। उसे इसी तरह के अपराधों में शामिल नहीं होने, अदालत की पूर्व अनुमति के बिना देश नहीं छोड़ने और पता बदलने पर अदालत को जानकारी देने का निर्देश भी दिया गया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका आदेश केवल धारा 436A के तहत दाखिल आवेदन पर फैसला करने तक सीमित है। इसे मामले के गुण-दोष या आरोपों पर अदालत की राय नहीं माना जाएगा।
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