तेल कीमतों में उछाल और युद्ध तनाव के बीच रुपया 93.94 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर गिरा...

By  Preeti Kamal March 23rd 2026 12:40 PM -- Updated: March 23rd 2026 12:00 PM

नई दिल्ली: भारतीय रुपया सप्ताह की शुरुआत में भारी दबाव में रहा और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 93.94 के नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। इस गिरावट के साथ ही रुपया अपने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ गया, जो बढ़ती वैश्विक अनिश्चितता को दर्शाता है। यह तेज गिरावट पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच आई है, जहां जारी संघर्ष चौथे सप्ताह में प्रवेश कर चुका है और फिलहाल शांति के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं।

इस स्थिति ने ऊर्जा आपूर्ति में लंबे समय तक व्यवधान की आशंका बढ़ा दी है, जिसका असर उभरते बाजारों की मुद्राओं, खासकर रुपये पर पड़ा है। एशियाई मुद्राओं में भी कमजोरी देखने को मिली, जो 0.1% से 0.8% तक गिरीं, क्योंकि संघर्ष कम होने की उम्मीदें कमजोर पड़ गई हैं। बढ़ते भू-राजनीतिक जोखिम और डोनाल्ड ट्रंप व ईरान के बीच जारी बयानबाजी ने बाजारों में अनिश्चितता बनाए रखी है।

 कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल रुपये की गिरावट का कारण

रुपये की गिरावट का एक बड़ा कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल है, जो इस महीने 50% से अधिक बढ़ चुकी हैं। दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक होने के कारण भारत की मुद्रा ऊर्जा कीमतों के प्रति बेहद संवेदनशील है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) पहले ही चेतावनी दे चुकी है कि मौजूदा संकट पिछले तेल झटकों जितना गंभीर या उससे भी अधिक हो सकता है।

निफ्टी 50 अहम स्तरों से नीचे फिसल गया

घरेलू शेयर बाजारों में भी इसका असर साफ दिख रहा है। निफ्टी 50 अहम स्तरों से नीचे फिसल गया है, जबकि सेंसेक्स में भी बड़ी गिरावट दर्ज की गई है, जो वैश्विक जोखिम से बचाव की प्रवृत्ति को दर्शाता है। संघर्ष शुरू होने के बाद से रुपया करीब 3% कमजोर हो चुका है। विश्लेषकों का मानना है कि अगर तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं तो इसमें और गिरावट आ सकती है। बैंक ऑफ अमेरिका के अनुमान के अनुसार, 2026 के मध्य तक रुपया 94 के स्तर को छू सकता है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि संकट किस दिशा में आगे बढ़ता है।

₹1 लाख करोड़ से अधिक की विदेशी पूंजी बाजार से निकल चुकी

इसके अलावा, विदेशी निवेशकों की लगातार निकासी भी दबाव बढ़ा रही है। इस साल अब तक ₹1 लाख करोड़ से अधिक की विदेशी पूंजी बाजार से निकल चुकी है, जिससे निवेशकों का भरोसा कमजोर हुआ है और रुपये पर दबाव और बढ़ गया है। भू-राजनीतिक तनाव, तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव और विदेशी पूंजी की निकासी के बीच रुपये की दिशा अब काफी हद तक वैश्विक ऊर्जा बाजार और जारी संघर्ष के घटनाक्रम पर निर्भर करेगी।

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