CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में नई याचिका, फैसलों में कथित केंद्रीकरण का आरोप

CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक और याचिका दायर किए जाने का दावा सामने आया है। इसमें चुनाव आयोग के फैसलों में कथित केंद्रीकरण और अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना निर्णय लेने के आरोप लगाए गए हैं।

By  Preeti Kamal September 28th 2026 01:00 PM -- Updated: September 28th 2026 12:49 PM

नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक और याचिका दायर किए जाने का दावा सामने आया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि चुनाव आयोग के नाम पर कुछ महत्वपूर्ण फैसले अन्य दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—की सहमति के बिना लिए गए। याचिका में चुनाव आयोग के कामकाज में कथित रूप से निर्णय लेने की प्रक्रिया के केंद्रीकरण, एजेंडा और बैठक के कार्यवृत्त में देरी तथा मतदाता सूची से जुड़े डिजिटल और प्रक्रियात्मक बदलावों पर सवाल उठाए गए हैं।

यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद और आयोग के कामकाज को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कानूनी चुनौतियां बढ़ रही हैं। दिए गए विवरण के अनुसार, याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग जैसे तीन सदस्यीय संवैधानिक निकाय में निर्णय लेने की प्रक्रिया में धीरे-धीरे अधिकारों का केंद्रीकरण हुआ। याचिका में कथित तौर पर एजेंडा और बैठक के कार्यवृत्त उपलब्ध कराने में देरी, मतदाता सूची से जुड़ी प्रक्रियाओं में बदलाव और कुछ मामलों में अपील दायर किए जाने को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

पहले भी सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है SIR विवाद

याचिकाकर्ता का आरोप है कि कुछ फैसले अन्य दोनों चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए, जबकि आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त के अलावा दो चुनाव आयुक्त भी शामिल हैं। चुनाव आयोग की आधिकारिक निर्देशिका में वर्तमान में ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त तथा सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी को चुनाव आयुक्त के रूप में दर्ज किया गया है।

इससे पहले अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। इसमें SIR से जुड़े कथित फैसलों, दिशा-निर्देशों और सॉफ्टवेयर में किए गए बदलावों को चुनौती दी गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि कुछ निर्णय दोनों चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए। इसमें मूल वैधानिक फॉर्म-6 को बहाल करने और SIR से जुड़े मतदाता आंकड़ों की जांच के लिए स्वतंत्र जांच या विशेष जांच दल गठित करने की मांग भी की गई है। याचिकाकर्ता ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के अलावा वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग और निर्वाचन आयोग की सूचना प्रौद्योगिकी शाखा से जुड़ी अधिकारी सीमा खन्ना के खिलाफ कथित कर्तव्य उल्लंघन पर कार्रवाई की मांग भी की है।

फॉर्म-6 में बदलाव का भी मामला

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में कथित बदलाव का मुद्दा भी उठाया गया है। याचिका के मुताबिक, ECINet और ERONet जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फॉर्म-6 से संबंधित बदलाव किए गए। याचिकाकर्ता का दावा है कि ऐसे बदलाव वैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं थे और मूल फॉर्म को बहाल किया जाना चाहिए। इसी मामले में याचिका ने चुनावी डेटा और डिजिटल प्रणालियों की फॉरेंसिक जांच की मांग भी की है। हालांकि, याचिका में लगाए गए आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट की ओर से अंतिम निष्कर्ष आना बाकी है।

14 बार आपत्तियों का मुद्दा कैसे उठा?

विवाद की पृष्ठभूमि में इंडियन एक्सप्रेस की वह रिपोर्ट है, जिसमें दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले कुछ महीनों में SIR से जुड़े फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट में फॉर्म-6 में बदलाव, मतदाता सूची से नाम हटाने और बहाल करने तथा चुनावी डेटा के प्रबंधन जैसे मुद्दों का उल्लेख किया गया था। इन्हीं रिपोर्टों के बाद SIR और चुनाव आयोग के आंतरिक कामकाज को लेकर राजनीतिक तथा कानूनी विवाद तेज हुआ।

चुनाव आयोग ने क्या कहा?

इन आरोपों के बीच चुनाव आयोग ने कहा है कि किसी संस्थान में अलग-अलग विचार और टिप्पणियां आंतरिक विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा हैं। आयोग का कहना है कि पिछले एक साल में उसके सभी आदेश पूर्ण आयोग के सर्वसम्मत निर्णयों का परिणाम रहे हैं। इसलिए याचिकाओं में लगाए गए कथित एकतरफा निर्णयों के आरोप और चुनाव आयोग के इस आधिकारिक रुख के बीच अंतर बना हुआ है। मामले में अंतिम कानूनी स्थिति सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और उसके आदेशों से स्पष्ट होगी।

सीजेपी प्रवक्ता सौरव दास ने क्या कहा?

इस पूरे विवाद पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रवक्ता सौरव दास ने भी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि ज्ञानेश कुमार की जवाबदेही का मुद्दा केवल अदालतों तक सीमित नहीं होना चाहिए। दास ने SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट की पिछली कार्यवाही का हवाला देते हुए न्यायपालिका की भूमिका पर सवाल उठाए और कहा कि अदालतों में दायर नई याचिकाओं की सुनवाई अपनी जगह है, लेकिन उनकी पार्टी के अनुसार राजनीतिक और लोकतांत्रिक जवाबदेही का सवाल अलग है। उनके बयान में SIR के दौरान मतदाता नामों को हटाए जाने और पश्चिम बंगाल में चुनावी प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर दावे किए गए। ये उनके राजनीतिक संगठन के आरोप और राय हैं, जिन्हें स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य के रूप में नहीं देखा जा सकता।

अब आगे क्या?

ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग के कामकाज से जुड़े विवाद में अब सुप्रीम कोर्ट के सामने एक से अधिक याचिकाएं पहुंच चुकी हैं। इनमें कुछ याचिकाएं SIR की प्रक्रिया, मतदाता सूची में बदलाव और चुनावी डेटा के प्रबंधन से जुड़े आरोपों की जांच की मांग कर रही हैं। फिलहाल इन याचिकाओं में लगाए गए आरोपों पर कोई अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं आया है। चुनाव आयोग ने दूसरी ओर SIR से जुड़े निर्णयों को पूर्ण आयोग के सर्वसम्मत निर्णय बताया है। ऐसे में आगे की तस्वीर सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई और संबंधित पक्षों के जवाबों से स्पष्ट होगी।

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