स्टील का टिफिन, चंपक और 2 रुपये का सिक्का... 90s Kids की अनमोल यादें

90 के दशक का स्कूल बैग सिर्फ किताबों और कॉपियों तक सीमित नहीं था। स्टील का टिफिन, पेंसिल बॉक्स, कॉमिक्स और छोटे-छोटे सिक्के उस दौर की सादगी, दोस्ती और मासूम बचपन की पहचान थे।

By  Laxman July 7th 2026 08:00 PM -- Updated: July 7th 2026 06:14 PM

आज के बच्चों के स्कूल बैग में लैपटॉप, टैबलेट, स्मार्ट गैजेट्स और आधुनिक स्टेशनरी आसानी से देखने को मिल जाती है। लेकिन अगर बात 90 के दशक की करें, तो उस समय का स्कूल बैग सिर्फ पढ़ाई का सामान रखने की जगह नहीं था, बल्कि बचपन की अनगिनत यादों का एक चलता-फिरता खजाना हुआ करता था। उस दौर की हर छोटी-सी चीज आज भी लोगों के चेहरे पर मुस्कान ले आती है। स्टील का टिफिन, धातु का पेंसिल बॉक्स, चंपक कॉमिक्स और जेब खर्च के लिए रखा 1 या 2 रुपये का सिक्का आज भी 90s किड्स की यादों में ताजा है।

स्टील का पेंसिल बॉक्स था स्टाइल की पहचान

90 के दशक में प्लास्टिक के बजाय स्टील का पेंसिल बॉक्स बच्चों की पहली पसंद होता था। उसमें पेंसिल, रबड़, शार्पनर और स्केल करीने से रखे जाते थे। कई बच्चे अपने नाम का स्टिकर भी उस पर चिपकाते थे। नटराज या अप्सरा की पेंसिल और सफेद रबड़ हर छात्र के बैग का जरूरी हिस्सा होती थी। पेंसिल को ब्लेड से नुकीला बनाना भी किसी कला से कम नहीं माना जाता था।

स्टील का टिफिन और दोस्तों के साथ लंच शेयर करना

स्कूल की घंटी बजते ही सबसे पहले बैग से स्टील का टिफिन बाहर निकलता था। उसमें घर की बनी रोटी, सब्जी, पराठा या अचार होता था। लेकिन उस दौर की सबसे खूबसूरत बात यह थी कि बच्चे अपना खाना अकेले नहीं खाते थे। दोस्त मिलकर टिफिन बदल-बदलकर खाते थे और यही दोस्ती की सबसे प्यारी याद बन जाती थी।

किताबों पर अखबार और भूरे कागज का कवर

नया सत्र शुरू होते ही किताबों पर अखबार या भूरे कागज का कवर चढ़ाना एक खास काम होता था। बच्चे बड़े गर्व से अपने हाथों से नाम, क्लास और सेक्शन लिखते थे। कई बच्चे रंग-बिरंगे स्टिकर लगाकर अपनी किताबों को अलग पहचान भी देते थे।

पेंसिल बॉक्स में छिपा रहता था 1 या 2 रुपये का सिक्का

90 के दशक में बच्चों के पास ज्यादा जेब खर्च नहीं होता था। मां अक्सर पेंसिल बॉक्स या बैग की छोटी जेब में 1 या 2 रुपये रख देती थीं। स्कूल की छुट्टी के बाद इन्हीं पैसों से आइसक्रीम, संतरे वाली टॉफी, इमली, चूरन गोली या बर्फ का गोला खरीदने का अलग ही मजा होता था।

चंपक और कॉमिक्स का अलग ही क्रेज

उस समय मोबाइल या सोशल मीडिया नहीं था। बच्चों की सबसे बड़ी एंटरटेनमेंट पार्टनर होती थीं चंपक, नंदन, लोटपोट और दूसरी कॉमिक्स। कई बच्चे इन्हें छिपाकर स्कूल ले जाते थे और लंच ब्रेक में दोस्तों के साथ मिलकर पढ़ते थे। टीचर के आने की आहट मिलते ही कॉमिक्स तुरंत बैग के अंदर गायब हो जाती थी।

स्कूल बैग में सिर्फ सामान नहीं, यादें भी रहती थीं

उस दौर का स्कूल बैग केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं था। उसमें दोस्ती, मासूमियत, छोटी-छोटी खुशियां और बचपन के अनगिनत किस्से भी साथ चलते थे। आज तकनीक ने बच्चों की पढ़ाई का तरीका बदल दिया है, लेकिन 90 के दशक की सादगी और अपनापन आज भी लोगों के दिलों में बसा हुआ है।

आज भी ताजा हैं वो सुनहरे दिन

90s के बच्चों के लिए स्कूल बैग सिर्फ एक बैग नहीं था, बल्कि बचपन की सबसे खूबसूरत यादों का हिस्सा था। स्टील का टिफिन, पेंसिल बॉक्स, चंपक कॉमिक्स और दो रुपये का सिक्का आज भी उस दौर को याद कर चेहरे पर मुस्कान ला देते हैं। शायद यही वजह है कि 90 का दशक आज भी "गोल्डन एरा ऑफ चाइल्डहुड" कहा जाता है।

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