Explained: Punjab Politics: BJP-SAD गठबंधन में देरी क्यों? CM Face और Seat Sharing पर अटका पेंच

Punjab Politics में BJP-SAD Alliance को लेकर चर्चाएं तेज हैं। बीजेपी भले ही 117 सीटों पर अकेले चुनाव की तैयारी कर रही हो, लेकिन गठबंधन की संभावना बनी हुई है। सूत्रों के मुताबिक CM Face और Seat Sharing पर सहमति बनना सबसे बड़ी चुनौती है।

By  Laxman August 27th 2026 05:38 PM

चंडीगढ़: पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 से पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) और शिरोमणि अकाली दल (SAD) के संभावित गठबंधन को लेकर सियासी हलचल तेज है। दोनों दलों के नेताओं की ओर से फिलहाल आधिकारिक तौर पर गठबंधन का ऐलान नहीं किया गया है, लेकिन राजनीतिक गतिविधियों और नेताओं के बयानों के बीच साथ आने की चर्चाएं लगातार मजबूत हो रही हैं।

दिलचस्प बात यह है कि एक तरफ बीजेपी सार्वजनिक रूप से पंजाब की सभी 117 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी की बात कर रही है, तो दूसरी तरफ पार्टी के भीतर SAD के साथ संभावित समझौते को लेकर बातचीत जारी होने की खबरें हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि अगर दोनों दलों के बीच गठबंधन की संभावना इतनी मजबूत है, तो फिर औपचारिक घोषणा में देरी क्यों हो रही है?

117 सीटों पर तैयारी, फिर गठबंधन की चर्चा क्यों?

बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव संगठन बीएल संतोष के पंजाब दौरे के दौरान पार्टी ने स्पष्ट संकेत दिया कि वह विधानसभा चुनाव को लेकर संगठनात्मक स्तर पर पूरी तैयारी कर रही है। बीजेपी का फोकस बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करने और राज्य में अपना जनाधार बढ़ाने पर है।

पार्टी की पंजाब इकाई भी लगातार यह संदेश देती रही है कि वह सभी 117 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। हालांकि, इसके बावजूद अकाली दल के साथ संभावित गठबंधन की बातचीत की खबरों ने राजनीतिक समीकरणों को दिलचस्प बना दिया है।

दरअसल, दोनों दलों के लिए पंजाब की मौजूदा राजनीति में एक-दूसरे की जरूरत अलग-अलग कारणों से महसूस की जा रही है। अकाली दल को अपने पुराने राजनीतिक आधार को मजबूत करने की चुनौती है, जबकि बीजेपी राज्य में अपने संगठन और वोट शेयर का विस्तार करने की कोशिश कर रही है।

पहला बड़ा सवाल- गठबंधन का CM Face कौन?

संभावित गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती मुख्यमंत्री पद के चेहरे को लेकर बताई जा रही है।

बीजेपी और अकाली दल लंबे समय तक पंजाब में सहयोगी रहे हैं। जब दोनों दलों की गठबंधन सरकार बनी, तब मुख्यमंत्री का पद अकाली दल के पास रहा। सुखबीर सिंह बादल इस पुराने राजनीतिक समीकरण के सबसे प्रमुख चेहरों में रहे हैं।

लेकिन 2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर दोनों पार्टियों के रास्ते अलग हो गए। इसके बाद पंजाब की राजनीति में बीजेपी की स्थिति पहले की तुलना में बदली है। पार्टी अब खुद को पहले की तरह केवल सहयोगी की भूमिका में सीमित रखना नहीं चाहती।

ऐसे में सबसे अहम सवाल यह है कि अगर गठबंधन होता है तो क्या बीजेपी सुखबीर सिंह बादल को मुख्यमंत्री पद के चेहरे के तौर पर स्वीकार करेगी?

अगर इस मुद्दे पर सहमति नहीं बनती है, तो दोनों दल बिना किसी घोषित मुख्यमंत्री चेहरे के चुनाव लड़ सकते हैं। हालांकि, पंजाब जैसे राज्य में चुनाव से पहले मुख्यमंत्री का चेहरा गठबंधन की रणनीति और मतदाताओं के संदेश के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है।

Seat Sharing भी आसान नहीं

दूसरा बड़ा पेंच विधानसभा सीटों के बंटवारे को लेकर है।

पिछले गठबंधन में बीजेपी अपेक्षाकृत कम सीटों पर चुनाव लड़ती थी, जबकि अकाली दल ज्यादा सीटों पर मैदान में उतरता था। लेकिन इस बार बीजेपी का दावा है कि पंजाब में उसका राजनीतिक आधार पहले की तुलना में मजबूत हुआ है।

2024 के लोकसभा चुनाव के विधानसभा क्षेत्रवार आंकड़ों को देखें तो बीजेपी कई सीटों पर मजबूत स्थिति में रही थी। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक पार्टी 23 विधानसभा क्षेत्रों में पहले स्थान पर रही, जबकि कई अन्य सीटों पर भी उसने अच्छा प्रदर्शन किया।

दूसरी तरफ अकाली दल का पारंपरिक आधार अब भी पंजाब की राजनीति में महत्वपूर्ण है, खासकर ग्रामीण और पंथिक राजनीति के लिहाज से। यही वजह है कि सीट बंटवारे को लेकर दोनों दलों के लिए पुराना फार्मूला स्वीकार करना आसान नहीं होगा। बीजेपी ज्यादा सीटों की मांग कर सकती है, जबकि अकाली दल के लिए अपने मजबूत क्षेत्रों को छोड़ना राजनीतिक रूप से नुकसानदायक हो सकता है।

बीजेपी खुद को 'बड़ा भाई' मान रही है

गठबंधन की बातचीत में सबसे अहम बदलाव बीजेपी की बदली हुई भूमिका है। पुराने समीकरण में अकाली दल पंजाब में प्रमुख पार्टी थी और बीजेपी सहयोगी की भूमिका में चुनाव लड़ती थी।

अब बीजेपी पंजाब में अपने विस्तार को लेकर ज्यादा आक्रामक है। पार्टी संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने, नए मतदाताओं तक पहुंचने और ग्रामीण क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ाने पर जोर दे रही है।

यही कारण है कि संभावित गठबंधन में बीजेपी पहले की तुलना में ज्यादा सीटों की मांग कर सकती है। अगर पार्टी खुद को 'बड़े भाई' की भूमिका में रखना चाहती है, तो अकाली दल के लिए इस नए समीकरण को स्वीकार करना एक महत्वपूर्ण राजनीतिक फैसला होगा।

2024 के नतीजों ने बदली बातचीत की दिशा

लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन ने भी दोनों दलों के बीच सीट बंटवारे की बातचीत को प्रभावित किया है।

दिए गए आंकड़ों के अनुसार 2024 में पंजाब में बीजेपी का वोट शेयर 18.56 फीसदी रहा, जबकि अकाली दल को 13.42 फीसदी वोट मिले। यह आंकड़ा बीजेपी को पहले की तुलना में ज्यादा मजबूत दावा पेश करने का आधार देता है।

हालांकि विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव से अलग होते हैं और स्थानीय उम्मीदवार, क्षेत्रीय मुद्दे तथा जातीय-सामाजिक समीकरणों का प्रभाव काफी ज्यादा होता है। इसलिए केवल लोकसभा के आंकड़ों के आधार पर विधानसभा सीटों का बंटवारा करना दोनों दलों के लिए पर्याप्त नहीं होगा।

गठबंधन दोनों के लिए क्यों जरूरी दिख रहा है?

अकाली दल के सामने अपने पारंपरिक वोट बैंक को बचाने और राजनीतिक प्रभाव को दोबारा मजबूत करने की चुनौती है। दूसरी ओर बीजेपी पंजाब में अपने दम पर विस्तार करना चाहती है, लेकिन पार्टी यह भी समझती है कि राज्य की ग्रामीण और पंथिक राजनीति में अकाली दल की जमीनी मौजूदगी अब भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

यही वजह है कि गठबंधन के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं दिखते। दोनों दलों के नेताओं के बीच बातचीत की खबरें इसी संभावित जरूरत की ओर इशारा करती हैं।

हालांकि, गठबंधन सिर्फ चुनावी गणित से तय नहीं होगा। मुख्यमंत्री का चेहरा, सीटों का बंटवारा और दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल जैसे मुद्दे भी अंतिम फैसले में बड़ी भूमिका निभाएंगे।

2020 के बाद फिर साथ आने की कोशिश?

बीजेपी और अकाली दल का रिश्ता करीब ढाई दशक पुराना रहा है। दोनों पार्टियां लंबे समय तक एनडीए का हिस्सा रहीं और पंजाब में गठबंधन सरकार भी चलाती रहीं। लेकिन सितंबर 2020 में कृषि कानूनों के विरोध के बीच अकाली दल ने बीजेपी से दूरी बना ली।

इसके बाद 2022 विधानसभा चुनाव और 2024 लोकसभा चुनाव दोनों दलों ने अलग-अलग लड़े। दोनों चुनावों में उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली।

अब 2027 का चुनाव दोनों पार्टियों के लिए अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने का बड़ा मौका है। ऐसे में पुराने सहयोगी फिर साथ आते हैं या नहीं, इस पर पंजाब की राजनीति की दिशा काफी हद तक निर्भर कर सकती है।

फिलहाल तस्वीर यह है कि बीजेपी चुनावी तैयारी में अकेले आगे बढ़ रही है, लेकिन गठबंधन की संभावना को पूरी तरह खारिज भी नहीं कर रही। अंतिम फैसला मुख्यमंत्री के चेहरे और सीटों के बंटवारे पर सहमति बनने के बाद ही संभव दिखाई देता है। इसलिए गठबंधन की घोषणा में देरी का सबसे बड़ा कारण यही दो मुद्दे माने जा रहे हैं।

© Copyright Galactic Television & Communications Pvt. Ltd. 2026. All rights reserved.