Explained: किसानों ने घेरा चंडीगढ़ बॉर्डर, US ट्रेड डील बनी सबसे बड़ी चिंता! जानें क्या हैं मांगें

Punjab Farmers Protest: चंडीगढ़-मोहाली बॉर्डर पर हजारों किसानों का पक्का मोर्चा जारी है। US Trade Deal के विरोध के साथ MSP की कानूनी गारंटी, कर्जमाफी, पंजाब के पानी और गन्ने के दाम समेत कई मांगों को लेकर किसान मैदान में हैं।

By  Laxman September 3rd 2026 09:30 PM -- Updated: September 3rd 2026 06:58 PM

चंडीगढ़/मोहाली: पंजाब की धरती एक बार फिर संघर्ष की गवाह बन रही है। चंडीगढ़-मोहाली बॉर्डर पर हजारों किसान अपने ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के साथ डेरा जमाए बैठे हैं। एक सितंबर से शुरू हुआ ये पक्का मोर्चा सात सितंबर तक चलेगा। संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) के बैनर तले पंजाब के 32 किसान संगठनों की साझा ताकत एक बार फिर मैदान में उतर आई है। मांगें कई हैं, MSP की कानूनी गारंटी, कर्ज माफी, पंजाब का पानी, गन्ने का सही दाम, लेकिन इस बार आंदोलन के केंद्र में एक और बड़ा मुद्दा है, जो पहले से कहीं ज्यादा तीखा है: भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौता, जिसे किसान अपनी खेती के लिए सीधा खतरा मान रहे हैं।

तीन दिन बीत चुके हैं, और आंदोलन थमने का नाम नहीं ले रहा। हर गुजरते दिन के साथ किसानों की तादाद बढ़ती जा रही है, चंडीगढ़ और मोहाली को जोड़ने वाली सड़कों पर ट्रैफिक जाम जैसे हालात बन रहे हैं, और सरकार की तरफ से अब तक खामोशी बनी हुई है।

कैसे शुरू हुआ पक्का मोर्चा

एक सितंबर की सुबह पंजाब के अलग-अलग जिलों से ट्रैक्टर-ट्रॉलियां निकलीं। किसान अपने साथ सिर्फ नारे और झंडे लेकर नहीं आए, बल्कि हफ्तों तक धरने पर टिके रहने की पूरी तैयारी के साथ पहुंचे। ट्रॉलियों में सूखा राशन, बिस्तर, कुर्सियां, गद्दे, चूल्हे, गैस सिलेंडर और जरूरत का हर सामान लदा था। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक कई किसान परिवार तो करीब दो महीने तक चलने लायक राशन साथ लेकर आए हैं। सोमवार शाम से ही किसान फेज-11 और आईसर चौक के आसपास जुटने लगे थे, और मंगलवार सुबह तक ये जमावड़ा एक स्थायी बस्ती जैसा आकार ले चुका था, मंच लग चुका था, लंगर की व्यवस्था हो चुकी थी और ट्रॉलियों की कतारें दूर तक फैली हुई थीं।

सेक्टर-48 के पास ट्रैक्टर-ट्रॉलियों की तादाद इतनी बढ़ गई कि पार्किंग की जगह तक कम पड़ गई। किसान नेताओं के मुताबिक दूसरे दिन तक ही मोर्चे में करीब 5500 कार्यकर्ता पहुंच चुके थे, जिनके साथ लगभग 700 ट्रैक्टर, पिकअप वाहन, बसें और ट्रक मौजूद थे, साथ ही करीब 50 पानी के टैंकर भी धरनास्थल पर लगाए गए। कुछ किसान नेताओं ने दावा किया कि तीसरे दिन तक मोर्चे में बीस हजार से ज्यादा लोग पहुंच चुके हैं। किसान नेता बलबीर सिंह राजेवाल ने इसे चंडीगढ़ बॉर्डर पर SKM का अब तक का पहला इतना बड़ा आयोजन बताया।

SKM के झंडे तले कौन-कौन शामिल, कौन बाहर

इस पूरे आंदोलन की अगुवाई संयुक्त किसान मोर्चा यानी SKM कर रहा है, जिसमें पंजाब के 32 किसान संगठन शामिल हैं। इनमें भारतीय किसान यूनियन राजेवाल, भारतीय किसान यूनियन डकोंदा, कीर्ति किसान यूनियन, भारतीय किसान यूनियन शादिपुर और पंजाब किसान यूनियन जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं। मंच से बलबीर सिंह राजेवाल, हरिंदर सिंह लखोवाल, बूटा सिंह बुर्जगिल, हरमीत सिंह कादियां और कई दूसरे किसान नेता लगातार किसानों को संबोधित कर रहे हैं। लंगर सेवा की जिम्मेदारी मुख्य रूप से भारतीय किसान यूनियन राजेवाल के कार्यकर्ताओं ने संभाली है।

हालांकि एक बात साफ करनी जरूरी है,  भारतीय किसान यूनियन एकता उगराहां SKM का सहयोगी सदस्य (associate member) जरूर है, लेकिन वो इस मोहाली-चंडीगढ़ धरने का हिस्सा नहीं है। संगठन ने इससे अलग हटकर डिप्टी कमिश्नरों के दफ्तरों के बाहर अपना प्रदर्शन करने का फैसला किया है। इसके अलावा जम्हूरी किसान सभा ने SKM के इस सात दिवसीय मोर्चे में शामिल होने का ऐलान किया है, वहीं BKU एकता उगराहां ने चार सितंबर को सरकारी कर्मचारियों के चल रहे संघर्ष को समर्थन देने की बात कही है। यानी अलग-अलग मुद्दों पर चल रहे आंदोलन इस वक्त एक-दूसरे के साथ खड़े होने की कोशिश कर रहे हैं।

मोर्चे को मिल रहा सामाजिक समर्थन

सिर्फ किसान संगठन ही नहीं, इस आंदोलन को अब सामाजिक और सांस्कृतिक समर्थन भी मिलने लगा है। पंजाबी गायक रेशम सिंह अनमोल खुद मोर्चे पर पहुंचे और लंगर सेवा में हाथ बंटाया। उन्होंने लंगर बना रही महिलाओं के पैर तक दबाए। मोर्चे पर रोज लंगर लग रहा है, किसान खुद खाना बना रहे हैं, कपड़े धो रहे हैं, सड़क किनारे आराम कर रहे हैं,  पूरा धरनास्थल एक अस्थायी बस्ती की शक्ल ले चुका है। मोहाली के कुछ गुरुद्वारों की तरफ से भी किसानों के लिए लंगर और पानी की अतिरिक्त व्यवस्था की जा रही है, ताकि दिन-रात यहां डटे किसानों को खाने-पीने की दिक्कत न हो।

ट्रैफिक अस्तव्यस्त, 4000 पुलिसकर्मी तैनात

इतने बड़े जमावड़े का सीधा असर आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ रहा है। चंडीगढ़ और मोहाली को जोड़ने वाली मुख्य सड़क के एक हिस्से पर किसानों का डेरा है, जबकि दूसरी तरफ से ट्रैफिक निकाला जा रहा है। आईसर चौक से बेस्टेक मॉल और आगे जगतपुरा की तरफ जाने वाला रास्ता बुरी तरह प्रभावित है। 

फैदां बैरियर से पूर्व मार्ग की तरफ ट्रैफिक डायवर्ट कर दिया गया है, सेक्टर-48 लाइट पॉइंट से सेक्टर 48-49 की आंतरिक सड़कों की तरफ आवाजाही पर पाबंदी है, और सेक्टर 49-50 से चंडीगढ़ जाने वाला रास्ता भी नियंत्रित किया जा रहा है। एयरपोर्ट जाने वाले यात्रियों को अतिरिक्त समय लेकर निकलने की सलाह दी गई है, क्योंकि प्रदर्शन वाला इलाका एयरपोर्ट रोड के करीब ही पड़ता है।

बुधवार को बॉर्डर और आसपास के इलाकों में कई जगह जाम जैसे हालात भी देखने को मिले, क्योंकि एक तरफ लगातार नए किसान मोर्चे पर पहुंच रहे थे, दूसरी तरफ रोजाना इस रास्ते से गुजरने वाले लोगों की आवाजाही भी सामान्य रूप से जारी थी। 

मोहाली डीएसपी हरसिमरन बल के मुताबिक, किसानों के जुटते ही पुलिस बल तैनात कर दिया गया था, ताकि स्थिति और ट्रैफिक व्यवस्था को नियंत्रण में रखा जा सके। प्रशासन की कोशिश है कि सड़क का कम से कम एक हिस्सा हमेशा खुला रहे, ताकि दोनों शहरों के बीच संपर्क पूरी तरह न कटे। सुरक्षा के लिहाज से चंडीगढ़ बॉर्डर पर करीब चार हजार पुलिसकर्मी और रैपिड एक्शन फोर्स के जवान तैनात किए गए हैं, और लगभग सभी बॉर्डर पॉइंट्स पर बैरिकेडिंग की गई है।

किसान नेताओं ने साफ किया है कि आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण रहेगा। उनका कहना है कि वो सरकार से बातचीत के लिए हमेशा तैयार हैं, लेकिन उन्हें सिर्फ आश्वासन नहीं, ठोस कार्रवाई चाहिए।

Indo-US डील, जिसने आंदोलन को नई धार दी है

इस पूरे आंदोलन का सबसे तीखा पहलू है, भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता। आसान भाषा में समझें तो दोनों देश आपसी कारोबार बढ़ाने के लिए कई वस्तुओं पर आयात शुल्क और दूसरी व्यापारिक पाबंदियां घटाने को लेकर बातचीत कर रहे हैं, ताकि अमेरिकी सामान भारत में आसानी से और सस्ते दाम पर आ सके, और भारतीय सामान को भी अमेरिकी बाजार में ज्यादा पहुंच मिले। लेकिन असली विवाद कृषि क्षेत्र को लेकर खड़ा हुआ है।

किसान संगठनों की सबसे बड़ी चिंता ये है कि अगर अमेरिकी कृषि उत्पादों पर भारत में आयात शुल्क घटा, तो अमेरिकी सामान भारतीय बाजार में सस्ता पड़ सकता है। अमेरिका में खेती बड़े पैमाने पर, ज्यादा मशीनीकरण और भारी सरकारी सब्सिडी के साथ होती है, जबकि भारत में बड़ी संख्या में किसान छोटी जोत पर निर्भर हैं। ऐसे में किसान संगठनों को डर है कि दोनों देशों के किसानों के बीच बराबरी का मुकाबला मुमकिन ही नहीं है।

मक्का, सोयाबीन और दूसरी कृषि उपज को लेकर खास चिंता जताई जा रही है- किसानों का कहना है कि अगर अमेरिकी उत्पाद सस्ते दाम पर भारतीय बाजार में उतरने लगे, तो घरेलू फसलों की कीमत पर सीधा दबाव पड़ेगा। लेकिन सिर्फ फसलें ही नहीं, चिंता डेयरी क्षेत्र को लेकर भी उतनी ही गहरी है। पंजाब में बड़ी संख्या में छोटे किसान खेती के साथ-साथ पशुपालन भी करते हैं, और दूध से होने वाली कमाई उनकी अतिरिक्त आमदनी का बड़ा जरिया है। किसान नेताओं को डर है कि अगर अमेरिकी डेयरी उत्पादों को भारतीय बाजार में ज्यादा पहुंच मिली, तो सस्ते विदेशी उत्पाद घरेलू दूध कारोबार पर दबाव बना सकते हैं।

यही वजह है कि किसान संगठन मांग कर रहे हैं कि कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को इस समझौते से पूरी तरह बाहर रखा जाए। किसानों का ये भी सवाल है कि अगर बातचीत चल रही है, तो इसकी शर्तें आम किसानों के सामने पूरी तरह पारदर्शी क्यों नहीं हैं। उनकी मांग है कि किसी भी अंतिम फैसले से पहले किसानों और दूसरे संबंधित पक्षों से बातचीत हो, और उन्हें भरोसा दिलाया जाए कि उनकी आजीविका पर कोई खतरा नहीं आएगा।

सरकार का पक्ष: “किसानों के हितों से समझौता नहीं होगा”

केंद्र सरकार लगातार कहती रही है कि भारत अपने किसानों के हितों की कीमत पर कोई व्यापार समझौता नहीं करेगा। कृषि को बातचीत में "संवेदनशील क्षेत्र" बताया गया है, और सरकार का कहना है कि कोई भी समझौता तभी होगा जब वो भारत के हित में हो। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल पहले ही कह चुके हैं कि समझौता संतुलित होना चाहिए और किसानों, कामगारों, कारोबारियों तथा उपभोक्ताओं, सभी के लिए फायदेमंद होना चाहिए। फरवरी में सरकार की तरफ से जारी जानकारी में भी कहा गया था कि डेयरी, मांस, पोल्ट्री और कई अनाज जैसे संवेदनशील कृषि क्षेत्रों को सुरक्षा दी गई है।

लेकिन किसान संगठन इस भरोसे से संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि खेती करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी है, इसलिए फैसला सिर्फ व्यापार बढ़ाने के नजरिए से नहीं, बल्कि किसान की लागत, फसल की कीमत, MSP और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले असर को ध्यान में रखकर लिया जाना चाहिए। किसानों का सीधा सवाल है- अगर व्यापार भी बढ़ेगा और किसान भी सुरक्षित रहेगा, तो इसकी गारंटी क्या है? यही सवाल अमेरिका के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते को इस आंदोलन का सबसे बड़ा मुद्दा बना चुका है, और किसान नेता बलबीर सिंह राजेवाल पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि अगर सरकार ने किसानों के हितों को नजरअंदाज करके अमेरिका के साथ कोई समझौता किया, तो पूरे देश में चक्का जाम किया जाएगा और रेल यातायात भी रोका जाएगा।

मांगों की पूरी फेहरिस्त - US डील अकेला मुद्दा नहीं

अमेरिका के साथ प्रस्तावित ट्रेड डील के अलावा भी किसानों की मांगों की एक लंबी सूची है। कुछ मांगें सीधे केंद्र सरकार से जुड़ी हैं, तो कुछ का सीधा संबंध पंजाब सरकार और राज्य के अधिकारों से है।

सबसे बड़ी मांग है -  22 फसलों के लिए MSP की कानूनी गारंटी। SKM चाहता है कि MSP सिर्फ सरकार की तरफ से घोषित कीमत भर न रहे, बल्कि किसानों को इसका कानूनी अधिकार मिले। संगठन डॉ. स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक C2 प्लस 50 प्रतिशत के फॉर्मूले पर MSP तय करने की मांग कर रहे हैं- यानी खेती की पूरी लागत पर 50 प्रतिशत मुनाफा जोड़कर कीमत तय हो। इसके साथ किसानों और खेत मजदूरों की पूरी कर्जमाफी और एक बेहतर फसल बीमा व्यवस्था की मांग भी उठाई जा रही है।

दूसरा बड़ा मुद्दा है पंजाब का पानी। SKM चाहता है कि पंजाब के नदी जल से जुड़े पुराने समझौतों की दोबारा समीक्षा हो, और पंजाब विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर इस पर प्रस्ताव पास किया जाए। साथ ही पंजाब पुनर्गठन कानून की संबंधित धाराओं को हटाने और भाखड़ा-ब्यास प्रबंधन बोर्ड (BBMB) में पंजाब का प्रतिनिधित्व बहाल करने की मांग भी है। यानी पानी का मुद्दा सिर्फ सिंचाई तक नहीं, बल्कि राज्य के संसाधनों और अधिकारों तक फैला हुआ है। इसकी पृष्ठभूमि में केंद्रीय जल आयोग की वो रिपोर्ट भी है, जिसके मुताबिक पंजाब के 153 में से 133 ब्लॉक भूजल के मामले में अति-दोहित या गंभीर स्थिति में पहुंच चुके हैं।

गन्ना किसानों के लिए मांग है कि दाम 500 रुपये प्रति क्विंटल तय हो, और निजी चीनी मिलों में भुगतान भी एक तय व्यवस्था के तहत हो, ताकि किसानों को बकाया राशि के लिए अलग-अलग जगह भटकना न पड़े। इसके साथ किसानों और ग्रामीण मजदूरों, ग्रामीण कारीगरों समेत, के लिए 10 हजार रुपये मासिक सामाजिक सुरक्षा पेंशन की मांग भी रखी गई है।

इसके अलावा किसान Electricity Bill 2025 और Seed Bill 2025 को वापस लेने की मांग कर रहे हैं, क्योंकि इनका सीधा असर खेती की लागत और किसान की रोजमर्रा की जरूरतों पर पड़ता है। Dam Safety Act और Disaster Management Act 2024 को वापस लेने की मांग भी आंदोलन का हिस्सा है। और फिर है अमेरिका के साथ-साथ यूरोपीय देशों के साथ प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौतों का विरोध, किसानों को डर है कि इनसे विदेशी कृषि उत्पादों की भारतीय बाजार में एंट्री आसान हो जाएगी, जिससे घरेलू फसलों की कीमत पर दबाव बढ़ेगा।

चार सितंबर की अहम बैठक

किसान नेताओं का कहना है कि उन्होंने राज्यपाल, मुख्यमंत्री, SDM और DC समेत कई अधिकारियों को ज्ञापन सौंपे हैं, लेकिन साढ़े चार साल से उनकी कई मांगें लंबित पड़ी हैं। तीन सितंबर को आंदोलन के तीसरे दिन भी किसान नेताओं ने साफ कहा कि सरकार की तरफ से अब तक कोई ठोस प्रतिक्रिया या बयान सामने नहीं आया है। दूसरे दिन ही मोर्चे के मंच से नेताओं ने केंद्र और पंजाब सरकार की "पूरी खामोशी" पर कड़ी नाराजगी जताई थी।

यही वजह है कि अब सबकी नजरें चार सितंबर पर टिकी हैं, जब SKM की वरिष्ठ नेतृत्व टीम एक अहम बैठक करेगी। इस बैठक में सरकार के अब तक के रवैये की समीक्षा की जाएगी और आंदोलन की आगे की रणनीति तय होगी। किसान नेताओं ने पहले ही चेतावनी दे दी है कि अगर सरकार ने ध्यान नहीं दिया, तो आंदोलन को और बड़ा किया जा सकता है।

अब आगे क्या 

फिलहाल सात सितंबर तक मोहाली-चंडीगढ़ बॉर्डर पर पक्का मोर्चा जारी रहेगा। लेकिन असली सवाल यही है कि क्या ये आंदोलन तय समयसीमा में सिमट जाएगा, या इसका दायरा और बड़ा होगा। किसानों ने साफ कर दिया है कि जब तक उनकी मांगों पर ठोस बातचीत और समाधान नहीं होता, संघर्ष जारी रहेगा।

सवाल सिर्फ एक ट्रेड डील का नहीं है। सवाल ये है कि क्या इस बार भी बात 2020-21 के दिल्ली मोर्चे जैसी लंबी खिंचेगी, या सरकार समय रहते बातचीत की मेज सजाकर एक बड़े टकराव को टाल लेगी। सवाल ये भी है कि बदलती वैश्विक व्यापार व्यवस्था के बीच भारतीय किसान का हित आखिर कैसे सुरक्षित रहेगा। फिलहाल किसान मोर्चे पर डटे हैं, और सरकार के जवाब का इंतजार जारी है।

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