पश्चिम एशिया संकट: ईरान-इज़राइल तनाव, होर्मुज़ संकट और भारत पर आर्थिक असर
पश्चिम एशिया संकट: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार, समुद्री व्यापार और वित्तीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ा दी है। ईरान-इज़राइल टकराव और होर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ते जोखिम ने भारत जैसे ऊर्जा-आयातक देशों के लिए नई चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। भारत और ईरान के बीच व्यापारिक संबंध ऐतिहासिक, ऊर्जा-केंद्रित और रणनीतिक रहे हैं। पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज़ क्षेत्र की अनिश्चितता के बावजूद दोनों देशों के आर्थिक रिश्ते पूरी तरह समाप्त नहीं हुए, बल्कि नए रूप में विकसित हो रहे हैं।
कभी कच्चे तेल के बड़े आपूर्तिकर्ता रहे ईरान के साथ भारत का व्यापार अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद भले ही सिमटा हो, लेकिन रणनीतिक और क्षेत्रीय हितों के कारण यह रिश्ता पूरी तरह ठंडा नहीं पड़ा है। 2018 में अमेरिका द्वारा ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाए जाने के बाद भारत ने ईरानी कच्चे तेल का आयात बंद कर दिया। प्रतिबंधों से पहले भारत, ईरान से अपनी कुल तेल जरूरत का लगभग 10 प्रतिशत तक आयात करता था। ईरान भारत को रियायती दरों और अनुकूल भुगतान शर्तों पर तेल उपलब्ध कराता था, जिससे भारतीय रिफाइनरियों को लागत लाभ मिलता था।
भारत-ईरान व्यापार: सीमित लेकिन संवेदनशील
भारत और ईरान के बीच माल व्यापार आकार में छोटा है और मुख्यतः आवश्यक वस्तुओं पर आधारित है। अप्रैल-दिसंबर 2025 के दौरान कुल द्विपक्षीय व्यापार लगभग 1.15 अरब डॉलर रहा—जिसमें भारत का निर्यात करीब 883 मिलियन डॉलर और आयात 262 मिलियन डॉलर रहा। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अमेरिकी द्वितीयक प्रतिबंध और बैंकिंग/ शिपिंग पाबंदियाँ कड़ी होती हैं, तो भुगतान, बीमा और लॉजिस्टिक्स में रुकावटें वैध मानवीय व्यापार को भी प्रभावित कर सकती हैं।
भारत और ईरान के संबंधों में सबसे अहम कड़ी है चाबहार पोर्ट। भारत ने इस बंदरगाह के विकास में निवेश किया है ताकि वह अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पाकिस्तान को बायपास करते हुए पहुँच बना सके। हाल के वर्षों में चाबहार के संचालन को लेकर दीर्घकालिक समझौते ने दोनों देशों के बीच कनेक्टिविटी सहयोग को नई दिशा दी है। यह परियोजना भारत की क्षेत्रीय व्यापार और सामरिक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।
मई 2024 में इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल ने 10 वर्ष का परिचालन अनुबंध किया और 120 मिलियन डॉलर के उपकरण निवेश की प्रतिबद्धता जताई। किसी भी सैन्य वृद्धि से इस परियोजना पर राजनीतिक और प्रतिबंध जोखिम बढ़ सकता है।
भारत-इज़राइल व्यापार: उच्च मूल्य और विविधता
इज़राइल के साथ भारत का व्यापार अपेक्षाकृत बड़ा और विविध है। वित्त वर्ष 2024-25 में कुल माल व्यापार 3.62 अरब डॉलर रहा। इसमें टेक्नोलॉजी, हीरे-जवाहरात, मशीनरी, रसायन, कृषि और सेवाएँ शामिल हैं, साथ ही रक्षा-सुरक्षा सहयोग भी महत्वपूर्ण स्तंभ है। यदि इज़राइली बंदरगाह या हवाई मार्ग बाधित होते हैं, तो उच्च मूल्य वाले माल की शिपिंग लंबी दूरी से करनी पड़ सकती है, जिससे लागत और समय दोनों बढ़ेंगे।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य: भारत के लिए असली जोखिम
होर्मुज़ जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख मार्ग है। भारत के लगभग 50% कच्चे तेल आयात (2.5–2.7 मिलियन बैरल प्रतिदिन) इसी रास्ते से आते हैं, जबकि देश की कुल आयात निर्भरता 88% से अधिक है। यदि इस मार्ग में व्यवधान आता है तो इसका प्रभाव कई क्षेत्रों पर पड़ सकता है।
आयात पर असर:
- कच्चे तेल और LNG की कीमतों में उछाल
- बीमा और माल ढुलाई लागत में वृद्धि
- कुछ ग्रेड के तेल की भौतिक कमी
- चालू खाता घाटा और रुपये पर दबाव
निर्यात पर असर:
- जहाजों को केप ऑफ गुड होप से घूमकर जाना पड़ सकता है, जिससे समय और लागत बढ़ेगी
- ऊर्जा-गहन क्षेत्रों—रसायन, टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग—की प्रतिस्पर्धा प्रभावित
- खाड़ी में मंदी की स्थिति में रेमिटेंस पर असर
कच्चे तेल की कीमतें और महंगाई
तनाव के बीच ब्रेंट क्रूड लगभग 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया। कीमतें ऊँची रहीं तो भारत का आयात बिल बढ़ेगा। सरकार के सामने विकल्प होंगे—उत्पाद शुल्क में कटौती कर राहत देना या तेल कंपनियों को बोझ उठाने देना।
यदि करों में कटौती होती है तो राजकोषीय दबाव बढ़ेगा; नहीं तो खुदरा ईंधन कीमतों के जरिए महंगाई और उपभोक्ता भावना प्रभावित हो सकती है। एयरलाइंस, पेंट, टायर, लॉजिस्टिक्स और ऑयल मार्केटिंग कंपनियाँ सबसे पहले असर महसूस करती हैं।
गैस और उर्वरक पर दबाव
खाड़ी क्षेत्र से LNG आपूर्ति में जोखिम बढ़ने पर वैश्विक गैस कीमतें भी ऊपर जा सकती हैं। इससे भारत में बिजली उत्पादन, सिटी गैस वितरण और उद्योग प्रभावित होंगे। गैस महंगी होने पर उर्वरक सब्सिडी का बोझ भी बढ़ सकता है।
आपात भंडार: राहत, समाधान नहीं
रिपोर्टों के अनुसार भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार लगभग 9–10 दिन की जरूरत के बराबर हैं, जबकि रिफाइनरी और कंपनियों के स्टॉक मिलाकर कुल भंडारण लगभग 74–75 दिन के आयात के बराबर है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि भंडार केवल अल्पकालिक झटकों को संभालने में मदद करते हैं; यदि वैश्विक कीमतें लंबे समय तक ऊँची रहीं, तो महंगाई से निपटना मुख्यतः नीतिगत कदमों पर निर्भर करेगा।
निष्कर्ष: पश्चिम एशिया का मौजूदा संकट भारत के लिए प्रत्यक्ष व्यापार हानि से अधिक ऊर्जा, शिपिंग और वित्तीय अस्थिरता का जोखिम लेकर आया है। भारत को एक साथ कई मोर्चों पर संतुलन साधना होगा—ऊर्जा सुरक्षा, कूटनीतिक संतुलन और घरेलू महंगाई प्रबंधन। आने वाले हफ्तों में होर्मुज़ क्षेत्र की स्थिति और वैश्विक तेल कीमतें तय करेंगी कि यह संकट अस्थायी झटका साबित होगा या दीर्घकालिक आर्थिक चुनौती।